CTET SUCCESS

Child Development & Pedagogy (CDP)

The CDP category focuses on child development and teaching methodology. It is one of the most important subjects for CTET, STET, and other teacher exams. This section includes theory, MCQs, and practice sets. All content is prepared according to the latest exam syllabus.

समावेशी शिक्षा पर यूनिसेफ की रिपोर्ट: हर बच्चे के लिए शिक्षा की राह आसान करता एक वैश्विक प्रयास Inclusive education unicef Report

प्रस्तावना “हर बच्चे के लिए शिक्षा” – यह सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि यूनिसेफ (UNICEF) का मिशन है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) पर हालिया रिपोर्ट दुनिया भर में लाखों वंचित बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस रिपोर्ट के अनुसार, विश्व के 24 करोड़ से अधिक बच्चे (जिनमें से 50% से अधिक लड़कियाँ हैं) शिक्षा से वंचित हैं, जिनमें दिव्यांग बच्चे, आदिवासी समुदायों के बच्चे और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों के बच्चे शामिल हैं। इस ब्लॉग में हम जानेंगे: 1. यूनिसेफ रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष (Key Findings of UNICEF Report) 🔹 वैश्विक स्तर पर शिक्षा में असमानता 🔹 भारत में स्थिति https://www.youtube.com/@studylinebihar रिपोर्ट की मुख्य चेतावनी: “अगर समावेशी शिक्षा पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो 2030 तक SDG-4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा।” 2. समावेशी शिक्षा के लिए यूनिसेफ की सिफारिशें (UNICEF Recommendations) ✅ सरकारों के लिए: ✅ समाज के लिए: ✅ अभिभावकों के लिए: 3. भारत में यूनिसेफ के प्रयास (UNICEF Initiatives in India) 4. हम क्या कर सकते हैं? (How Can We Contribute?) निष्कर्ष: एक कदम समावेश की ओर यूनिसेफ की यह रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि “शिक्षा सभी का अधिकार है, चुनौतियाँ कितनी भी हों।” अगर हम सभी मिलकर प्रयास करें, तो कोई भी बच्चा पीछे नहीं रहेगा। “एक पढ़ा-लिखा बच्चा न सिर्फ अपना, बल्कि पूरे समाज का भविष्य बदल सकता है।” आपके विचार?क्या आपके आस-पास कोई ऐसा बच्चा है जिसे शिक्षा से वंचित रखा गया है? उसकी मदद कैसे कर सकते हैं? कमेंट में बताएँ!

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020): Empowering India through Educational Reforms

परिचय 34 साल बाद भारत की शिक्षा प्रणाली में एक बड़ा बदलाव आया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (National Education Policy – NEP 2020) ने पुरानी शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह से बदलकर 21वीं सदी के अनुरूप एक नई शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी है। यह नीति भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति (Global Knowledge Superpower) बनाने का सपना देखती है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे: 1. NEP 2020 क्या है? (What is NEP 2020?) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई 2020 को लागू की गई एक समग्र शिक्षा नीति है, जो 1986 की शिक्षा नीति को प्रतिस्थापित करती है। इसका मुख्य लक्ष्य है:✅ सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (Access, Equity, Quality)✅ रटंत प्रणाली की जगह कौशल विकास (Skill-Based Learning)✅ भारतीय संस्कृति और मूल्यों को शिक्षा में शामिल करना 2. NEP 2020 के प्रमुख बदलाव (Key Reforms) 🔹 स्कूली शिक्षा में बदलाव 🔹 उच्च शिक्षा में बदलाव 🔹 भाषा नीति 🔹 डिजिटल एजुकेशन 3. NEP 2020 के लाभ (Benefits) ✅ रोजगारपरक शिक्षा: कौशल विकास पर जोर✅ छात्रों को लचीलापन: विषय चुनने की आजादी✅ समावेशी शिक्षा: SC/ST, दिव्यांग और लड़कियों के लिए विशेष प्रावधान✅ ग्लोबल एक्सपोजर: विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग 4. चुनौतियाँ (Challenges) ⚠️ बुनियादी ढाँचे की कमी (ग्रामीण स्कूलों में सुविधाएँ नहीं)⚠️ शिक्षकों का प्रशिक्षण (नई पद्धतियों के लिए तैयार नहीं)⚠️ भाषा विवाद (हिंदी vs. क्षेत्रीय भाषाएँ)⚠️ डिजिटल डिवाइड (गाँव-शहर तकनीकी अंतर) 5. NEP 2020 का भविष्य अगर NEP 2020 को सही तरीके से लागू किया गया, तो यह: निष्कर्ष (Conclusion) NEP 2020 भारत की शिक्षा प्रणाली में एक सुनहरी क्रांति लाने का अवसर है। हालाँकि, इसकी सफलता सरकार, शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों के सामूहिक प्रयास पर निर्भर करती है। “यह नीति नए भारत की नींव है, जहाँ शिक्षा रटने की नहीं, सीखने की होगी!” 34 साल बाद भारत की शिक्षा प्रणाली में एक बड़ा बदलाव आया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (National Education Policy – NEP 2020) ने पुरानी शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह से बदलकर 21वीं सदी के अनुरूप एक नई शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी है। यह नीति भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति (Global Knowledge Superpower) बनाने का सपना देखती है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे: 1. NEP 2020 क्या है? राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई 2020 को लागू की गई एक समग्र शिक्षा नीति है, जो 1986 की शिक्षा नीति को प्रतिस्थापित करती है। इसका मुख्य लक्ष्य है:✅ सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (Access, Equity, Quality)✅ रटंत प्रणाली की जगह कौशल विकास (Skill-Based Learning)✅ भारतीय संस्कृति और मूल्यों को शिक्षा में शामिल करना 2. NEP 2020 के प्रमुख बदलाव (Key Reforms) 🔹 स्कूली शिक्षा में बदलाव 🔹 उच्च शिक्षा में बदलाव 🔹 भाषा नीति 🔹 डिजिटल एजुकेशन 3. NEP 2020 के लाभ (Benefits) ✅ रोजगारपरक शिक्षा: कौशल विकास पर जोर✅ छात्रों को लचीलापन: विषय चुनने की आजादी✅ समावेशी शिक्षा: SC/ST, दिव्यांग और लड़कियों के लिए विशेष प्रावधान✅ ग्लोबल एक्सपोजर: विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग 4. चुनौतियाँ (Challenges) ⚠️ बुनियादी ढाँचे की कमी (ग्रामीण स्कूलों में सुविधाएँ नहीं)⚠️ शिक्षकों का प्रशिक्षण (नई पद्धतियों के लिए तैयार नहीं)⚠️ भाषा विवाद (हिंदी vs. क्षेत्रीय भाषाएँ)⚠️ डिजिटल डिवाइड (गाँव-शहर तकनीकी अंतर) 5. NEP 2020 का भविष्य (Future of NEP 2020) अगर NEP 2020 को सही तरीके से लागू किया गया, तो यह: निष्कर्ष (Conclusion) NEP 2020 भारत की शिक्षा प्रणाली में एक सुनहरी क्रांति लाने का अवसर है। हालाँकि, इसकी सफलता सरकार, शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों के सामूहिक प्रयास पर निर्भर करती है। “यह नीति नए भारत की नींव है, जहाँ शिक्षा रटने की नहीं, सीखने की होगी!”

