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CTET SST Geography #ctet #ctet2022 #uptet

 ⭕️ ‘भूगोल One Liner क्विज़’ ⭕️  ▪️ क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है— सातवाँ जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है— दूसरा भारत के उत्तर में कौन-कौन-से देश हैं— चीन, नेपाल, भूटान भारत के पूर्व में कौन-सा देश है— बांग्लादेश भारत के पश्चिम में कौन-सा देश है— पाकिस्तान भारत के दक्षिण पश्चिम में कौन-सा सागर है— अरब सागर भारत के दक्षिण-पूर्व में कौन-सी खाड़ी है— बंगाल की खाड़ी भारत के दक्षिण में कौन-सा महासागर है— हिन्द महासागर पूर्वांचल की पहाड़ियाँ भारत को किस देश से अलग करती हैं— म्यांमार से मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरूमध्य भारत को किस देश से अलग करते हैं— श्रीलंका से संपूर्ण भारत की अंक्षाशीय विस्तार कितना है— 8° 4’ से 37°6’ उत्तरी अक्षांश भारत के मध्य से कौन-सी रेखा गुजरती है— कर्क रेखा भारत के उत्तर से दक्षिण तक विस्तार कितना है— 3214 किमी भारत का पूर्व से पश्चिम तक विस्तार कितना है— 2933 km अंडमान-निकोबार द्वीप समूह कहाँ स्थित है— बंगाल की खाड़ी में लक्षद्वीप कहाँ स्थित है— अरब सागर में भारत का दक्षिणी छोर क्या कहलाता है— इंदिरा प्वाइंट इंदिरा प्वांइट को किस दूसरे नाम से भी जाना जाता है— पिगमिलियन प्वाइंट भारत का क्षेत्रफल विश्व के क्षेत्रफल का कितना है— 2. 42% विश्व की कुल जनसंख्या का कितने % भारत में निवास करता है— 17% भारत का कुल क्षेत्रफल कितना है— 32,87,263 वर्ग किसमी भारत की स्थल सीमा से कौन-से देश लगे हैं— बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान, नेपाल, वर्मा, भूटान  भारत की जल सीमा किन देशों से मिलती है— मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार व पाकिस्तान कर्क रेखा किन राज्यों से होकर गुजरती है— राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिमी बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम भारत की मुख्य भूमि की दक्षिणी सीमा कितने अक्षांश है— 8°4′ भारत का मानक समय कहाँ से लिया गया है— इलाहाबाद के निकट नैनी नामक स्थान से भारत के मानक समय और ग्रीनविच समय में कितना अन्तर है— 5 1/2 भूमध्य रेखा से भारत के दक्षिण छोर की दूरी कितनी है— 876 किमी भारत की स्थल सीमा की लंबाई कितनी है— 15200 किमी भारत की मुख्य भूमि की तटरेखा की लंबाई कितनी है— 6100 किमी

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Hindi grammar Alankar

अलंकार  अलंकार में दो शब्द हैं-‘अलम्’ और ‘कार’। अलम् का अर्थ है-भूषण, सजावट, अर्थात जो अलंकृत करे वह अलंकार है। जिस प्रकार स्त्रियाँ अपने साज-श्रृंगार के लिए आभूषणों का प्रयोग करती हैं उसी प्रकार कविता की पंक्तियों में सुंदरता प्रकट करने के लिए अलंकारों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात् अलंकार काव्य के शोभाकारक धर्म हैं। इनके द्वारा अभिव्यक्ति में स्पष्टता, प्रभावोत्पादकता और चमत्कार आ जाता है। ध्यान रहे कि अलंकार का प्रयोग सदा ही कथन के सौंदर्य की अभिवृद्धि नहीं करता। कभी-कभी कोई अलंकारविहीन कथन भी अपनी सहजता और सादगी में मनोरम लगता है और यदि उसे अलंकारों से लाद लिया जाए तो उसकी स्थिति ऐसी हो सकती है जैसे किसी नैसर्गिक रूप से सुंदर युवती को आभूषणों से लादकर भौंडी और कुरुप बना दिया गया हो। भाषा और साहित्य का सारा कार्य-व्यापार शब्द और अर्थ पर ही निर्भर है (अतएव विशिष्ट शब्द-चमत्कार अथवा अर्थ-वैशिष्ट्य ही कथन के सौंदर्य की अभिवृद्धि करता है। इसी आधार पर अलंकार के दो भेद किए गए हैं।  शब्दालंकार जहाँ किसी कथन में विशिष्ट शब्द-प्रयोग के कारण चमत्कार अथवा सौंदर्य आ जाता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। शब्द को बदल कर उसके स्थान पर उसका पर्याय रख देने पर यह चमत्कार समाप्त हो जाता है। प्रमुख शब्दालंकार अनुप्रास यमक श्लेष #ctetnotes #ctetupdates #ctethindi #ctet2022 #teacherjob #eductet #ctetsuccess #hindigrammar अनुप्रास जिस रचना में व्यंजनों की बार-बार आवृत्ति के कारण चमत्कार उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है, जैसे :-  ‘छोरटी है गोरटी या चोरटी अहीर की। ‘ इस पंक्ति में अंतिम वर्ण ‘ट’ की एक से अधिक बार आवृत्ति होने से चमत्कार आ गया है।  ‘सुरभित सुंदर सुखद सुमन तुम पर खिलते हैं।’ इस काव्य पंक्ति में पास-पास प्रयुक्त ‘सुरभित’, ‘सुंदर’, ‘सुखद’ और ‘सुमन’ शब्दों में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति हुई है। उदाहरण :-  मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत बुलाए। (‘म’ और ‘स’ वर्णों की आवृत्ति) विमल वाणी ने वीणा ली कमल कोमल कर में सप्रीत (‘व’ और ‘क’ वर्ण की आवृत्ति) चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थी, जल-थल में (‘च’ और ‘ल’ वर्णों की आवृत्ति) यमक :- जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और उसका अर्थ हर बार भिन्न हो वहाँ ‘यमक’ अलंकार होता है। उदाहरण :-  कहै कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराई लीनी, रति -रति सोभा सब रति के सरीर की। पहली पंक्ति में ‘बेनी’ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। पहली बार प्रयुक्त शब्द ‘बेनी’ कवि का नाम है तथा दूसरी बार प्रयुक्त ‘बेनी’ का अर्थ है ‘चोटी’। इसी प्रकार दूसरी पंक्ति में प्रयुक्त ‘रति’ शब्द तीन बार प्रयुक्त हुआ है। पहली बार प्रयुक्त ‘रति-रति’ का अर्थ है ‘रत्ती’ के समान जरा-जरा सी और दूसरे स्थान पर प्रयुक्त ‘रित’ का अथ है कामदेव की परम सुंदर पत्नी ‘रित’ इस प्रकार ‘बेनी और ‘रित’ शब्दों की आवृत्ति से चमत्कार उत्पन किया गया है। काली घटा का घमंड घटा, नभ मंडल तारक वृंद खिले उपर्युक्त काव्य पंक्ति में शरद के आगमन पर उसके सौंदर्य का चित्रण किया गया है। वर्षा बीत गई है, शरद ऋतु आ गई है। काली घटा का घमंड घट गया है। ‘घटा’ शब्द के दो विभिन्न अर्थ हैं-घटा = काले बादल और घटा = कम हो गया। ‘घटा’ शब्द ने इस पंक्ति में सौंदर्य उत्पन्न कर दिया है। यह यमक का सौंदर्य है।  अन्य उदाहरण कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय । वा खाए बौराए जग, या पाए बौराय।। (कनक = सोना, कनक = धतूरा) माला फेरत जुग भया, फिरा न मनका फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।। (मनका = माला का दाना, मन का हृदय का)  जे तीन बेर खाती थीं ते तीन बेर खाती हैं। (तीन बेर तीन बार, तीन बेर = तीन बेर के दाने)  पच्छी परछीने ऐसे परे पर छीने बीर, तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के । श्लेष ‘श्लेष’ का अर्थ है- ‘चिपकना’। जहाँ एक शब्द एक ही बार प्रयुक्त होने पर दो या दो से अधिक अर्थ दे वहाँ श्लेष अलंकार होता है। दूसरे शब्दों में जहाँ एक ही शब्द से कई अर्थ चिपके हों वहाँ श्लेष अलंकार होता है। उदाहरण 1. मंगन को देख पट देत बार-बार है। इस काव्य पंक्ति में ‘पट’ के दो अर्थ हैं – वस्त्र और किवाड़। पहला अर्थ है-वह व्यक्ति किसी याचक को देखकर उसे बार-बार ‘वस्त्र’ देता है और दूसरा अर्थ है-वह व्यक्ति याचक को देखते ही दरवाजा बंद कर लेता है। अतएव यहाँ श्लेष अलंकार का सौंदर्य है। 2. रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून।। पानी के तीन अर्थ है – 1. चमक, 2. जल 3. इज्जत इस दोहे का रहीम जी ने तीन संदर्भों का वर्णन किया है। मोती के संदर्भ में पानी का अर्थ चमक है। मानुष के संदर्भ में पानी का अर्थ इज्जत है और चून के संदर्भ में पानी का अर्थ जल है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है। 3. हे प्रभो! हमें दो जीवन दान। यहाँ जीवन शब्द के दो अर्थ हैं-1. पानी, एवं; 2. उम्र अर्थालंकार कविता की पंक्तियों में जहाँ अर्थों के माध्यम से चमत्कार प्रस्तुत किया जाय वहाँ अर्थालंकार होता है। उस चमत्कार या सौंदर्य के लिए एक शब्द के बदले उसके पर्यायवाची शब्द का प्रयोग करने से चमत्कार ज्यों-का-त्यों बना रहता है। अर्थालंकार को समझने से पहले हमें उपमेय और उपमान को जान लेना चाहिए। उपमेय जिसकी उपमा दी जाती है उसे उपमेय कहते हैं। उपमान जिससे तुलना की जाय वो उपमान कहलाता है। अर्थालंकार के अंतर्गत कुछ महत्त्वपूर्ण अलंकार इस प्रकार हैं – 1. उत्प्रेक्षा अलंकार जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाय वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। संभावना व्यक्ति करने के लिए जनु, जानो, जनहुँ, मनु, मानो, मनहुँ, जौं, त्यों, यों, जैसे- आदि शब्दों का प्रयोग देखने को मिलता है। उदाहरण कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए। हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए।  उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा ।  सोहत ओढ़े पीत पट स्याम सलोने गात, नीलमणि शैल पर आतम परयो प्रभात।  सिर फट गया उसका वहीं मानो अरुण का रंग का घड़ा। पद्मावती सब सखी बुलाई मनु फुलवारी सबै चली

