CTET SUCCESS

Child Development & Pedagogy (CDP)

The CDP category focuses on child development and teaching methodology. It is one of the most important subjects for CTET, STET, and other teacher exams. This section includes theory, MCQs, and practice sets. All content is prepared according to the latest exam syllabus.

पॉवलाव का अनुबन्धन-अनुक्रिया का सिद्धान्त Pavlov's Classical Conditioning Theory ctet success eductet

पॉवलाव का अनुबन्धन-अनुक्रिया का सिद्धान्त Pavlov’s Classical Conditioning Theory CTET2024

   पॉवलाव का अनुबन्धन –             पॉवलाव का अनुबन्धन-अनुक्रिया का सिद्धान्त (Pavlov’s Classical Conditioning Theory) एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है, जिसे रूस के मनोवैज्ञानिक इवान पावलोव (Ivan Pavlov) ने विकसित किया था। यह सिद्धान्त मनुष्यों और पशुओं में व्यवहार के विकास को समझाने के लिए प्रमुख रूप से प्रयोग में आता है। पावलोव का शोध विशेष रूप से कंडीशनिंग (conditioning) की प्रक्रिया को समझने में सहायक था, जो यह बताता है कि किस प्रकार एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया (unconditioned response) को एक सामान्य उत्तेजना (neutral stimulus) से जोड़कर एक नया व्यवहार उत्पन्न किया जा सकता है। पॉवलाव के शोध का प्रमुख उद्देश्य पावलोव का प्रारंभिक अध्ययन पाचन तंत्र (digestive system) पर था, और उन्होंने कुत्तों पर प्रयोग करते हुए पाया कि कुत्ते भोजन देखते समय लार (salivation) छोड़ते थे। लेकिन पावलोव ने यह देखा कि यदि कुत्तों को भोजन से पहले कोई विशेष उत्तेजना (जैसे घंटी की आवाज) दी जाती थी, तो कुछ समय बाद वे घंटी की आवाज सुनते ही लार छोड़ने लगते थे, भले ही भोजन नहीं दिया जा रहा हो। यह घटना क्लासिकल कंडीशनिंग (Classical Conditioning) या अनुबन्धन-अनुक्रिया सिद्धान्त (Conditioned Reflex Theory) के रूप में जानी गई। पॉवलाव के प्रयोग की मुख्य बातें: पावलोव ने कुत्तों पर किए गए प्रयोग में चार प्रमुख तत्वों की पहचान की: अस्वीकृत उत्तेजना (Unconditioned Stimulus – UCS): यह वह उत्तेजना है जो स्वाभाविक रूप से और स्वतः किसी प्रतिक्रिया (response) को उत्पन्न करती है। जैसे, भोजन एक अस्वीकृत उत्तेजना है जो कुत्ते में लार उत्पन्न करती है। अस्वीकृत प्रतिक्रिया (Unconditioned Response – UCR): यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक और स्वतः उत्पन्न होती है जब कुत्ता भोजन प्राप्त करता है। जैसे, भोजन खाने पर कुत्ते की लार का स्राव होना। तटस्थ उत्तेजना (Neutral Stimulus – NS): यह वह उत्तेजना है जो पहले कुत्ते में कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करती। जैसे, घंटी की आवाज, जो पहले कुत्ते में लार का स्राव नहीं करती थी। सशर्त उत्तेजना (Conditioned Stimulus – CS): जब तटस्थ उत्तेजना (जैसे घंटी की आवाज) को अस्वीकृत उत्तेजना (जैसे भोजन) के साथ जोड़ा जाता है, तो वह