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समावेशी शिक्षा (Samaveshi Shiksha) Inclusive Education: Empowering Tomorrow

परिचय शिक्षा हर बच्चे का मौलिक अधिकार है, परंतु क्या सभी बच्चों को समान शिक्षा मिल पाती है? समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) का उद्देश्य यही सुनिश्चित करना है कि सामान्य और विशेष आवश्यकता वाले बच्चे एक ही कक्षा में साथ पढ़ सकें। यह न केवल शैक्षिक समानता को बढ़ावा देता है, बल्कि एक सहिष्णु और संवेदनशील समाज के निर्माण में भी मदद करता है। हम जानेंगे: 1. समावेशी शिक्षा क्या है? (What is Inclusive Education?) समावेशी शिक्षा एक ऐसी शिक्षा प्रणाली है जिसमें सभी बच्चे, चाहे उनकी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, एक साथ सीखते हैं। इसमें: उदाहरण: एक कक्षा में दृष्टिबाधित बच्चा, सामान्य बच्चों के साथ बैठकर ब्रेल लिपि और ऑडियो टूल्स की मदद से पढ़ाई कर सकता है। 2. समावेशी शिक्षा के लाभ (Benefits of Inclusive Education) ✅ बच्चों के लिए फायदे: ✅ समाज और शिक्षा प्रणाली के लिए फायदे: 3. भारत में समावेशी शिक्षा की स्थिति (Inclusive Education in India) भारत में समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई नीतियाँ और कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जैसे: चुनौतियाँ: 4. समावेशी शिक्षा को सफल बनाने के उपाय (How to Make Inclusive Education Successful?) 🔹 शिक्षकों का प्रशिक्षण 🔹 स्कूलों में बुनियादी सुविधाएँ 🔹 अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी 🔹 सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास निष्कर्ष (Conclusion) समावेशी शिक्षा न केवल एक न्यायसंगत शिक्षा प्रणाली है, बल्कि यह एक बेहतर समाज का निर्माण करती है। हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दें जहाँ हर बच्चे को सीखने का अवसर मिले, चाहे उसकी स्थिति कुछ भी हो। “शिक्षा सबका अधिकार है, किसी से इनकार नहीं!” क्या आपके स्कूल/समुदाय में समावेशी शिक्षा को लेकर कोई पहल चल रही है? हमें कमेंट में बताएँ! अधिक जानकारी के लिए पढ़ें:

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अभिप्रेरणा और अधिगम Important 20 MCQs on Motivation & Learning

अभिप्रेरणा और अधिगम Important 20 MCQs on Motivation & Learning

अभिप्रेरणा और अधिगम Motivation & Learning important MCQ For Teaching Exams. 2. स्वाभाविक अभिप्रेरणा (Intrinsic Motivation) किसे कहते हैं? 3. बाह्य अभिप्रेरणा (Extrinsic Motivation) किसे कहते हैं? 4. अधिगम का क्या मतलब है? 5. कॉग्निटिव अधिगम (Cognitive learning) का क्या मतलब है? 6. मनोवैज्ञानिक अधिगम (Behavioral Learning) क्या है? 7. अभिप्रेरणा और अधिगम के बीच सबसे महत्वपूर्ण संबंध क्या है? 8. किसके अनुसार “अभिप्रेरणा एक भावात्मक-क्रियात्मक कारक है जो चेतन या अचेतन लक्ष्य की ओर होने वाले व्यक्ति के व्यवहार की दिशा को निर्धारित करता है”? 9. अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का क्या महत्व है? 10. अधिक अभिप्रेरणा के कारण क्या हो सकता है? 11. अधिगम को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षक को क्या करना चाहिए? 12. किसे “अधिगम का सबसे बड़ा अवरोधक” कहा जाता है? 13. “अभिप्रेरणा” शब्द किस भाषा से आया है? 14. अधिगम का मुख्य उद्देश्य क्या है? 15. अधिगम की प्रक्रिया में अभिप्रेरणा की क्या भूमिका है? 16. शिक्षक छात्रों को प्रेरित करने के लिए क्या कर सकते हैं? 17. अधिगम के दौरान क्या होता है? Learn More On This Topic अभिप्रेरणा और अधिगम Answer Related Topic Important Tech Trends