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समास उसके प्रकार और विग्रह samas aur uske prakar

 समास समास का शाब्दिक अर्थ है ‘संक्षिप्तीकरण’ अर्थात्-छोटा करना। दो या दो से अधिक पदों के मेल से जब एक नया शब्द बनाया जाता है तो उस शब्द-रचना विधि को ‘समास’ कहा जाता है, जैसे-स्नान + गृह = स्नानगृह, दश + आनन = दशानन, घोड़ा + सवार, घुड़सवार, हिंदी + प्रचार + सभा हिंदी प्रचार सभा आदि। =3 समास रचना में दो शब्द (पद) होते हैं। पहला पद ‘पूर्व पद’ कहा जाता है और दूसरा पद ‘उत्तर पद’ तथा इन दोनों के समास से बना नया शब्द ‘समस्त पद’, जैसे :-          पूर्व पद      +      उत्तर पद                    समस्त पद  दश         +         आनन (है जिसके)         दशानन घोड़ा       +         सवार (घोड़े पर सवार)    घुड़सवार  राजा       +         (का) पुत्र                      राजपुत्र  यश         +         प्राप्त                           यशप्राप्त  समास विग्रह जब समस्त पद के सभी पद अलग-अलग किए जाते हैं तब उस प्रक्रिया को समास-विग्रह कहते हैं, जैसे-‘सीता-राम समस्त पद का विग्रह होगा सीता और राम । समास के भेद समास के मुख्यत छ: भेद हैं :-  अव्ययीभाव समास तत्पुरुष समास कर्मधारय समास द्वंद्व समास. द्विगु समास बहुव्रीहि समास 1. अव्ययीभाव (i) इसका पहला पद अव्यय होता है और यह क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है, जैसे वह प्रतिदिन आ रहा है। (प्रतिदिन-क्रियाविशेषण) यथाशीघ्र        जितना शीघ्र हो प्रतिदिन         हर दिन बेरहम            बिना रहम के यथासंभव      जितना संभव हो बखूबी           खूबी के साथ अकारण        बिना कारण के यथाशक्ति       शक्ति भर (ii) पदों की आवृत्ति होने पर भी अव्ययीभाव समास होता है, जैसे- कानोंकान, हाथोंहाथ, लातोंलात, रातोंरात।  2. तत्पुरुष समास जिस समास में अंतिम शब्द (उत्तरपद) प्रधान हो, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं, जैसे :-  क. कर्म तत्पुरुष  विषधर          विष को धारण करनेवाला सिरतोड़         सिर को तोड़नेवाला पॉकेटमार       पॉकेट को मारनेवाला गिरिधर           गिर को धारण करनेवाला ख. करण तत्पुरुष शोकग्रस्त       शोक से ग्रस्त मदांध            मद से अंधा कामचोर         काम से चोर मुँहचोर            मुँह से चोर ग. संप्रदान तत्पुरुष देवालय        देव के लिए आयल किताबघर     किताब के लिए घर न्यायालय     न्याय के लिए आलय रसोईघर        रसोई के लिए घर घ. अपादान- तत्पुरुष अन्नहीन       अन्न से हीन नेत्रहीन         नेत्र से हीन धनहीन         धन से हीन ऋण मुक्त      ऋण से मुक्त ङ. संबंध तत्पुरुष राजकंया         राजा की कंया भूदान             भू का दान गुरुसेवा           गुरु की सेवा कंयादान         कंया का दान च. अधिकरण तत्पुरुष नरोत्तम          नरों में उत्तम रणवीर           रण में वीर मुनीश्रेष्ठ         मुनियों में श्रेष्ठ कुलश्रेष्ठ         कुल में श्रेष्ठ 3. कर्मधारय समास कर्मधारय समास भी तत्पुरुष समास का ही भाग है, परन्तु इसमें प्रायः प्रथम पद विशेषण और दूसरा पद विशेष्य होता है, अथवा दोनों पदों में उपमेय और उपमान का संबंध पाया जाता है, जैसे :- महाकाव्य    महान काव्य     महान है जो काव्य महात्मा       महान् आत्मा    महान् है जो आत्मा वीरबाला      वीर बाला        वीर है जो बाला नीलकमल    नीला कमल     नीला है जो कमल महावीर        महान् वीर       महान् है जो वीर 4. द्वंद्व समास द्वंद्व का शाब्दिक अर्थ है टकराव (बराबर वालों में) अत: जहाँ दोनों पद प्रधान हों वहाँ द्वंद्व समास होता है, जैसे लोटा-डोरी      लोटा और डोरी माता-पिता      माता और पिता सीता-राम       सीता और राम राजा-रानी       राजा और रानी राधा-कृष्ण      राधा और कृष्ण अच्छा-बुरा      अच्छा या बुरा झूठ-सच         झूठ या सच लाभ-हानि       लाभ या हानि 5. द्विगु समास जहाँ पहला पद संख्यावाचक हो वहाँ द्विगु समास होता है, जैसे :-  छमाही      छ: माहों का समाहार दोपहर      दो पहरों का समाहार चौराहा      चार राहों का समाहार नवग्रह       नौ ग्रहों का समाहार 6. बहुव्रीहि समास इसमें कोई भी पद प्रधान नहीं होता, बल्कि समस्त पदों से किसी अन्य शब्दों का बोध होता है, जैसे –  नीलकंठ     नीला है कंठ जिसका         भगवान                                                                    शिव का बोध                                                      वीणापाणि  वीणा है पाणि (हाथ) में        सरस्वती                                                                        का बोध वज्रदेह       वज्र है देह जिसकी।                हनुमान                                                                         का बोध  चतुरानन     चार है आनन (मुख) जिसके    बह्मा का                                                                        बोध