उत्तेजना एक सशर्त उत्तेजना में परिवर्तित हो जाती है, जो अब प्रतिक्रिया उत्पन्न करने में सक्षम होती है। घंटी की आवाज (जो पहले तटस्थ थी) अब भोजन की तरह प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। सशर्त प्रतिक्रिया (Conditioned Response – CR): यह वह प्रतिक्रिया है जो सशर्त उत्तेजना के प्रति उत्पन्न होती है, जो अस्वीकृत प्रतिक्रिया की तरह होती है। जैसे, घंटी की आवाज सुनते ही कुत्ता लार छोड़ने लगता है। पावलोव के अनुबन्धन-अनुक्रिया के सिद्धान्त के चरण: प्रारंभिक अवस्था (Before Conditioning): UCS (भोजन) → UCR (लार का स्राव)। NS (घंटी की आवाज) → कोई प्रतिक्रिया नहीं। कंडीशनिंग प्रक्रिया (During Conditioning): NS (घंटी की आवाज) और UCS (भोजन) को एक साथ जोड़ा जाता है। बार-बार दोनों उत्तेजनाओं (घंटी और भोजन) का एक साथ अनुभव होता है। अंतिम अवस्था (After Conditioning): CS (घंटी की आवाज) → CR (लार का स्राव)। अब, घंटी की आवाज सुनने से कुत्ते में लार का स्राव उत्पन्न होने लगता है, भले ही भोजन न दिया जाए। पावलोव के सिद्धान्त का प्रभाव: स्वाभाविक प्रतिक्रियाएँ: पावलोव ने सिद्ध किया कि स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं (जैसे लार का स्राव) को शर्तों के तहत नियंत्रित किया जा सकता है। यह सिद्धान्त यह भी बताता है कि एक सामान्य उत्तेजना को कई बार किसी अन्य स्वाभाविक उत्तेजना के साथ जोड़ने से उसे एक नई प्रतिक्रिया उत्पन्न करने में सक्षम बनाया जा सकता है। मानव व्यवहार और शिक्षा: पावलोव का सिद्धान्त यह भी दर्शाता है कि हमारे व्यवहार और प्रतिक्रियाएँ अक्सर बाहरी उत्तेजनाओं के कारण प्रभावित होती हैं। इसका प्रयोग मानसिक स्वास्थ्य उपचार, शिक्षा, और व्यवहार चिकित्सा में भी किया जाता है, जैसे, शर्तीय व्यवहार का इलाज करना (जैसे, भय या चिंता को नियंत्रित करना)। शर्तीयता का प्रयोग: पावलोव के सिद्धान्त का प्रभाव न केवल पशु व्यवहार अध्ययन में, बल्कि मानव व्यवहार में भी देखने को मिलता है। यह सिद्धान्त यह समझने में मदद करता है कि किसी विशेष अनुभव से जुड़े डर, इच्छाएँ या आदतें कैसे विकसित होती हैं। निष्कर्ष: पावलोव का अनुबन्धन-अनुक्रिया सिद्धान्त यह बताता है कि सामान्य उत्तेजनाएँ (जो स्वाभाविक रूप से कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करतीं) को किसी स्वाभाविक उत्तेजना के साथ जोड़कर उन्हें एक नई प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। यह सिद्धान्त मनोविज्ञान, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और मानव और पशु दोनों के व्यवहार को समझने में मदद करता है। Important Topics  👇👇👇👇👇👇👇👇   Thorndikes-law-of-learning    Socialization-process समाजीकरण की प्रक्रिया          ☝️☝️☝️☝️☝️        Pavlov’s Classical   Conditioning Theory       Important Topics  CTET Result  Ctet Important Question 👇👇👇👇👇👇👇👇   Evaluation-of-learning | मूल्यांकन   individual-difference | व्यक्तिक विभिन्नता      