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Motivation and Learning

अभिप्रेरणा एवं अधिगम (Motivation and Learning) Important 1 #CTET2024

अभिप्रेरणा एवं अधिगम: शिक्षा में उनके महत्व को समझना   अभिप्रेरणा और अधिगम (Motivation and Learning) शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक महत्वपूर्ण और आपस में जुड़े हुए दो महत्वपूर्ण तत्व हैं। जहां अभिप्रेरणा व्यक्ति के व्यवहार और क्रियाओं को दिशा देने वाली मानसिक शक्ति है, वहीं अधिगम वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम नए ज्ञान, विचार और कौशल प्राप्त करते हैं। इन दोनों के बीच एक गहरा संबंध है, क्योंकि अभिप्रेरणा बिना अधिगम की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक नहीं लागू किया जा सकता। इस लेख में हम अभिप्रेरणा और अधिगम के महत्व को समझेंगे और यह देखेंगे कि ये दोनों कैसे शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हैं। अभिप्रेरणा: क्या है और इसका महत्व अभिप्रेरणा (Motivation) एक मानसिक और भावनात्मक शक्ति है जो किसी व्यक्ति को किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है। यह एक आंतरिक शक्ति है जो किसी व्यक्ति को अपने लक्ष्यों के प्रति प्रेरित करती है। अभिप्रेरणा का उत्पन्न होना या न होना व्यक्ति की सफलता या विफलता के बीच एक महत्वपूर्ण कारक बनता है। अभिप्रेरणा दो प्रकार की हो सकती है: स्वाभाविक अभिप्रेरणा (Intrinsic Motivation): यह तब उत्पन्न होती है जब किसी व्यक्ति को कार्य में आंतरिक संतोष और खुशी मिलती है। उदाहरण के लिए, पढ़ाई करने से ज्ञान प्राप्ति की खुशी या किसी खेल को खेलने से शारीरिक संतुष्टि मिलना। बाह्य अभिप्रेरणा (Extrinsic Motivation): यह बाहरी पुरस्कारों से प्रेरित होती है, जैसे अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए पढ़ाई करना या नौकरी में पदोन्नति प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करना। अभिप्रेरणा के बिना कोई भी कार्य पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि जब व्यक्ति में कार्य करने की इच्छा और उत्साह नहीं होता, तो वह उस कार्य में दिलचस्पी नहीं लेता और परिणामस्वरूप सफलता से दूर रहता है। अधिगम: क्या है और इसका महत्व अधिगम (Learning) एक निरंतर प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति नए विचारों, ज्ञान, और कौशल को प्राप्त करता है। यह किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत और शैक्षिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अधिगम के द्वारा ही हम अपने अनुभवों, पर्यावरण, और अन्य स्रोतों से जानकारी प्राप्त करते हैं, जिसे हम अपनी ज़िंदगी में लागू कर सकते हैं। अधिगम की प्रक्रिया में व्यक्ति सोचने, समझने, और ज्ञान के विभिन्न पहलुओं को आत्मसात करने की क्षमता विकसित करता है। इसे मुख्य रूप से दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है: कॉग्निटिव अधिगम (Cognitive Learning): इसमें सोचने, समझने, और निर्णय लेने की प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। यह व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं को बढ़ाता है। मनोवैज्ञानिक अधिगम (Behavioral Learning): इसमें व्यक्ति किसी कार्य के परिणामों से सीखता है। यह व्यक्तिगत अनुभवों और पर्यावरण के प्रभाव से संबंधित होता है। अधिगम के बिना जीवन में प्रगति संभव नहीं होती, क्योंकि यह हमें नए विचारों और जानकारी से समृद्ध करता है और किसी भी कार्य को सही ढंग से करने की क्षमता प्रदान करता है। अभिप्रेरणा एवं अधिगम का आपसी संबंध अभिप्रेरणा और अधिगम के बीच एक गहरा और अपरिहार्य संबंध है। जब किसी व्यक्ति में उचित अभिप्रेरणा होती है, तो वह आसानी से अधिगम की प्रक्रिया को अपनाता है। उदाहरण के लिए, एक छात्र जब अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए प्रेरित होता है, तो वह न केवल अध्ययन करता है, बल्कि अध्ययन के दौरान वह नए ज्ञान और कौशल भी प्राप्त करता है। यदि किसी व्यक्ति में अभिप्रेरणा का अभाव हो, तो वह अधिगम की प्रक्रिया को सुचारू रूप से नहीं चला पाता। एक प्रेरित व्यक्ति अधिगम में तेज़ी से प्रगति करता है क्योंकि उसकी मानसिक स्थिति इस प्रक्रिया को ग्रहण करने के लिए तैयार होती है। अभिप्रेरणा के बिना अधिगम असंभव जब व्यक्ति में अभिप्रेरणा की कमी होती है, तो वह अधिगम की प्रक्रिया में रुचि नहीं दिखाता। उदाहरण के लिए, एक छात्र अगर अपनी पढ़ाई में रुचि नहीं रखता या उसे इससे कोई व्यक्तिगत संतोष नहीं मिलता, तो वह अधिगम की प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं लेता। इस स्थिति में, न तो वह अच्छी तरह से जानकारी प्राप्त कर पाता है और न ही उसे सहेजने में सक्षम होता है। यह उसकी अकादमिक प्रगति को प्रभावित करता है। अत्यधिक अभिप्रेरणा भी कभी-कभी नुकसानकारी हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी छात्र पर अत्यधिक दबाव डाला जाए या अगर वह किसी लक्ष्य को पाने के लिए बहुत अधिक उत्साहित हो, तो यह उसे सही दिशा में मार्गदर्शन करने में विफल हो सकता है। इसलिये अभिप्रेरणा का संतुलित होना बहुत जरूरी है। अभिप्रेरणा और अधिगम में शिक्षक की भूमिका शिक्षक अभिप्रेरणा को बढ़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग कर सकते हैं: प्रेरणादायक कार्यों में छात्रों को शामिल करके उनकी रुचि को बढ़ावा देना। छात्रों को लक्ष्य निर्धारण और आत्म-मूल्यांकन के लिए प्रेरित करना। पुरस्कार और सकारात्मक प्रतिक्रिया से छात्रों को प्रोत्साहित करना, ताकि वे अपनी कार्यक्षमता में सुधार ला सकें। शिक्षक जब छात्रों को सही अभिप्रेरणा प्रदान करते हैं, तो छात्र अपने अधिगम को अधिक प्रभावी तरीके से लागू कर सकते हैं। इससे न केवल उनका शैक्षिक प्रदर्शन बेहतर होता है, बल्कि उनके जीवन में संतुलित विकास भी संभव होता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अभिप्रेरणा और अधिगम के संबंध को गहरे रूप से समझें, क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। अभिप्रेरणा के बिना कोई भी व्यक्ति किसी कार्य को पूरी निष्ठा और आत्मविश्वास के साथ नहीं कर सकता, जबकि अधिगम बिना प्रेरणा के सुचारू रूप से नहीं हो सकता। अभिप्रेरणा व्यक्ति के अंदर का वह जज़्बा है जो उसे कठिनाइयों से लड़ने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। यह कोई बाहरी दबाव नहीं, बल्कि आंतरिक उत्साह और इच्छा होती है जो किसी कार्य में सफलता हासिल करने के लिए व्यक्ति को मानसिक रूप से तैयार करती है। बिना अभिप्रेरणा के, अधिगम की प्रक्रिया बहुत धीमी और निराशाजनक हो सकती है, क्योंकि बिना प्रेरणा के लोग किसी कार्य को अधूरा छोड़ सकते हैं। दूसरी ओर, अधिगम एक सतत और निरंतर प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति नए विचार, कौशल और जानकारी प्राप्त करता है। यदि किसी व्यक्ति में सही अभिप्रेरणा हो, तो वह जल्दी से सीखने और अपनी क्षमताओं को विकसित करने में सक्षम होता है। इसलिए, यदि हम चाहते हैं कि विद्यार्थी बेहतर तरीके से सीखें, तो हमें उनके अंदर सही प्रकार की अभिप्रेरणा

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राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा NCF 2005 National Curriculum Framework

NCF 2005 : राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा National Curriculum Framework