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Hindi Grammar Tense Kaal काल #ctet #ctetsuccess #ctetnotes #ctetupdates

 काल और इसके प्रकार  क्रिया के प्रयोग का समय काल कहलाता है। काल के तीन प्रकार होते हैं :-  भूतकाल वर्तमानकाल भविष्यत्काल भूतकाल जिन क्रियाओं का व्यापार बीते हुए समय में होता है, वे भूतकाल की क्रियाएँ कहलाती हैं। भूतकाल के छह भेद होते हैं-  सामान्य भूतकाल  आसन्न भूतकाल  अपूर्ण भूतकाल  पूर्ण भूतकाल  संदिग्ध भूतकाल  हेतुहेतुमद् भूतकाल सामान्य भूतकालः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो कि क्रिया बीते हुए समय में सामान्य रूप से हुई थी, वह सामान्य भूत की क्रिया है, जैसे :-  वह गया । राधा देर से आई। आसन्न भूतकालः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो की क्रिया निकट भूतकाल में हुई है, जैसे- अ -आभा आ गई है, कक्षा शुरू हो चुकी है। नोट: कुछ व्याकरण शास्त्री ‘है’ क्रिया के प्रयोग होने के कारण आसन्न भूत को वर्तमान काल का भेद मानते हैं व इसे पूर्ण वर्तमान का नाम भी देते हैं। अपूर्ण भूतकालः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो क्रिया भूतकाल में प्रारंभ हो चुकी थी, परंतु उसकी समाप्ति प्रकट न हो। जैसे :-    हम साथ-साथ पढ़ रहे थे।  हम खेल रहे थे।  पूर्ण भूतकालः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो कि भूतकाल में क्रिया बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी थी। जैसे हितेश आया था। आभा आई थी। संदिग्ध भूतकालः  क्रिया का वह रूप जिससे बीते हुए समय में उसके होने में संदेह प्रतीत हो, वह संदिग्ध भूत कहलाता है। जैसे :-  शायद वह मेरे घर आया होगा। हेतुहेतुमद् भूतकालः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो कि क्रिया भूतकाल में हो सकती थी, परंतु किसी अन्य क्रिया के न होने की वजह से नहीं हुई, जैसे :-  यदि आप समय पर आते तो काल की परिभाषा लिख पाते। #ctet #ctetuodates #ctetnotes #hindigrammar ______________________ वर्तमान काल जिन क्रियाओं का व्यापार वर्तमान में हो रहा है या चल रहे समय में होता है, वह वर्तमान काल कहलाता है। वर्तमान काल के तीन भेद होते हैं :-  सामान्य वर्तमान काल  अपूर्ण वर्तमान काल  संदिग्ध वर्तमान काल  सामान्य वर्तमानः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो कि क्रिया चल रहे समय में सामान्य रूप में हो रही है, जैसे-  राहुल खाना खाता है। अपूर्ण वर्तमानः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो कि क्रिया वर्तमान में प्रारंभ हो चुकी है, परंतु उसकी समाप्ति प्रकट न हो, जैसे-  वह खाना खा रहा है।  यहां यह तो पता चलता है कि खाना खाने की क्रिया प्रारंभ हो चुकी है। परन्तु यह पता नहीं चलता कि खाने की क्रिया अभी भी चल रही है या पूर्ण हो चुकी है। संदिग्ध वर्तमानः  क्रिया का वह रूप जिससे चल रहे समय में उसके होने में संदेह प्रतीत हो, जैसे :-  शायद वह आता ही होगा। #ctet #ctetuodates #ctetnotes #hindigrammar भविष्यत काल जिन क्रियाओं का व्यापार आने वाले समय में होना है, वे भविष्यत् काल की क्रिया कहलाती है, जैसे- वह आएगा। भविष्यत् काल के तीन भेद होते हैं :-  सामान्य भविष्य  संभाव्य भविष्य  हेतुहेतुमद् भविष्य सामान्य भविष्यत्ः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो की, क्रिया आने वाले समय में सामान्य रूप से एक बार या अनेक बार होगी,जैसे :-  मैं कल मुंबई जाऊँगा। संभाव्य भविष्यत्ः  ऐसी क्रियाएँ जिससे यह ज्ञात हो कि आने वाले समय में क्रिया के होने की संभावना हो, जैसे :-  शायद कल बारिश होगी। हेतुहेतुमद् भविष्यत्ः  क्रिया का वह रूप जिससे यह ज्ञात हो कि आने वाले समय में क्रिया का होना किसी अन्य क्रिया के होने पर निर्भर करेगा, जैसे अगर बारिश होगी तो फसल अच्छी उगेगी। अगर पढ़ोगे तो पास हो जाओगे। #hindigramar #hindivyakaran #kaal #tense #ctetnotes #ctetsuccess #eductet #ctetupdes #uptet #pgt #tgt 