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Thorndike – Laws of Learning Part 2| सीखने के गौण नियम भाग – 2

                        Part – 2                                       सीखने के गौण नियम       Subordinate Laws of Learning  Part 1:- Thorndikes Law of Learning Part-1 | थार्नडाइक का सिद्धांत – भाग 1 1. बहु-प्रतिक्रिया का नियम Law of Multiple Responses)  इस नियम के अनुसार व्यक्ति के सामने जब नई समस्या आती है तो वह उसे सुलझाने के लिए अनेक प्रकार की क्रियाएँ करता है और तब तक करता रहता है जब तक कि वह सही अनुक्रिया की खोज नहीं कर लेता। ऐसा होने पर उसकी समस्या सुलझ जाती है और उसे सन्तोष मिलता है। असफल होने पर व्यक्ति को हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए बल्कि एक के बाद एक उपाय पर अमल करते रहना चाहिए जब तक कि सफलता प्राप्त न हो जाए। यह नियम ‘प्रयत्न एवं भूल’ पर आधारित है।  2. मानसिक स्थिति का नियम (Law of Mental Status) इस नियम को तत्परता या अभिवृत्ति का नियम भी कहते हैं। यह नियम इस बात पर बल देता है कि बाहरी स्थिति की ओर प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति की मनोवृत्ति पर निर्भर करती हैं अर्थात्, यदि व्यक्ति मानसिक रूप से सीखने के लिए तैयार है तो नये कार्यो को आसानी से सीख लेगा और यदि वह मानसिक रूप से सीखने के लिए तैयार नहीं है तो उस कार्य को नहीं सीख सकेगा। निद्रा, सभ्यता, थकावट, आकाँक्षाएँ, भावनाएँ आदि सभी हमारी मनोवृत्ति को प्रभावित करती हैं। उदाहरणार्थ मूर्ति को देखकर हिन्दू हाथ जोड़ लेते हैं, मूर्ति के सामने मस्तक टेककर सन्तुष्ट होते हैं और मूर्ति को चोट पहुंचाने से उन्हें भी चोट पहुँचती है। Exigency Hierarchy Theory| मैस्लो का सिद्धांत 3. आंशिक क्रिया का नियम (Law of Partial Function) यह नियम इस बात पर बल देता है कि कोई एक प्रतिक्रिया सम्पूर्ण स्थिति के प्रति नहीं होती है। यह केवल सम्पूर्ण स्थिति के कुछ पक्षों अथवा अंशों के प्रति ही होती है। जब हम किसी स्थिति का एक ही अंश दोहराते हैं तो प्रतिक्रिया हो जाती हैं। इस नियम में इस प्रकार ‘अंश से पूर्ण की ओर’ शिक्षण सूत्र का अनुसरण किया जाता है। पाठ योजना को छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त करके पढ़ाना इसी नियम पर आधारित है। संक्षेप में, व्यक्ति किसी समस्या के उपस्थित होने पर उसके अनावश्यक विस्तार को छोड़कर उसके मूल तत्त्वों पर अपनी अनुक्रिया केन्द्रित कर लेता है। आंशिक क्रियाओं को करके समस्या का हल ढूंढ लेने को ही थॉर्नडाइक ने आंशिक क्रिया का नियम बताया है। 4. समानता का नियम ( Law of Equality ) इस नियम का आधार पूर्व ज्ञान या पूर्व अनुभव है। किसी नवीन परिस्थिति या समस्या के उपस्थित होने पर व्यक्ति उससे मिलती-जुलती अन्य परिस्थिति या समस्या का स्मरण करता है, जिससे वह पहले भी गुजर चुका है और ऐसी स्थिति में व्यक्ति नवीन परिस्थिति में वैसी ही अनुक्रिया करता है जैसी उसने पुरानी परिस्थिति में की थी। समान तत्त्वों के आधार पर नवीन ज्ञान को पूर्व ज्ञान से सम्बद्ध करके पढ़ाने से सीखना सरल हो जाता है। ज्ञात से अज्ञात की ओर’ शिक्षण सूत्र इसी नियम पर आधारित है। Individual Difference | वैयक्तिक विभिन्नता 5. साहचर्य परिवर्तन का नियम (Law of Associative Changing) जैसा कि इस नियम के नाम से ही स्पष्ट है, इसमें सीखने की अनुक्रिया का स्थान परिवर्तन होता है। यह स्थान परिवर्तन मूल उद्दीपक से जुड़ी हुई अथवा उसकी किसी सहचारी उद्दीपक वस्तु के प्रति किया जाता है। उदाहरणार्थं भोजन सामग्री को देखकर कुत्ते के मुँह से लार टपकने लगती है लेकिन कुछ समय बाद खाने के प्याले को देखकर ही लार टपकने लगती है। थॉर्नडाइक ने अनुकूलित-अनुक्रिया को सहचारी स्थान परिवर्तन का ही एक विशेष रूप माना है। Thorndikes Law of Learning Part-1 | थार्नडाइक का सिद्धांत – भाग 1

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Thorndike’s Law of Learning Part 1 | थॉर्नडाइक के सीखने के नियम भाग 1