    NCF 2005: NCF का full form है National Curriculum Framework (राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा NCF 2005). प्रोफेसर कृष्ण कुमार जो केंद्रीय शिक्षा संस्थान (Central Institute of Education), दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे।  2004 से 2010 तक एनसीईआरटी NCERT के निदेशक के रूप में, उन्होंने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के प्रारूपण का निरीक्षण किया।  बच्चों को क्या और कैसे पढ़ाया जाए? What and How to Teach Children? NCF 2005 ( राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा ) इन्हीं प्रश्नों पर ध्यान केन्द्रित कराने हेतु एक अति महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है कि बच्चो को कैसे पढ़ाया जाए। इसका मुख्य सूत्र है Learning Without Burden (शिक्षा बिना बोझ के) सामाजिक न्याय और समानता के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित एक धर्मनिरपेक्ष, समतामूलक और बहुलतावादी समाज के आदर्श से प्रेरणा लेते हुए इस दस्तावेज में शिक्षा के कुछ व्यापक उद्देश्य चिह्नित किए गए हैं। इनमें शामिल हैं, विचार और कर्म की स्वतन्त्रता, दूसरों की भलाई और भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता, नई स्थितियों का लचीलेपन और रचनात्मक तरीके से सामना करना, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में भागीदारी की प्रवृत्ति और आर्थिक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक बदलाव में योगदान देने के लिए काम करने की क्षमता। अगर शिक्षा को जीने के लोकतान्त्रिक तरीकों को सुदृढ़ करना है तो उसे स्कूल में जाने वाली पहली पीढ़ी की उपस्थिति का भी ध्यान रखना ही होगा जिसका स्कूल में बने रहना उस संविधान संशोधन के चलते अनिवार्य हो गया है जिसने आरम्भिक शिक्षा को हर बच्चे का मौलिक अधिकार बना दिया है। संविधान के इस संशोधन से हम पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि हम सारे बच्चों को जाति, धर्म सम्बन्धी अन्तर, लिंग और असमर्थता सम्बन्धी चुनौतियों से निरपेक्ष रहते हुए स्वास्थ्य, पोषण और समावेशी स्कूली माहौल मुहैया कराएँ जो उनको शिक्षा ग्रहण में मदद पहुँचाएँ तथा उन्हें सशक्त बनाएँ। हमारे शैक्षिक उद्देश्यों और शिक्षा की गुणवत्ता में आज गहरी विकृति आ गई है, इसका प्रमाण यह तथ्य है कि शिक्षा बच्चों और उनके माँ-बाप के लिए तनाव और बोझ का कारण बन गई है ।        राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का परिप्रेक्ष्य Perspective NCF 2005     इस भाग में NCF राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का परिचय, पश्चावलोकन, मार्गदर्शक सिद्धान्त, गुणवत्ता के आयाम, शिक्षा का सामाजिक सन्दर्भ तथा शिक्षा का लक्ष्य जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों का समावेश है। इस भाग के महत्त्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं :-    ‘शिक्षा बिना बोझ के’ की सूझ के आधार पर पाठ्यचर्या के बोझ को कम करना ।  पढ़ाई को रटंत प्रणाली से मुक्त रखते हुए स्कूली ज्ञान को बाहरी जीवन से जोड़ा जाना चाहिए।  पाठ्यक्रम का इस प्रकार संवर्द्धन किया जाना जिससे कि बच्चों के चहुँमुखी विकास के अवसर उपलब्ध हो सकें। इस तथ्य को समझना कि शिक्षा के लक्ष्य, समाज में तत्कालीन महत्त्वकांक्षाओं व जरूरतों के साथ शाश्वत मूल्यों तथा समाज के सरोकारों के साथ वृहद् मानवीय आदर्शों को भी प्रतिबिम्बित करते हैं। ऐसे नागरिक वर्ग का निर्माण करना, जो लैंगिक न्याय, मूल्यों, लोकतान्त्रिक व्यवहारों, अनुसूचित जनजातियों और विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों की समस्या की और आवश्यकताओं के प्रति संवेदन शील हो तथा उनमें राजनीतिक एवं आर्थिक प्रक्रियाओं में भाग लेने की क्षमता हो।      सीखना और ज्ञान Learning and Knowledge   इस भाग में सक्रिय विद्यार्थियों की प्राथमिकता, विद्यार्थी को सन्दर्भ में रखना, विकास और सीखना तथा पाठ्यचर्या एवं व्यवहार के लिए निहितार्थ जैसे विषयों का समावेश है। इस भाग के महत्त्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं :-      समाज में मिलने वाली अनौपचारिक शिक्षा, विद्यार्थी में अपना ज्ञान स्वयं सृजित करने की स्वाभाविक क्षमता को विकसित करती है। बाल केन्द्रित शिक्षा का अर्थ है बच्चों के अनुभवों, उनके स्वरों और उनकी सक्रिय सहभागिता को प्राथमिकता देना।  प्राथमिक स्कूल से विश्वविद्यालय तक शारीरिक एवं भावात्मक सुरक्षा प्रत्येक प्रकार से सीखने की आधार शिला है।  बच्चे उसी वातावरण में जल्दी सीखते हैं जिसमें उन्हें लगे कि उन्हें महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।    सभी बच्चों की स्वतन्त्र खेलों, अनौपचारिक व औपचारिक खेलों, योग आदि की गतिविधियों में सहभागिता उनके शारीरिक तथा मनो-सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है।  संज्ञान का अर्थ है, कर्म व भाषा के माध्यम से स्वयं और दुनिया को समझना।  आस-पास के वातावरण, प्रकृति, चीजों व लोगों से कार्य व भाषा दोनों के माध्यम से अन्तःक्रिया करना, सीखने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है।    शिक्षक एक उत्प्रेरक है, जो विद्यार्थियों को अभिव्यक्ति के लिए और ज्ञानार्जन के क्रम में व्याख्या और विश्लेषण करने के लिए प्रोत्साहित करता है।  समावेशी कक्षा के शिक्षक की पाठ योजना और इकाई योजना को इस ओर इंगित करना चाहिए कि वह बच्चों की आवश्यकतानुसार कक्षा में जारी गतिविधि को बदल सके।  विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र, विभिन्न मुद्दों पर उनके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक पहलुओं के सन्दर्भ में आलोचनात्मक चिन्तन का अवसर प्रदान करता है। बच्चों की बुनियादी क्षमताएँ उनके बौद्धिक विकास, मूल्यों और कौशलों के लिए एक वृहत् आधार तैयार करती है।  अवलोकन, अन्वेषण, विश्लेषणात्मक विमर्श तथा ज्ञान की विषय-वस्तु विद्यार्थियों की सहभागिता के प्रमुख क्षेत्र हैं।      पाठ्यचर्या के क्षेत्र, स्कूल की अवस्थाएँ और आकलन Scope of Curriculum, Stages of School and Assesment     इस भाग में भाषा, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला शिक्षा, स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा, काम और शिक्षा, आवास और सीखना अध्ययन और आकलन की योजनाएँ तथा आकलन और मूल्यांकन जैसे विषयों का समावेश है।   इस भाग के महत्त्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं :-    बहुभाषिता एक ऐसा संसाधन है जिसकी तुलना सामाजिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर किसी अन्य राष्ट्रीय संसाधन से की जा सकती है।  द्विभाषी/बहुभाषी क्षमता संज्ञानात्मक वृद्धि, विस्तृत, चिन्तन, सामाजिक सहिष्णुता और बौद्धिक उपलब्धियों के स्तर को बढ़ाती है।  भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों की प्राथमिक स्तर पर शिक्षा व्यवस्था उनकी मातृभाषा में करना उनके संज्ञानात्मक विकास के लिए आवश्यक है।  गणितीय अवधारणाओं को विभिन्न तरीकों से निरूपित करना गणितीय सामर्थ्य को बढ़ाता है।  प्रत्यक्षीकरण तथा निरूपण जैसे कौशलों के विकास में गणित बहुत सहायक सिद्ध होता है।  गणित शिक्षण का मुख्य लक्ष्य तार्किक ढंग से सोचने, अमूर्तनों का निर्माण करने तथा संचालित करने की योग्यता का विकास करने से होना चाहिए। विज्ञान गत्यात्मक और निरन्तर परिवर्द्धित ज्ञान का एक ऐसा भण्डार है जिसमें अनुभव के नवीन क्षेत्रों को शामिल किया जाता है।  विज्ञान की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे शिक्षार्थी तरीकों एवं प्रक्रियाओं का बोध करने में सक्षम

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अधिगम में सहायक कारक : व्यक्तित्व और पर्यावरणीय Factors Conducive to Learning : Personality and Environmental #ctetexam24