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Hindi Grammar कारक karak carak #ctet #ctetnotes #ctetnews #ctetcourse #eductet #ctetsuccess

कारक संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया से संबंध बताने वाला रूप या विभक्ति कारक कहलाता है। कारक के आठ भेद होते हैं :-  1. कर्ता कारकः  क्रिया को करने वाला कर्ता कहलाता है अर्थात् वाक्य में दी गयी क्रिया को करने वाला संज्ञा या सर्वनाम ही कर्ता होता है। इसके साथ ने, को, आदि विभिक्तियों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण: अरुण गा रहा है। इस वाक्य में गाने की क्रिया अरुण द्वारा की जा रही है अतः अरुण कर्ता है। 2. कर्म कारकः  जिस पर क्रिया का प्रभाव पड़े, वह कर्म कारक कहलाता है, जैसे-मैंने सेब खाया। उक्त वाक्य में क्रिया ‘खाने’ का प्रभाव ‘सेब’ पर पड़ रहा है, इसलिए ‘सेब’ कर्म है। राजा ने साँप मारा 3. करण कारकः  करण का अर्थ है-साधन। जिस साधन से क्रिया को किया जाए, वह करण कारक कहलाता है, जैसे:-  सास ने झाडू से बहू को मारा सचिन की दोस्ती से अक्षय सुधर गया। 4. संप्रदान कारक जिसके लिए क्रिया की जाए, वो संप्रदान कारक कहा जाता है।             या, जिसको क्रिया का लाभ पहुँचे, वह संप्रदान कारक है, जैसे-रमेश ने सुरेश को चॉकलेट दी। 5. अपादान कारकः  जिससे अलग होने का भाव हो, वह अपादान कारक कहलाता है, जैसे- मैं बस से उतर गया। (जो चीज अपनी जगह पर है, वह अपादान कारक है।) अलग होने या दूर हटने के अलावा डरने के व शर्माने के भाव में भी अपादान होता है । जैसे-  बच्चा छिपकली से डरता है।  यहां बच्चा डरता है तो छिपकली से दूर हटेगा।  अतः छिपकली अपादान है।  इसी प्रकार ‘बहु `ससुर से लजाती है’ वाक्य में ससुर अपादान होगा। 6. अधिकरण कारकः  क्रिया के होने का समय या स्थान अधिकरण कहलाता है, जैसे-मैं बस में बैठ गया। 7. संबंध कारकः  किसी एक संज्ञा या सर्वनाम का संबंध किसी दूसरी संज्ञा या सर्वनाम से बताने वाला रूप या विभक्ति, संबंध कारक कहलाता है, जैसे :-  यह अमित का घर है। निशा रवि से बड़ी है। फूलों का रंग नीला है।  अपनी पुस्तक निकालिए। 8. संबोधन कारकः  जहाँ पुकारने का बोध हो, वहाँ संबोधन कारक होता है, जैसे- हे ! अरे ! सुनो!  ध्यान दो!  ओए! एक ही शब्द का प्रयोग विभिन्न कारकों के रूप में किया जा सकता है, जैसे मैं बस में बैठ गया। (अधिकारण कारक) मैं बस से घर आ गया। (करण कारक) मैं बस से उतर गया। (अपादान कारक) कारकों की पहचान कारकों की पहचान कारक चिह्नों से की जाती है। कोई शब्द किस कारक में प्रयुक्त है, यह वाक्य के अर्थ पर भी निर्भर है। सामान्यताः कारक निम्न प्रकार पहचानते जाते हैं :-  कर्ता           क्रिया को संपन्न करनेवाला कर्म            क्रिया से प्रभावित होने वाला करण          क्रिया का साधन या उपकरण  संप्रदान        जिसके लिए कोई क्रिया संपन्न की जाए अपादान      जहाँ अलगाव हो वहाँ ध्रुव या स्थिर में                        अपादान होता है। संबंध          जहाँ दो पदों का पारस्परिक संबंध बताया                     जाए।  अधिकार      जो क्रिया के आधार (स्थान, समय,                          अवसर) आदि का बोध कराए।  संबोधन       किसी को पुकार कर संबोधित किया जाय एक ही वाक्य में एक से अधिक कारक हो सकते हैं, जैसे- हे मुनीश्वर्! राम ने अपनी पत्नी सीता के लिए रावण को लंका में तीर से मारा, वह रथ से गिर गया।  कर्ता             राम कर्म              रावण करण           तीर से  सम्प्रदान       सीता के लिए  अपादान        रथ से गिर गया  अधिकरण     लंका में  संबंध            अपनी पत्नी  संबोधन         हे मुनिश्वर !

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Hindi Grammar अविकारी शब्द Indeclinable word avikari shabd #ctetnotes #ctetsuccess #eductet #ctetupdates #ctetexam