 Thorndike’s Law of Learning – Part 1         थॉर्नडाइक के सीखने के नियम – भाग 1  थॉर्नडाइक ने अपने प्रयोगों के आधार पर कुछ सीखने के नियमों का प्रतिपादन किया है जिसे दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है – मुख्य नियम तथा गौण नियम। मुख्य नियमों के अन्तर्गत तीन नियम हैं तथा गौण नियमों के अन्तर्गत पाँच नियम हैं। इस प्रकार थॉर्नडाइक ने सीखने के आठ नियम बताए हैं।                           मुख्य नियम ( Major Law )  तत्परता का नियम ( Law of Readiness ) अभ्यास का नियम ( Law of Exercise ) प्रभाव का नियम    ( Law of Effect )  Project Method of Teaching  👈🏻👈🏻           👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻            तत्परता का नियम ( Law of Readiness )  तत्परता के नियम का तात्पर्य यह है कि जब प्राणी अपने को किसी कार्य को करने या सीखने के लिए तैयार समझता है, तो वह बहुत शीघ्र कार्य करता है या सीख लेता है और उसे अधिक मात्रा में सन्तोष भी मिलता है। सीखने को तैयार न होने पर उसे उस क्रिया में असन्तोष मिलता है। जब प्राणी किसी कार्य को करने के लिए तैयार रहता है तो उसमें उसे आनन्द आता है और वह उसे शीघ्र सीख लेता है तथा जिस कार्य के लिए वह तैयार नहीं होता और उस कार्य को करने के लिए बाध्य किया जाता है तो वह झुंझला जाता है और उसे शीघ्र सीख भी नहीं पाता। तत्परता में कार्य करने की इच्छा निहित है। इच्छा न होने पर प्राणी डर के मारे पढ़ने अवश्य बैठ जाएगा लेकिन वह कुछ सीख नहीं पाएगा। तत्परता ही बालक के ध्यान को केन्द्रित करने में सहायक होती है।                अभ्यास का नियम ( Law of Exercise )  यह नियम प्रयोग करने तथा प्रयोग न करने पर आधारित है। इस नियम के अनुसार किसी क्रिया को बार-बार करने या दोहराने से वह याद हो जाती है और छोड़ देने पर या न दोहराने से वह भूल जाती है।             उदाहरण के रूप में कविता और पहाड़े याद करने के लिए उन्हें बार-बार दोहराना पड़ता है तथा अभ्यास के साथ-साथ उपयोग में भी लाना पड़ता है। ऐसा न करने पर सीखा हुआ कार्य भूलने लगते है। याद की गई कविता को कभी न सुनाया जाए तो वह धीरे-धीरे भूलने लगती है। यही बात साइकिल चलाना, टाइप करना, संगीत आदि में भी लागू है। थॉर्नडाइक के अनुसार अभ्यास के नियम के अन्तर्गत दो उप-नियम आते हैं :-            उपयोग का नियम “जब एक परिवर्तनीय संयोग एक स्थिति और अनुक्रिया के बीच बनता है तो अन्य बातें समान होने पर वह संयोग दृढ़ हो जाता है।’ अनुपयोग का नियम “अनुपयोग के नियम के अनुसार कुछ समय तक किसी परिस्थिति और अनुक्रिया के बीच पुनरावृत्ति नही होने से संयोग क्षीण पड़ जाता है।” डगलस एवं हॉलैण्ड के अनुसार, “जो कार्य बहुत समय तक किया या दोहराया नहीं जाता है, वह भूल जाता है। इसी को अनुपयोग या अनभ्यास का नियम कहते हैं।” Continuous and Comprehensive Evaluation.  सतत् और व्यापक मूल्यांकन 👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻                     प्रभाव का नियम  ( Law of Effect )  थॉर्नडाइक का यह नियम सीखने और अध्यापन का आधारभूत नियम है। इस नियम को ‘सन्तोष-असन्तोष’ का नियम भी कहते है। इसके अनुसार जिस कार्य को करने से प्राणी को हितकर परिणाम प्राप्त होते है और जिसमें सुख और सन्तोष प्राप्त होता है, उसी को व्यक्ति दोहराता है। जिस कार्य को करने से कष्ट होता है और दुःखद फल प्राप्त होता है, उसे व्यक्ति नहीं दोहराता है। इस प्रकार व्यक्ति उसी कार्य को सीखता है जिससे उसे लाभ मिलता है तथा सन्तोष प्राप्त होता है। संक्षेप में, जिस कार्य के करने से पुरस्कार मिलता है उसे सीखते हैं और जिस कार्य के करने से दण्ड मिलता है उसे नहीं सीखा जाता। इसके विपरीत “दुःखद अथवा असन्तोषजनक परिणामों से उत्तेजना तथा अनुक्रिया का सम्बन्ध निर्बल हो जाता है।”   सीखने के गौण नियम (Subordinate Laws of Learning) Part 2 को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक को क्लिक करे । 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻 Thorndike Laws of Learning – part-2