  अधिगम में सहायक कारक : व्यक्तित्व और पर्यावरणीय Factors Conducive to Learning : Personality and Environmental  #cdp #ctet #pedagogy #ctetexam   ‘सीखना’ निरन्तर चलने वाली एक सार्वभौम प्रक्रिया है, प्रत्येक व्यक्ति नित्यप्रति अपने जीवन में नये-नये अनुभव प्राप्त करता रहता है, ये नवीन अनुभव व्यक्ति के व्यवहार में वृद्धि एवं संशोधन करते हैं, शिशु को जन्म के कुछ समय बाद से ही उसे अपने वातावरण में कुछ-न-कुछ सीखने को मिल जाता है, बालक की सीखने की क्रिया की शुरुआत सर्व प्रथम परिवार से ही होता है फिर वह समाज, पास-पड़ोस, मित्र- मण्डली आदि से सीखना आरम्भ करता है, सीखने में उसका पर्यावरण एवं उसकी व्यक्तिगत विशेषताएँ एक सहायक कारक के रूप में बालक को सीखने में योगदान करते हैं।   यहाँ पर हम सीखने में सहायक व्यक्तिगत एवं पर्यावरणीय कारकों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं :-  व्यक्तिगत रुचि इच्छा परिपक्वता अभिप्रेरणा (आंतरिक) दृढ़ता स्व-अध्ययन की विधि  चिंता या दुश्चिंता  थकान वातावरणीय परिवार का वातावरण  स्कूल का वातावरण समाज का वातावरण कक्षा का भौतिक वातावरण अध्यापन विधि शिक्षक का व्यक्तित्व अध्ययन सामग्री विषय का स्तर पुरस्कार एवं दंड   व्यक्तिगत कारक 1. रुचिः–  बालक में सीखने की रुचि होगी तो वह जल्दी सीख सकेगा साथ ही जिस विषयवस्तु को सीखना चाहेगा उसी आसानी से सीख सकेगा। जिन बालकों में विषयवस्तु के प्रति रुचि नहीं होगा तो उन्हें उस विषय को सीखना कठिन होगा। 2. परिपक्वताः–  परिपक्वता अधिगम को प्रभावित करती है। इस बात का समर्थन कई मनोवैज्ञानिकों ने कियाए, जैसे- जीन पियाज़े आदि। जो बालक शारीरिक व मानसिक रूप से परिपक्व होते हैं वे तुलनात्मक रूप से अन्य बालकों की अपेक्षा जल्दी सीख लेते हैं। परिपक्वता आनुवंशिकता से प्रभावित होती है। 3. बुद्धि:–  जिन बालकों में 1.Q. का स्तर अधिक है. वो बालक अपेक्षाकृत दूसरे बालकों से अधिक जल्दी सीख लेते हैं, क्योंकि अधिक 1.Q. वाले बालक अधिकांशतः समझकर सीखते हैं। 4. चिंता या तनावः-  बालक परीक्षा या पढ़ाई करते समय यदि बहुत ज्यादा तनाव या चिंता करें तो अधिगम सही से नहीं कर पाएँगे लेकिन चिंता तो हो परंतु उसकी मात्रा यदि कम हो तो वो लाभकारी होगा। 5. अभिप्रेरणा:-  अभिप्रेरणा का प्रारंभिक बिंदु आवश्यकता है और आवश्यकता के अनुरूप ही बालक अधिकांशतः अधिगम करता है; जैसे- जब वह कक्षा – 2 पास कर कक्षा 3 में जाता है तब वह कक्षा – 3 की पुस्तकें पढ़ता है उनकी बातें सीखना चाहता है न कि कक्षा-2 के अध्याय को पुनः पढ़ता है। 6. स्व – अध्ययन की विधिः-  बालक यदि किसी विषयवस्तु को समझकर उसका संप्रत्यय (Concept) निर्माण कर सीखता है तब उसे आसानी होती है, लेकिन जब वह सिर्फ रटकर सीखना चाहता है तब अधिगम सही ढंग से नहीं हो पाता है।   वातावरणीय कारक   1. परिवार, स्कूल, समाजः-  बालक के अधिगम में उसके परिवार, स्कूल तथा समाज के वातावरण का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। परिवार का माहौल खुशनुमा तथा अच्छा व तनाव रहित होता है वहाँ बालकों के मस्तिष्क का विकास अच्छा होगा व स्वस्थ रहेगा। उसका प्रभाव अधिगम पर भी पड़ेगा। परिवार में यदि तनाव, लड़ाई-झगड़े होते रहेंगे तो निश्चय ही इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।  स्कूल व कक्षा के भौतिक वातावरण का भी बालक के अधिगम पर प्रभाव पड़ता है। अँधेरापन, हवा, रोशनी फर्नीचर, शोरगुल, अनुशासन आदि का प्रभाव अधिगम पर पड़ता है। समाज व आस -पड़ोस का भी अधिगम पर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि बालक में विश्वास, आस्था, संस्कृति, सामाजिक नियमों, रीति-रिवाज, आदर्श, मूल्यों का भी अधिगम पर प्रभाव पड़ता है। ये सभी समाज से ही सीखे जाते हैं।   2. शिक्षक का व्यक्तित्व तथा अध्यापन विधिः-  शिक्षक का व्यक्तित्व जितना अच्छा होगा (यहाँ पर आंतरिक व्यक्तित्व महत्त्वपूर्ण है) उसका उतना ही अच्छा प्रभाव बालकों पर पड़ेगा। शिक्षक एक अच्छे प्रेरक की भूमिका निभाते हुए बालकों में अधिगम की आवश्यकता को महत्त्व देते हुए अधिगम करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।   3. विषय का स्तर:- यदि विषय की विषय-व -वस्तु सरल हो तो वो आसानी से अधिगम कर सकता है और यदि विषय की विषय-वस्तु कठिन है तो उसे अधिगम करने में कठिनता होगी।   4. शिक्षा के अनौपचारिक साधनः- बालक औपचारिक व अनौपचारिक दोनों प्रकार के साधनों से अधिगम करता है। ज्यादातर पारंपरिक रूप से औपचारिक साधन द्वारा ही प्राप्त करने पर बल दिया जाता है, लेकिन अनौपचारिक शिक्षा के साधन भी वर्तमान में अधिगम कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वर्तमान अधिगम कराने का मुख्य उद्देश्य है व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास हो इसके लिए दुनिया, समाज, खेल – कूद आदि के प्रति भी रुचि व जानकारी होना जरूरी है। अनौपचारिक शिक्षा के साधन रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, समाचार-पत्र, पुस्तकालय, चल-चित्र आदि हैं।   Trending news Some important Topics of CDP👇👇👇👇👇👇👇👇 Pavlovs-classical-conditioning-theoryThorndikes-law-of-learning-part-1 Gender-issues-in-social-construction Thorndikes-law-of-learning  Socialization-process समाजीकरण की प्रक्रिया Evaluation-of-learning | मूल्यांकन individual-difference | व्यक्तिक विभिन्नता              

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प्रतिभाशाली, सृजनात्मक तथा विशेष आवश्यकता वाले बालक Talented, Creative and Children with Special Need #ctet2024