अविकारी शब्द  INDECLINABLE WORD  जिन शब्दों में लिंग, वचन, काल, कारक आदि के आधार पर कोई परिवर्तन न हो, वे अविकारी शब्द कहलाते हैं। इनमें क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक और निपात शब्द आते हैं। क्रियाविशेषण :- जो शब्द क्रिया की विशेषता बताएँ क्रियाविशेषण कहलाते हैं। क्रियाविशेषण के चार भेद होते हैं 1. रीतिवाचक क्रियाविशेषणः  रीति शब्द का अर्थ होता है ढंग या तरीका। जिन शब्दों से क्रिया के होने के ढंग, तरीके, प्रकार, निश्चय, अनिश्चय, स्वीकार, निषेध आदि को बोध हो, उसे रीतिवाचक क्रियाविशेषण कहते हैं, जैसे-ऐसे, वैसे, कैसे, जैसे, शायद, अवश्य, न, नहीं, मत, क्योंकि, चूँकि, अतः, इसलिए, धीरे-धीरे, तेजी से, जोर-जोर से, ध्यानपूर्वक आदि । वह ऐसे लिखता है। (क्रिया के प्रकार का बोध) वह शायद जाए। (क्रिया के अनिचश्य का बोध)  मैं नहीं खेलूँगा । (क्रिया के निषेध का बोध) 2. परिमाणवाचक क्रियाविशेषणः  जिस शब्द से क्रिया की न्यूनता, अधिकता, तुलना, मात्रा, आदि को बोध हो, उसे परिमाणवाचक क्रियाविशेषण कहते हैं, जैसे- इतना, उतना, जितना, कितना, थोड़ा, बहुत, कम, खूब, अधिक, अति, अत्यंत, अतिशय, केवल, बस, काफी, जरा, थोड़ा-थोड़ा, तिल-तिल, बारी-बारी से, क्रमशः एक-एक कर आदि। गीता थोड़ा खाती है। (न्यूनता का बोध) मैं बहुत पढ़ता हूँ। (अधिकता का बोध) राम कितना सोता है? (तुलना का बोध) 3. स्थानवाचक क्रियाविशेषणः  जो शब्द क्रिया के स्थान की स्थिति एवं दिशा का बोध कराए, उसे स्थानवाचक क्रियाविशेषण कहते हैं, जैसे- यहाँ, वहाँ, यहीं, वहीं, बाहर, भीतर, इधर, उधर, पास, दूर, दाएँ, बाएँ, आगे, पीछे, ऊपर, नीचे की तरफ, की ओर आदि। वहा यहाँ रहता है। (स्थान की स्थिति का बोध) सड़क के बाएँ चलो। (स्थान की दिशा का बोध) _________________  4. कालवाचक क्रियाविशेषणः  जो शब्द क्रिया के समय, अवधि, बारंबारता आदि का बोध कराए, उसे कालवाचक क्रियाविशेषण कहते हैं, जैसे- आज, कल, अब, जब, अभी, कभी, सायं प्रातः, तुरंत, पहले, आजकल, दिन भर, नित्य, सदा, लगातार, सदैव, बहुध, प्रतिदिन, रोज, कई बार, हर बार आदि । श्री मरांडी अभी जा रहे हैं। (क्रिया के समय का बोध) मि. जॉन आजकल खेलते हैं। (क्रिया की अवधि का बोध) मो. रहीम प्रतिदिन पढ़ रहे हैं। (क्रिया की बारंबारता का बोध) संबंधबोधक शब्द जो शब्द वाक्य के विभिन्न पदों में परस्पर शब्द व्यक्त करें, वे संबंधबोधक शब्द कहलाते हैं। (का, के, की, ना, ने, नी, रा, रे, री, सा, से, सी, पर आदि ।) पद :-  जो शब्द वाक्य में प्रयोग हो, वे पद कहलाते हैं। पद स्वतंत्र नहीं होते, जैसे-कमल ने खाना खाया। इस वाक्य में आए सभी शब्द ‘पद’ कहलाएंगे। समुच्चयबोधक शब्द :- जो शब्द दो या उससे अधिक वाक्यों या वाक्यांशों को जोड़ने का कार्य करे, वे समुच्चयबोधक शब्द कहलाते हैं, जैसे-परंतु, यदि, अथवा, नही तो, लेकिन, फिर भी, क्योंकि, इसलिए, और, या, अन्यथा, किंतु आदि । वह गरीब है परंतु ईमानदार है। विस्मयादिबोधक शब्द :-  जो शब्द हर्ष, क्रोध, पीड़ा, दुख, आश्चर्य, भय आदि मनोभावों को व्यक्त करने के लिए प्रयोग किए जाते है, वे विस्मयादिबोधक शब्द कहलाते हैं, जैसे- वाह! कितना सुंदर दृश्य है।  वाह!, ओह! हाय! छिह! आह! अहा! निपात जो शब्द वाक्य में बलाघात के लिए प्रयोग किए जाते हैं वे निपात कहलाते हैं, जैसे-मैं भी जाऊँगा, । मैं ही क्यों जाऊँ? (ही, भी, तो)

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Hindi grammar Kriya aur uske bhed क्रिया और उसके भेद #ctet #ctetsuccess #ctetupdate #ctetnews #eductet

क्रिया और उसके भेद  जिन शब्दों से किसी काम के करने या होने का पता चले, उसे क्रिया कहते हैं। क्रिया के दस भेद होते हैं: कर्म के आधार पर क्रिया के भेद :-  1. सकर्मक क्रियाः जिन क्रियाओं के साथ कर्म हो अथवा उसकी आवश्यकता हो वे सकर्मक क्रिया कहलाती हैं। अथवा जिन क्रियाओं के लिए कर्ता और कर्म अलग-अलग हो, वे सकर्मक क्रियाएँ होती है। अथवा जिन क्रियाओं का प्रभाव सीधे कर्म पर पड़े, सकर्मक क्रियाएँ कहलाती हैं, जैसे राम फल खाता है (खाना क्रिया के साथ ‘फल’ कर्म है।) सीता गीत गाती है ( गाना क्रिया के साथ गीत कर्म है।)  अश्वनि खाता है। (इसमें खाना क्रिया के लिए कर्म उपस्थित नहीं है, परंतु यह स्पष्ट है कि कुछ खाया जा रहा है। अतः इसमें कर्म की आवश्यकता है।) 2. अकर्मक क्रियाः जिन क्रियाओं के साथ न तो कर्म हो, न ही उसकी आवश्यकता हो, अकर्मक क्रिया कहलाती है। अथवा कर्त्ता और कर्म एक ही हो। अथवा क्रिया का प्रभाव कर्ता पर पड़े। जैसे-राधा रोती है (कर्म का अभाव है तथा रोती है क्रिया का फल राधा पर पड़ता है।) मोहन हँसता है (कर्म का अभाव है तथा हँसता है क्रिया का फल मोहन पर पड़ता है।) सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं के कुछ अन्य उदाहरण उसका सिर खुजलाता है। (अकर्मक)  वह अपना सिर खुजलाता है। (सकर्मक) पानी में रस्सी ऐंठती है। (अकर्मक) दादा जी रस्सी ऐंठते हैं। (सकर्मक) आसमान में पतंग उड़ रही है। (अकर्मक) सचिन पतंग उड़ा रहा है। (सकर्मक) आकाश में पक्षी उड़ते हैं। (अकर्मक) घोड़े मैदान में दौड़ते हैं। (सकर्मक) #ctet #ctetupdates #ctetnews #eductet #ctetsuccess ____________________ रचना के आधार पर क्रिया के भेद रचना के आधार पर क्रिया के पांच भेद होते हैं: सामान्य क्रिया संयुक्त क्रिया नामधातु क्रिया प्रेरणार्थक क्रिया पूर्वकालिक क्रिया सामान्य क्रिया जब किसी क्रिया का सामान्य रूप से एक बार प्रयोग किया जाए, वह सामान्य क्रिया कहलाती है, जैसे- सचिन नाचा, अरुण हँसा, विभा ने खाना । संयुक्त क्रिया जहाँ एक से अधिक क्रियाओं के प्रयोग द्वारा एक ही क्रिया का होना पाया जाए, वे संयुक्त क्रियाएँ कहलाती है, जैसे :-  बच्चा नहा रहा है। (यहाँ नहाना, रहना, होना तीन क्रिया शब्दों के द्वारा नहाने की क्रिया हुई ।) नेता जी चल बसे। (यहाँ चलना और बसना दो क्रियाशब्दों से मरने की क्रिया का बोध होता है) सतीश इधर आ जाओ। ( यहाँ आना और जाना दो क्रिया शब्दों से आने की क्रिया का बोध होता है।) नामधातु क्रिया (मूल शब्द धातु) मूल शब्दों में संज्ञा, सर्वनाम व विशेषण आते हैं। मूल शब्दों के साथ प्रत्यय लगाकर जब क्रिया बनाई जाए, वे नामधातु क्रियाएँ कहलाती हैं।                   जैसे- खेल + ना खेलना,                   मार + ना मारना                    लात + इयाना लतियाना प्रेरणार्थक क्रिया :- जिन क्रियाओं को कर्ता स्वयं न करके किसी अन्य को करने की प्रेरणा दें, वे प्रेरणार्थक क्रियाएँ कहलाती हैं, जैसे- माँ ने बच्चे को नौकर से नहलवाया। (कहलवाना, मँगवाना, लगवाना आदि) पूर्वकालिक क्रिया :- जो क्रियाएँ मुख्य क्रियाओं से पहले संपन्न हुई हो, वे पूर्वकालिक क्रियाएँ कहलाती हैं। इनके साथ ‘कर’ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, जैसे-कुत्ता गिरकर मर गया, बच्चा नहाकर सो गया, मैंने आकर पढ़ा दिया। इनके अलावा तीन और क्रियाएँ भी होती हैं: 1. असमापिका क्रिया :- जो क्रियाएँ वाक्य के अंत में न आकर संज्ञा या सर्वनाम के साथ, पहले प्रयोग की जाए, वे असमापिका क्रियाएँ कहलाती है। जैसे :- घोड़ा दौड़ते हुए (असमापिका क्रिया) आया। सोता हुआ बच्चा अच्छा लगता है  कल-कल करता जल बह रहा है। 2. तात्कालिक क्रिया :-  जो क्रियाएँ मुख्य क्रिया के तुरंत पहले संपन्न हुई हो, वे तात्कालिक क्रियाएँ कहलाती है। इसके साथ ‘ही’ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है । जैसे :- बच्चा नहाते ही सो गया। मैंने आते ही पढ़ा दिया। कुत्ता गिरते ही मर गया। 3. अनुकरणात्मक क्रिया :- जो क्रियाएँ मूल शब्दों के अनुकरण से बनी हो, वे अनुकरणात्मक क्रियाएँ कहलाती है । जैसे :- हिनहिनाना, भिन-भिनाना, टिमटिमाना, बुद-बुदाना, फुसफुसाना #ctet #ctetupdates #ctetnews #eductet #ctetsuccess

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Hindi Grammar Visheshan aur uske prakar #ctet #ctethindi #paper1 #paper2

 विशेषण संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द विशेषण कहलाते हैं, जैसे- राहुल एक मोटा लड़का है । विशेष्य :- जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतलायी जाती है, उस संज्ञा या सर्वनाम को विशेष्य कहते हैं, जैसे:-  लड़का लंबा है ।        ( लड़का -> विशेष्य ) वह लंबा है ।             ( वह -> विशेष्य ) कलम लाल है ।         ( कलम -> विशेष्य ) यह लाल है ।             ( वह -> विशेष्य ) प्रविशेषण :- विशेषण की विशेषता बतलानेवाले विशेषण को प्रविशेषण कहते हैं। प्रविशेषण सामान्यतः विशेषण के गुणों में वृद्धि लाता है, जैसे- थोड़ा, बहुत, अति, अत्यंत, अधिक, अत्यधिक, बड़ा, बेहर, महा, घोर, ठीक, बिल्कुल, लगभग आदि। दूध मीठा है। (मीठा-संज्ञा की विशेषता = विशेषण) दूध बहुत मीठा है। (बहुत- विशेषण की विशेषता = प्रविशेषण) वह पाँच बजे आएगा। (पाँच – संज्ञा की विशेषता = विशेषण) वह ठीक पाँच बजे आएगा। (ठीक-विशेषण की विशेषता = प्रविशेषण) स्पष्ट है कि उपर्युक्त वाक्यों में प्रयुक्त ‘बहुत’ एवं ठीक शब्द प्रविशेषण हैं, क्योंकि ये विशेषण की विशेषता बतलाते हैं। विशेषण का प्रयोग :-  विशेषण का प्रयोग दो रूप से किया जा सकता है –  उद्देश्य विशेषणः जब विशेषण का प्रयोग संज्ञा या सर्वनाम से पहले किया जाता है, वे उद्देश्य विशेषण कहलाते हैं, जैसे-यह लाल जैकेट है।  विधेय विशेषणः जब विशेषण का प्रयोग संज्ञा या सर्वनाम के बाद किया जाता है, वे विधेय विशेषण कहलाते हैं, जैसे-यह जैकेट लाल है। नोट :- यहां ध्यान देने योग्य दो बाते है :-  1. विशेषण के लिंग एवं वचन विशेष्य के लिंग व वचन के अनुसार होते हैं, चाहे विशेषण विशेष्य के पहले आए या बाद में जैसे :-  यह अच्छा लड़का है। (अच्छा, लड़का दोनों एकवचन, पुल्लिंग) यह लड़का अच्छा है। (लड़का, अच्छा-दोनों एकवचन, पुल्लिंग) वह अच्छी लड़की है। (अच्छी, लड़की-दोनों एकवचन, स्त्रीलिंग) वे अच्छे लड़के हैं। (अच्छे, लड़के दोनों बहुवचन, पुल्लिंग)  2. अगर एक ही विशेषण के अनेक विशेष्य हों, तो विशेषण के लिंग और वचन प्रथम विशेषय के लिंग और वचन के अनुसार होंगे, जैसे :-  उजला कुरता, टोपी और जूते लाओ। (प्रथम विशेष्य कुरता- पुंल्लिंग, अतः-उजला) उजली टोपी, कुरता और जूते लाओ। (प्रथम विशेष्य टोपी-स्त्रीलिंग, अतः-उजली) उजले जूते, कुरता और टोपी लाओ। (प्रथम विशेष्य जूते – येकरांत पुल्लिंग, अतः-उजले) स्पष्ट है कि यहाँ एक विशेषण के अनेक विशेष्य हैं, लेकिन विशेषण के लिंग एवं वचन प्रथम विशेष्य के लिंग एवं वचन के अनुसार ही आए हैं। वाक्य के दो अंग होते हैं :-  उद्देश्यः जिसके बारे में कहा जाए। विधेयः जो कहा जाए। _________________________ विशेषण के भेद विशेषण के चार भेद होते हैं: गुणवाचक परिमाणवाचक संख्यावाचक सार्वनामिक 1. गुणवाचक विशेषण जिस विशेषण से गुण, दोष, रंग, आकार, स्वभाव, दशा, अवस्था आदि को बोध हो, उसे गुणवाचक विशेषण कहते हैं।  जैसे- अच्छा, बुरा, सच्चा, झूठा, नेक, भला, सुंदर, कुरूप, आकर्षक, सीधा, टेढ़ा, लाल, पीला, लंबा, चौड़ा, छोटा बड़ा, दयालु, कठोर, सूखा, गीला, दुबला, पतला, नया, पुराना, आधुनिक, प्राचीन, बनारसी, मुरादाबादी आदि । वह भला/अच्छा आदमी है। (भला/अच्छा-गुण् बोधक) मोहन बुरा/दुष्ट लड़का है। (बुरा/दुष्ट-अवगुण बोधक) कपड़ा लाल/पीला है। (लाल/पीला-रंगबोधक) भाला नुकीला/लंबा है। (नुकीला/लंबा-आकारबोधक) मोहन दुबला/मोटा है। (दुबला/मोटा-दशाबोधक) 2. परिमाणवाचक विशेषण जो विशेषण वस्तु के परिणाम या मात्रा (नाप, तौल या माप) का बोध कराए, उसे परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं।  जैसे-दो लिटर, तीन मीटर, थोड़ा, बहुत, कुछ कम, सारा, पूरा, इतना, उतना जितना, कितना आदि। परिमाणवाचक के दो उपभेद होते हैं: 1. निश्चित परिमाणवाचकः जो शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम के निश्चित परिमाण का बोध कराएं वो निश्चित परिमाणवाचक विशेषत कहलाते हैं, जैसे दो लिटर दूध दें। (दो लिटर निश्चित परिमाण)  तीन मीटर कपड़ा दें। (तीन मीटर – निश्चित परिमाण) 2. अनिश्चित परिमाणवाचकः जो शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम के अनिश्चित परिमाण का बोध कराए वो अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहलाते हैं, जैसे थोड़ा दूध चाहिए। (थोड़ा दूध-अनिश्चित परिमाण) बहुत कपड़े चाहिए। (बहुत कपड़े- अनिश्चित परिमाण) 3. संख्यावाचक सर्वनाम जिस विशेषण से संज्ञा या सर्वनाम की संख्या का बोध हो, उसे संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।  जैसे-दो, चार, पहला, चौथा, दोहरा, चौगुना, आधा, पाव, कुछ, बहुत, सैकड़ों, असंख्य आदि। इसके भी दो उपभेद होते हैं। i.  निश्चित संख्यावाचक  चार लड़के आ रहे हैं। ( चार लड़कें – निश्चित संख्या) ii. अनिश्चित संख्यावाचक  कुछ लड़के आ रहे हैं। (कुछ लड़के अनिश्चित संख्या) 4. सार्वनामिक विशेषण जो सर्वनाम विशेषण के रूप में प्रयुक्त हो, उसे सार्वनामिक विशेषण कहते हैं, जैसे-यह, वह, कपौन, क्या, कोई, कुछ आदि । उपर्युक्त शब्द सर्वनाम और विशेषण दोनों हैं। यदि ये क्रिया के पहले प्रयुक्त हों, तो सर्वनाम और संज्ञा के पहले प्रयुक्त हों, तो सार्वनामिक विशेषण, जैसे यह देखो। (क्रिया के पहले यह- – सर्वनाम) यह फूल देखो। (संज्ञा के पहले यह सार्वनामिक विशेषण) वह खेलेगा। (क्रिया के पहले वह – सर्वनाम ) वह लड़का खेलेगा। (संज्ञा के पहले-वह सार्वनामिक विशेषण) उपर्युक्त बातों से स्पष्ट हो जाता है कि- ‘यह’ और ‘वह’ शब्द सर्वनाम भी हैं और विशेषण भी। यह आप पर निर्भर करता है कि इनका प्रयोग आप किस रूप में करते हैं। अतः इन शब्दों के प्रयोग में सावधानी रखें, अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो सकता है।