                            प्रतिभाशाली, सृजनात्मक तथा विशेष आवश्यकता वाले बालकTalented, Creative and Children with Needs     प्रतिभाशाली बालक ( Talented Children) :-    प्रतिभाशाली बालकों को ‘विशिष्ट बालकों’ की श्रेणी में इसलिए रखा गया है; क्योंकि वे उच्च बुद्धि एवं अभिक्षमताओं (Aptitudes) से संपन्न होते हैं तथा ऐसे बालक, जिन की बुद्धिलब्धि 120 से ऊपर होती है, प्रतिभाशाली बालक होते हैं, यथार्थ रूप से 2% से अधिक बालक विद्यालय में इस श्रेणी में नहीं होते, किंतु इसमें कुछ बालक ऐसे हो सकते हैं जिनकी बुद्धि लब्धि 170 और 180 भी हो सकती है। इस योग्यता का बालक भी हमारे सामने एक समस्या का रूप ले सकते हैं; क्योंकि उनकी स्वयं की समस्याएँ बड़ी जटिल होती है। साथ-ही-साथ उनके लिए किस प्रकार के विद्यालय का संगठन तथा प्रबंध हो, यह निर्णय करना भी कठिन है।इस प्रकार के बालक एक साधारण बालक से बहुत अधिक योग्य होते हैं। वे लोग उस कार्य को बहुत शीघ्रता से कर सकते हैं जो एक साधारण बालक नहीं कर सकता। इसके साथी ही प्रतिभाशाली बालकों को यदि यथा एवं उचित समय निर्देशन न प्रदान किया जाए तो वे अपनी उत्तम बुद्धि का अनुचित प्रयोग करने लगते हैं तथा अनुशासनहीन गुटबंदी में सम्मिलित होकर, समाज कार्य करने लगते हैं।     प्रतिभाशाली बालकों की विशेषताएँ (Characteristics of Talented Children) :-    प्रतिभाशाली बालकों में कई प्रकार की विभिन्नताएँ होती हैं। प्रतिभाशाली बालकों के समूह में समरूपता होना आवश्यक नहीं। इन प्रतिभाशाली बालकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित गुणों से संबंधित होती हैं   1. शारीरिक विशेषताएँ :-    (i) शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है और यह विकास कद, भार, चलना, बोलना आदि के रूप में होता है।      (ii) विशिष्ट बुद्धि वाले बच्चों में उत्तम स्वास्थ्य होता है और शारीरिक दोष बहुत कम होते हैं।   (iii) इन बच्चों की ज्ञान इंद्रियाँ प्रखर होती हैं।    (iv) प्रतिभाशाली बालकों में किशोरावस्था के लक्षण शीघ्र दिखाई देते हैं।   2. संवेगात्मक विशेषताएँ :-   (i) संवेगात्मक रूप से प्रतिभाशाली बालक स्थिर और समायोजन से युक्त होते हैं।   (ii) सामान्य तथा प्रसन्न रहते हैं और समस्याओं व कठिनाइयों को स्वतंत्र रूप से हल करना चाहते हैं।   (iii) नवीन व्यक्तियों, स्थानों और परिस्थितियों में ये बालक शीघ्र ही समायोजन कर लेते हैं।   (iv) इसका चरित्र और व्यक्तित्व दूसरे बालकों से श्रेष्ठ होता है।   (v) ये बालक विनोदप्रिय होते हैं।   (vi) ये आत्मविश्वासी एवं जोखिम उठाने वाले होते हैं।   (vii) इस प्रकार ये बालक सामाजिक दृष्टि से भी सुदृढ़ होते हैं।        3. सामाजिक विशेषताएँ :-    (i) ये बालक सामाजिक रूप से अधिक परिपक्व तथा सर्वप्रिय होते हैं।   (ii) इनमें उत्तरदायित्व की भावना, ईमानदारी और विश्वसनीयता पायी जाती है।   (iii) इनमें नेतृत्व की विशेषताएँ बहुत होती है।    (iv) ऐसे बालक घर, स्कूल तथा समुदाय के अन्य कार्यों की जिम्मेदारी लेना बहुत पसंद करते हैं।    (v) अनुशासनपालक व एक-दूसरे को सम्मान करने वाले होते हैं।   (vi) ऐसे बालक लोकप्रिय व्यक्तित्व वाले होते हैं।       4. संवेगात्मक विशेषताएँ :-     (i) नियमित रूप से विद्यालय में उपस्थित रहते हैं।   (ii) बौद्धिक रूप से सर्वश्रेष्ठ होते हैं तथा शैक्षिक उपलब्धि को बहुत महत्त्व देते हैं।   (iii) निर्धारित पाठ्य-पुस्तकों के अतिरिक्त सहायक पुस्तकों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने में रुचि लेते हैं।   (iv) ऐसे बालक शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं।   (v) पुरस्कार और छात्रवृत्तियाँ जीतने में भी प्रतिभाशाली बालक सबसे आगे रहते हैं।   (vi) अपेक्षाकृत कम समय और परिश्रम में अधिक अंक प्राप्त करते हैं।   (vii) अन्य प्रतिभाशाली बालकों से प्रतिस्पर्धा रखते हैं।       5. बौद्धिक विशेषताएँ :-      (i) प्रतिभाशाली बालक मानसिक रूप से सामान्य बालकों से श्रेष्ठ होते हैं।   (ii) इनमें सीखने, समझने, स्मरण तथा तर्क करने की विशेष क्षमता होती है।   (iii) ऐसे बालकों में ज्ञान की जिज्ञासा, मौलिकता तथा दृढ़ इच्छा शक्ति पायी जाती है।   (iv) उत्तम कल्पनाशक्ति एवं अंर्तदृष्टि होती हैं।    (v) तर्क करने की योग्यता सामान्य बालकों से अधिक होती हैं।   (vi) ऐसे बालकों में अवधान का विस्तार भी अधिक होता है।   (vii) ध्यान केंद्रित करने की व्यापक क्षमता होती. हैं।   (viii) इनका अधिगम तीव्र गति से होता है और सरलता से होता है।   (ix) ये स्पष्टवादी, फुर्तीले और श्रेष्ठ आत्म अभिव्यक्ति वाले होते हैं।   (x) एक या एक से अधिक क्षेत्रों में विशिष्ट योग्यता होती है।     6. नकारात्मक विशेषताएँ :-    प्रतिभाशाली बालकों में सामाजिक दृष्टि से कुछ नकारात्मक विशेषताएँ भी देखने को मिलती हैं। इन नकारात्मक विशेषताओं का विकास संभवतः उनकी प्रतिभा का समुचित पोषण एवं उपयोग न करने के कारण होता हैं। कुछ नकारात्मक विशेषताएँ निम्न हैं :-    1. प्रतिभाशाली बालक कई कार्यों में लापरवाह हो जाते हैं।   2. कभी-कभी ईर्ष्यालु एवं अंहकारयुक्त व्यवहार करने लगते हैं।   3. ऐसे बालकों की रुचि दूसरों की आलोचना में अधिक होती है।   4. कभी-कभी आवश्यकता से अधिक बोलना तथा हठ करना।   5. पाठ्यक्रम को सरल समझने के कारण पढ़ने-लिखने में आलस्य प्रदर्शित करते हैं।    6. इस श्रेणी के बालक नटखट और शोर मचाने वाले होते हैं।       प्रतिभाशाली बालकों की शिक्षा :-      1. प्रतिभाशाली बालकों के लिए अपने को व्यवस्थापित करना कठिन होता है क्योंकि पाठशाला की परिस्थितियाँ एक विशेष प्रकार की होती है। हमें प्रतिभाशाली बालक को पढ़ने की तीव्र गति के लिए व्यवस्था करना चाहिए। प्रतिभाशाली बालकों के लिए विशेष कक्षाओं की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।   2. सभी सामान्य और प्रतिभाशाली बालकों को सीखने के लिए समान अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। सभी को अपनी-अपनी प्रतिभा के विकास की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।   3. प्रतिभाशाली बालकों को कक्षा के बाहर की उन क्रियाओं में भी भाग लेना चाहिए जो उनकी शिक्षा से संबंधित नहीं होतीं हैं। यह आशा की जा सकती है कि प्रतिभाशाली बालक उन क्रियाओं का नेतृत्व करे, किंतु अध्यापक को उन्हें नेतृत्व पद अपनी स्वयं की इच्छा के आधार पर नहीं देना चाहिए, नहीं तो दूसरे क्षेत्र इनसे ईर्ष्या करने लगेंगे।   4. जो बालक विशेष रूप से प्रतिभाशाली होते हैं उनको अति विशेष ध्यान की आवश्यकता होती है। अध्यापक उनका व्यक्तिगत रूप से ध्यान

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पिछड़े, विकलांग तथा मानसिक रूप से पिछड़े बालक Backward Disabled and Mentally Retarded Children ctet success eductet

पिछड़े, विकलांग तथा मानसिक रूप से पिछड़े बालक Backward Disabled and Mentally Retarded Children #ctet2024