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Hindi Grammar Sarvanam paribhasha uske bhed सर्वनाम और उसके भेद

 सर्वनाम सर्वनाम की परिभाषा (sarvanam ki paribhasha) सर्वनाम शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-सर्व + नाम। ‘सर्व’ का अर्थ है सभी तथा ‘नाम’ का अर्थ है संज्ञा। अर्थात् जो शब्द सभी संज्ञा शब्दों के स्थान पर प्रयोग किए जाते हैं, सर्वनाम कहलाते हैं, जैसे-यह, वह, ये, वे, इनका, उनका आदि। सर्वनाम के भेद सर्वनाम के निम्न छह भेद होते हैं :-  पुरुषवाचक सर्वनाम :- मैं, तुम, वह, हम, वे। निश्चयवाचक सर्वनाम :- यह (निकट), वह (दूर)। अनिश्चयवाचक सर्वनाम :- कोई, क्या, कुछ। निजवाचक सर्वनाम :- आप, स्वयं, खुद। संबंधवाचक सर्वनाम :- जो, सो। प्रश्नवाचक सर्वनाम :- कौन, क्या। पुरुषवाचक सर्वनाम जो सर्वनाम पुरुषवाचक या स्त्रीवाचक संज्ञाओं (वक्ता, श्रोता व अन्य) के नाम के बदले आता है, उसे पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं, जैसे-मैं, वह, तू, तुम आदि । पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन उपभेद होते हैं प्रथम पुरुष/उत्तम पुरुषः जिस सर्वनाम का प्रयोग ‘कहने’ या ‘बोलनेवाला’ अपने लिए करता है, उसे ‘उत्तम पुरुष’ कहते हैं, जैसे-मैं, मेरा, मुझे, मुझको, हम, हमारा, हमें (वक्ता)। मध्यम पुरुषः ‘सुनने वाले’ के लिए जिस सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है, उसे ‘मध्यम पुरुष’ कहते है, जैसे तू, तेरा, तुझे, तुझको, आप, आपका, आपको (श्रोता)। अन्य पुरुषः जिस सर्वनाम का प्रयोग ऐसे संज्ञा के लिए हो, जिसके विषय में बात कही जा रही हो, किंतु जो उपस्थित न हो, ऐसे सर्वनाम को ‘अन्य पुरुष’ कहा जाता है, जैसे-यह, वह, ये, 4 वे, उनका, उन्हें, इन्हें । निश्चयवाचक सर्वनाम जिन सर्वनाम शब्दों से वक्ता लिए या दूरस्थ व्यक्ति, वस्तु या घटना का निश्चित बोध होता है, उन्हें निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं, जैसे-यह, वह, ये, वे।  यह मेरी पुस्तक है।  वह उनकी मेज है।  ये मेरे हथियार हैं।  वे तुम्हारे आदमी हैं । अनिश्चयवाचक सर्वनाम जिस सर्वनाम से किसी निश्चित वस्तु या व्यक्ति का बोध नहीं होता है, उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते है, जैसे- कोई, कुछ। कोई आ गया तो क्या करोगे?  चाय में कुछ गिर गया है। निजवाचक सर्वनाम जिस सर्वनाम से अपने आपका (स्वयं) या निज का बोध होता है, उसे निजवाचक सर्वनाम कहते हैं, जैसे- स्वयं, खुद, अपनेआप, स्वतः । मैं अपना काम स्वयं करूँगा। मैं खुद चला जाऊँगा । वह अपनेआप हिंदी पढ़ लेगा। संबंधवाचक सर्वनाम जिस सर्वनाम से दो संज्ञाओं के परस्पर संबंध का ज्ञान हो, उसे संबंधवाचक सर्वनाम कहते है, जैसे- जो, सो  जो मेहनत करेगा वो अवश्य सफल होगा।  वह कमीज कहाँ है, जिसे मैंने खरीदी थी। जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। जैसी करनी, वैसी भरनी। यथा राजा तथा प्रजा । इन सभी वाक्यों में जो, वह / वह, जिसे/जैसा, वैसा / यथा, तथा आदि शब्द संज्ञाओं के परस्पर संबंध को व्यक्त करते हैं। अतः यह संबंधवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। प्रश्नवाचक सर्वनाम जिस सर्वनाम का प्रयोग ‘प्रश्न’ करने के लिए किया जाता है, उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं, जैसे- कौन, क्या। कौन आया है? तुम्हारे पास क्या है?  दूध में क्या गिर गया? यह भी जानें  विभिन्न कारकों में प्रयुक्त होने पर सर्वनाम शब्दों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इसका प्रयोग संबंध में नही होता है, अर्थात् इसमें केवल सात कारक है, जैसे-मैं, मुझसे, मेरे लिए, मेरा, मुझको. मुझपर आदि। कभी-कभी कुछ ‘शब्द-समूह’ भी सर्वनाम के रूप में प्रयुक्त होता है, जैसे-कुछ न कुछ, सब कुछ, कुछ-कुछ, हर कोई, कुछ भी आदि।  सर्वनाम में लिंग भेद से रूपांतर नहीं होता, जैसे- वह जाता है। वह जाती है। सर्वनाम आदर और अनादर का बोध कराता है, जैसे- ‘आप’ से आदर तथा ‘तू’, ‘तुम’ से अनादर का बोध होता है।

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Hindi Grammar Sangya Noun संज्ञा और उसके भेद

संज्ञा किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, भाव आदि का बोध कराने वाले शब्द संज्ञा कहलाते हैं, जैसे- राहुल, पंखा, दिल्ली, चतुराई आदि। संज्ञा के भेद संज्ञा के तीन भेद होते हैं :-  व्यक्तिवाचकः किसी विशिष्ट व्यक्ति, वस्तु या स्थान के द्योतक शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा कहलाते हैं, जैसे-महात्मा गांधी, दिल्ली आदि।  जातिवाचकः किसी वस्तु य प्राणी की संपूर्ण जाति के द्योतक शब्द जातिवाचक संज्ञा कहलाते हैं, जैसे- कक्षा, पालतू जानवर, झुंड आदि जातिवाचक संज्ञा के दो उपभेद निम्न हैं :-   द्रव्यवाचक :- जो शब्द किसी पदार्थ के नाम का बोध कराते हैं, वे पदार्थवाचक / द्रव्यवाचक संज्ञा कहलाते हैं, जैसे वायु, जल, रेत, सोना, चाँदी, ताँबा, जस्ता, हीरा आदि।  समूहवाचक :- जो शब्द किसी समूह के नाम का बोध कराए समूहवाचक संज्ञा कहलाते हैं. जैसे जात्था, मंडली, सेना, कक्षा, झुंड, ढेर, भीड़, सभा, वर्ग, गुच्छा पुंज आदि । भाववाचक :-  जिस शब्द से किसी वस्तु या व्यक्ति के गुण, दोष, दशा, भाव आदि का पता चलता है, उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं, जैसे बुढ़ापा इमानदारी, चतुराई, प्रेम, मिठास, सुंदरता आदि।  ऐसी संवेदनाएँ जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है. छुआ नहीं जा सकता, उन्हें भाव कहते हैं। जातिवाचक संज्ञा से भाववाचक संज्ञा का निर्माण के उदाहरण :-  दानव         –     दानवता  मनुष्य        –     मनुष्यता  लड़का       –     लड़कपन नारी          –     नारीत्व  मानव        –     मानवता  सर्वनाम से भाववाचक संज्ञा का निर्माण :-  अपना          –     अपनत्व , अपनापन  सर्व             –      सर्वस्व  अहं             –     अहंकार मम (मेरा)     –     ममता, ममत्व  निज            –     निजत्व, निजता विशेषण से भाववाचक संज्ञा :-  सम          –      समता, समानता मीठा        –      मिठास  गोरा         –      गोरापन  दुष्ट           –     दुष्टता  शूर           –     शूरता, शौर्य वीर           –     वीरता, विरातव सभ्य         –      सभ्यता क्रिया से भाववाचक संज्ञा :-   खेलना        –      खेल  बनाना         –     बनाना  लूटना          –     लूट  पढ़ना          –      पढ़ाई सजाना        –      सजावट  चीखना        –      चीख  उड़ना           –      उड़ान  अवयय से भाववाचक संज्ञा :-  निकट          –        निकटता समीप          –        समीपता  वाह-वाह       –        वाह-वाही  दूर               –         दूरी  मना             –         मनाही व्यक्ति से भाववाचक संज्ञा :-  रावण           –          रावणत्व  राम              –          रामत्व  भारत           –           भारतीय  जातिवाचक का प्रयोग व्यक्तिवाचक के रूप में :-  गांधी (व्यक्तिवाचक) सत्य और अहिंसा के पुजारी थे।  नेहरू (व्यक्तिवाचक) बच्चों से प्रेम करते थे। इन वाक्यों में गांधी और नेहरू शब्द जातिवाचक होते हुए भी व्यक्तिवाचक के रूप में प्रयोग किए गए हैं। विशेषण का प्रयोग जातिवाचक के रूप में बड़ा-बड़ों (जातिवाचक) का आदर करो। दुखी: दुखियों (जातिवाचक) की मदद करो।  गरीब-गरीबों (जातिवाचक) की सहायता करनी चाहिए। व्यक्तिवाचक का प्रयोग जातिवाचक के रूप में :-  भारत में आज भी सीता-सावित्रियों की कमी नहीं है। हरिश्चंद्र आज के कलियुग में भी विद्यमान हैं।  उक्त वाक्यों में सीता, सावित्री व हरिश्चंद्र जैसे व्यक्तिवाचक शब्दों का प्रयोग जातिवाचक के रूप में किया गया है। क्रियार्थक संज्ञा जब किसी क्रिया का प्रयोग संज्ञा के रूप में किया जाए तो उसे क्रियार्थक संज्ञा कहते हैं, जैसे :-  ध्रुमपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।  झूठ बोलना पाप है। सैर करना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

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