      पिछड़े, विकलांग तथा मानसिक रूप से पिछड़े बालक (Backward Disabled and Mentally Retarded Children) #ctet #cdp #pedagogy  पिछड़ा बालक :- पिछड़े बालक वे बालक होते हैं जो अपने समान उम्र के जो कक्षा बालकों से कम उम्र के बालकों के समान शैक्षिक योग्यता रखते हैं। उदाहरण :-  रोहित नामक एक छात्र, 8 में पढ़ता है तथा उसकी उम्र 16 वर्ष है वहीं 16 वर्ष के छात्र लगभग 10वीं की परीक्षा पास कर चुके होते हैं ऐसे में रोहित शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा बालक हुआ। सामान्यतः शैक्षिक पिछड़ापन भी दो प्रकार का पाया जाता है- सामान्य पिछड़ापन, विशिष्ट पिछड़ापन । सामान्य पिछड़ापन :-  से तात्पर्य यह है कि बालक जिस कक्षा में अपनी उम्र के अनुसार होना चाहिए उस कक्षा के सभी विषयों में शैक्षिक उपलब्धि कम हो अर्थात् सभी विषयों में पिछड़ा हो। विशिष्ट पिछड़ापन :- से तात्पर्य यह है कि बालक अपनी उम्र के अनुसार की कक्षा में किसी एक या दो विषयों में पिछड़ा हुआ हो । पिछड़ेपन की विशेषताएँ Characteristics of Backward Children:-  पिछड़े बालक सामान्य बालक अपेक्षाकृत मंद गति से सीखते हैं की। पिछड़े बालकों का सामान्य बालक के साथ समायोजन भी ठीक से नहीं हो पाता है। इसी कारण से पिछड़े बालकों में कक्षा में आपस में अधिक भिन्नता देखी जाती है। पिछड़े बालक किसी समस्या पर सूक्ष्म रूप से चिंतन नहीं कर सकते हैं। इन बालकों में एकाग्रता की कमी पायी जाती है। योग्यता के अनुरूप इनकी शैक्षणिक उपलब्धि कम होती हैं। बालक के शैक्षणिक पिछड़ेपन का प्रभाव उनके दूसरे क्षेत्रों के कार्यों में भी देखने को मिलता है। (परंतु ऐसा सर्वथा हो यह आवश्यक नहीं है)   पिछड़ेपन के कारण Causes of Backwardness :-  पिछड़ेपन के कई कारण हो सकते हैं जिनमें निम्न कुछ प्रमुख कारण हैं :-  बालक की बुद्धिलब्धि का कम होना या मंद होना। बालक का शारीरिक स्वास्थ्य सही नहीं होना; जैसे- सिर में दर्द, पाचन सही नहीं हो पाना, अकसर गैस बनना, अन्य रोगों आदि का होना। बालक के शारीरिक दोष का होना; जैसे-ज्ञानेंद्रियों में दोष, बोलने में दोष, विकलांगता, निर्बलता आदि। पारिवारिक स्थिति अगर सही नहीं हो; जैसे- – माता-पिता में झगड़ा होते रहना, आर्थिक तंगी, उचित वैवाहिक समायोजन का अभाव, भोजन का न मिलना, आदि।  स्कूल की वातावरणीय स्थिति इसका एक प्रमुख कारण है। स्कूल भवन की कमी या अपर्याप्तता, गंदे, संकीर्ण तथा शोरगुल वाले वातावरण में विद्यालय का स्थित होना, दोषपूर्ण पाठ्यक्रम, दोषपूर्ण शिक्षण विधि, शिक्षक का आचरण आदि। बालकों में संवेगात्मक अस्थिरता अर्थात् बालक संवेगात्मक रूप से स्थिर न हो, जैसे- जरा-जरा सी बात पर आक्रमक होना या फिर रोने लगना। आदि। इससे बालक का आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है। बालक समाज का हिस्सा है और ऐसे में वह समाज से काफी प्रभावित होता है। सामाजिक परिवेश के कारण कई बार बालक स्कूल में कम समय व्यतीत करना चाहता है तथा वह स्कूल से भागने के तरीके ढूँढ़ता है। इस कारण भी वह कक्षा में पढ़ाए गए पाठ्यक्रम को नहीं सीख पाता है।  इसके अन्य कारण भी हैं: जैसे-मित्र – समूह, मित्र-समूह, टेलीविजन, सिनेमा आदि जो बालकों को प्रभावित करते हैं।   पिछड़ेपन को दूर करने के उपाय :-  बालक के शारीरिक दोषों की जांच कर उसका निराकरण करना। बालकों को पौष्टिक आहार के प्रति जागरूक करना तथा सरकार की ओर से ऐसे आहार को प्रदान किया जाना । बालकों के स्वास्थ्य की जाँच करना । बालक पर व्यक्तिगत ध्यान देकर उनकी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। बालक जो पढ़ाई के प्रति रुचि नहीं दिखलाते उन्हें शिल्पकला, हस्तकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, खेल या अन्य क्षेत्रों में उनके रुचि के अनुकूल आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। विद्यालय तथा परिवार का वातावरण उचित बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। परिवार का वातावरण उचित बन सके इसके लिए बालक के माता-पिता से भी आवश्यकतानुरूप बात करनी चाहिए। स्कूल से भागने की प्रवृत्ति का कारण जानकार उसका निवारण ढूँढ़ने का प्रयास करना चाहिए।   मानसिक रूप से पिछड़े बालक Mentally Retarded Children :-  ऐसे बालक जिनकी मानसिक योग्यता सामान्य मानसिक योग्यता से कम तथा सम आयु वर्ग के सामान्य बालक की मानसिक योग्यता की तुलना में मात्रात्मक व गुणात्मक रूप से कम होती है। इसका कारण अकसर शारीरिक या मानसिक रोग होता है और इस दोष के कारण इनमें कई प्रकार की हींन-ग्रंथियाँ (inferiority complex) पैदा हो जाती है। इन बालकों की बुद्धिलब्धि सामान्यतः 80 से कम होती है। मानसिक पिछड़ेपन या मन्दबुद्धिपन की विशेषताएँ Characteristics of Mentally Retarded or Dullness :-  मन्दबुद्धिपन या मानसिक रूप से पिछड़े बालकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-  ऐसे बालक सामान्य बालकों की अपेक्षा धीरे-धीरे विकसित होते हैं। अपूर्ण और दोषपूर्ण शब्दावली लघु अवधान-विस्तार सामान्यीकरण करने सम्बन्धी अयोग्यता प्रयोग की दोषपूर्ण आदतें निरन्तर अस्वस्थता शारीरिक रूप से भी हीन होते हैं संवेगात्मक अस्थिरता का होना सीमित और साधारण रुचियाँ धीमी प्रतिक्रियाएँ मौलिकता का अभाव अनैतिकता और अपराध की ओर झुकाव मानसिक पिछड़ेपन या मन्दबुद्धिपन के कारण Reasons of Mentally Retarded or Dullness :-  वंशानुक्रम इसका महत्त्वपूर्ण कारण है। इसके लिए काफी हद तक गुणसूत्रों का दोष होता है। शारीरिक बीमारियों के कारण गर्भावस्था के दौरान माँ का असामान्य स्थिति होने के कारण, या समय से काफी पहले जन्म होना, जैसे-सातवें माह आदि में तब बालक का मानसिक विकास कम होता है।  बालक संवेग पर यदि उचित नियंत्रण नहीं कर पाता है तब भी उसके अंदर कई प्रकार की मानसिक व्याधियाँ घर कर जाती हैं।   मंद बुद्धि बालकों की समस्याएँ Problem of Mentally Retarded Children :-  ऐसे बालकों में मुख्य रूप से समायोजन की समस्या होती है, परिवार, मित्र-समूह, स्कूल या समाज सभी जगह लगभग इन्हें उपेक्षित किया जाता है तथा इनके अंदर हीनता की भावना भर जाती है जिसके कारण इनका समायोजन सही नहीं हो पाता है। इनका शारीरिक व मानसिक विकास भी सामान्य बालक की तरह नहीं हो पाता है। मंद बुद्धि बालकों के लिए शिक्षा-व्यवस्था Education for Mentally Retarded Children :-  मंद बुद्धि के बालकों के शिक्षा के संदर्भ में मुख्य बात यह है कि शिक्षा उन्हें ऐसी दी जाए जिससे वो आत्मनिर्भर बन सकें। स्वयं की देखभाल, आर्थिक स्वालंबी, सामाजिक प्रशिक्षण को ध्यान में रखते हुए शैक्षिक कार्यक्रम बनाने चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य :-  आत्मविश्वास की भावना जागृत हो। आर्थिक स्वालंबी बनाने वाली हो।  व्यक्तिगत स्वच्छता की आदत का विकास करे। समाज तथा स्कूल में समायोजन

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समावेशी शिक्षा : Inclusive Education

समावेशी शिक्षा Inclusive Education #ctet2024

  समावेशी शिक्षा Inclusive Education समावेशी शिक्षा को सभी व्यक्तियों की समानता के अधिकार को पहचानने और सभी बालकों को विशिष्ट आवश्यकताओं के साथ-साथ शिक्षा के समान अवसर के रूप में देखा जाता है। समावेशी शिक्षा अपंग बालकों की शिक्षा सामान्य स्कूल तथा सामान्य बालकों के साथ कुछ अधिक सहायता प्रदान करने की ओर इशारा करती है। शारीरिक तथा मानसिक रूप से बाधित बालकों को सामान्य बालकों के साथ सामान्य कक्षा में विशिष्ट सेवाएँ देकर विशिष्ट आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए शिक्षा देने में सहायता करती हैं। समावेशी शिक्षा की प्रकृति Nature of Inclusive Education  समावेशी शिक्षा के बारे में सामान्य रूप यह कहा जा सकता है कि सामान्य विद्यालय में सामान्य विद्यार्थी के साथ रहकर विशिष्ट प्रकार के बालकों को शिक्षा प्रदान करना है, जिससे असमर्थ बालकों का सर्वांगीण विकास हो सके। समावेशी शिक्षा में असमर्थ व सामान्य दोनों प्रकार के बालक होते हैं। असमर्थ बालक को कुछ आवश्यकतानुरूप विशेष सुविधाएँ प्रदान की जाती है। इससे असमर्थ बालक भी अपने आप को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं। समावेशी शिक्षा में बालकों में आपसी सूझ-बूझ का विकास होता है। बालक एक-दूसरे की सहायता भी करते हैं तथा इससे समायोजन में भी मदद मिलती है। समावेशी शिक्षा के उद्देश्य छात्रों में समानता की भावना का विकास करना ताकि प्रत्येक छात्र समान गति से आगे बढ़े।  समावेशी शिक्षा मानती है कि व्यवस्था बालक के अनुरूप होना चाहिए। छात्रों के अंदर समायोजन मानसिक मजबूती प्रदान करना। असमर्थ बालकों को सामान्य बालकों के साथ पढ़ाकर उनका आपसी समन्वय बनाना तथा पूर्वाग्रहित सामाजिक उपेक्षाओं से बचाना। असमर्थ बालकों के लिए भी पुस्तकालय, खेल, कला, संगीत आदि की व्यवस्था करना तथा उनमें सहभागी बनाना । शिक्षक बालकों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देना ताकि बालकों के प्रति की गई किसी भी उपेक्षा के कारण वैमनस्यता का भाव उत्पन्न न हो।  सभी छात्रों की समय सारणी लगभग एक जैसी ही हो। समावेशी शिक्षा का निर्धारण छात्रों की बुद्धिलब्धि, मानसिक, शारीरिक आदि योग्यताओं को ध्यान में , रखकर किया जाता है। असमर्थ छात्रों की असमर्थता का पता कर उनकी असमर्थता को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है।  समावेशी शिक्षा की आवश्यकता समाज में विभिन्नता को देखते हुए विद्यालय को इसके प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। बालकों में समानता, सहयोग, समायोजन, प्रेम, सहानुभूति, नैतिक गुणों के विकास तथा असमर्थ बालकों को मानसिक दृढ़ता प्रदान करते हुए उपेक्षाओं की हीन भावना से बाहर निकालना। वंचित बालक Disadvantaged Children वंचित या अलाभान्वित बालक वे बालक होते हैं जो सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक रूप से अलाभान्वित समुदाय से आते हैं। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने ‘वंचित’  का एक ठोस एवं उपयोगी अर्थ बतलाया है कि वंचित बालक वैसे बालक को कहा जा सकता है जो सामाजिक-आर्थिक रूप से तथा सांस्कृतिक रूप से अलाभान्वित समुदाय से आते हैं। भारत में अधिकतर दलित एवं आदिवासी जाति के समुदाय से आने वाले बालकों को वंचित बालक की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति समुदाय में लगभग 90% परिवार ऐसे हैं जो सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक रूप से पिछड़े हुए हैं और ऐसे परिवार के बालकों को वंचित बालक की संज्ञा दी जाती है। वंचित बालकों की पहचान Identity of Disadvantaged Children वचन का तात्पर्य है कि जब किसी बालक की समाज में रहते हुए सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति न हो सके। जब उनसे उसे वंचित रहना पड़े, तब वह वंचित बालक होता है। शिक्षा मनोविज्ञान में वंचित बालक के क्षेत्र को सीमित किया गया है। भारत में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) के लोग ज्यादातर इस परिवार से आते हैं। ऐसे बालकों मे अधिकांशतः आत्मविश्वास की कमी पायी जाती है। नकारात्मक सोच ज्यादा रखते हैं। अलाभान्वित बालकों की बोलचाल लाभान्वित बालकों के मुकाबले भिन्न होती है। वंचित बालकों का बौद्धिक निष्पादन सीमित होता है। पारिवारिक पृष्ठभूमि रूढ़िवादी होती है। परिवार में शिक्षा का अभाव होता है। वंचित बालकों के प्रकार Types of Disadvantaged Children  सामाजिक दृष्टि से वंचित बालक आर्थिक दृष्टि से वंचित बालक अनुसूचित जाति के बालक  अनुसूचित जनजाति के बालक वंचन के प्रभाव Consequences of Deprivation संज्ञानात्मक विकास में कमी अभिप्रेरणा में कमी शैक्षिक उपलब्धि का स्तर कम होना अभिवृत्ति का नकारात्मक होना वंचित बालकों की शिक्षा Disadvantaged Children Education सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक रूप से वंचित बालकों के लिए आवश्यक है कि उचित शिक्षा की व्यवस्था की जाए। वंचित समूह के बालकों को सामान्य बालकों के साथ शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षा व नियम संबंधी महत्त्वपूर्ण तथ्य शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया है, समवर्ती सूची पर केंद्र राज्य दोनों नियम बना सकते हैं। शिक्षा पहले राज्य सूची में था, लेकिन 42वें संविधान संशोधन के द्वारा इसे समवर्ती सूची में रखा गया। संविधान में 86वें संशोधन के द्वारा 2002 में 21(A) जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत 6-14 वर्ष तक के बालकों को अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा देने की बात कही गयी है। अल्पसंख्यक समुदाय की शिक्षा हेतु अनुच्छेद 30 (1) (2) दिया गया है। महिलाओं, बच्चों तथा पिछड़े वर्गों की शिक्षा हेतु अनुच्छेद 15 (iii), (iv), (v) में विशेष प्रावधान दिए गए हैं।  CTET Form Application  Important CTET Question  Teaching News

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