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CDP EVS Important Question

 EVS & CDP Important Question 1. पर्यावरण का अध्ययन जीव विज्ञान की किस शाखा के अंतर्गत किया जाता है? – पारिस्थितिकी(Ecology) 2. पारिस्थितिकी संबंधित है? – जीव और पर्यावरण के संबंधों से Telegram https://t.me/ctetsuccess 3. सदरलाल बहुगुणा  से संबंधित प्रमुख तथ्य है? – प्रसिद्ध पर्यावरणविद, चिपको आंदोलन के प्रमुख नेता, टेहरी बांध का विरोध, वृक्षमित्र के रूप में विश्व प्रसिद्ध 4. ‘चिपको वूमेन’ के नाम से किसे जाना जाता है? – गौरा देवी Must follow our Facebook https://www.facebook.com/CtetSuccessOff/ 5. चिपको आंदोलन(Chipko Movement) कब  और कहा शुरू किया गया था? – 26 मार्च 1974 उत्तर प्रदेश, रैणी गांव,चमोली जिले(वर्तमान उत्तराखंड के भाग में) 6. चिपको आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था? – वनों में पेड़ों की कटाई को रोकना Continuous and Comprehensive Evaluation सतत् और व्यापक मूल्यांकन 7. चेचक(smallpox),रेबीज,पोलियो रोग किसके द्वारा फैलता है? – विषाणु(वायरस) 8. सामान्य सर्दी और विभिन्न प्रकार के बुखार(फ्लू) किसके द्वारा होता है? – विषाणु(वायरस) Join telegranTelegram https://t.me/ctetsuccess 9. पौधे नाइट्रोजन  का उपयोग किस रूप में करते हैं? – नाइट्रेट 10. परकाशसंश्लेषण(Photosynthesis) में प्रकाश अभिक्रिया होती है? – ग्रेनम में Exigency Hierarchy Theory | आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धान्त | 11. इबोला और चिकन पॉक्स किसके द्वारा होता है? – विषाणु 12. आयरन के मुख्य स्रोत है? – सेम, मटर, सोयाबीन, पालक 13. मानव शरीर में आयरन सहायक होता है? – हीमोग्लोबिन के निर्माण में, मांसपेशियों में ऑक्सीजन इकट्ठा करने में Follow Our Instagram 14. रडियोधर्मी प्रदूषण को किस और नाम से भी जाना जाता है? – नाभिकीय प्रदूषण(Nuclear pollution) 15. बालक की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है?        – परिवार 16. रडियोधर्मी पदार्थ से कौन सी विकिरण उत्सर्जित नहीं होती? –एक्स किरणे, रेडियो तरंगे  Follow Our Instagram 17. रडियो धर्मी(Radioactive) पदार्थों से उत्सर्जित होती है? – अल्फा, बीटा, गामा विकिरण 18. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम  (Environment Protection Act) किस वर्ष से लागू किया गया? – 1986 19. सामाजिक जीवन के आधार हैं? – सहिष्णुता,अनुशासन-सहयोग और पारस्परिक स्नेह की भावना https://t.me/ctetsuccess 20. “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है” यह कथन किसका है? यूनानी दार्शनिक- अरस्तु Follow Our Instagram  Must follow our Facebook https://www.facebook.com/CtetSuccessOff/ www.eductet.com

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Socialization process | समाजीकरण की प्रक्रिया #ctet #ctetsuccess #eductet #cdp #pedagogy

  सामाजीकरण का अर्थ ( Meaning of Socialization ) समाजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो नवजात शिशु को सामाजिक प्राणी बनाती है। इस प्रक्रिया के अभाव में व्यक्ति सामाजिक प्राणी नहीं बन सकता। इसी से सामाजिक व्यक्तित्व का विकास होता है। सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के तत्वों का परिचय भी इसी से प्राप्त होता है।  जब बालक सामाजिक प्रत्याशाओं तथा सामाजिक मानकों के अनुरूप व्यवहार करना सीख लेता है तो इसे समाजीकरण की संज्ञा दी जाती है। सामाजीकरण एक प्रक्रिया है, जो बालकों में धीरे-धीरे विकसित होती है। सामाजीकरण समाजिक नियमों का अधिग्रहण है। समाजीकरण का मूल उद्देश्य सामाजिक वातावरण में अनुकूलन तथा समायोजन करना है। सामाजीकरण अनुवांशिकता नहीं बल्कि वातावरण से प्रभावित होता है। यही कारण है कि इसके अंतर्गत मूल्य, विश्वास, मनोवृत्ति, संस्कृति, रीति-रिवाज, विभिन्न प्रकार के कौशल आदि का ज्ञानार्जन होता है, जो बालक के समाजीकरण में मदद पहुँचाते हैं।  बालको में सामाजिक व्यवहार :-  प्रारंभिक बाल्यावस्था ( 2 वर्ष से 6 वर्ष) अनुकरण (Imitation) सामाजिक अनुमोदन (Approval) सहानुभूति (Sympathy) परानुभूति (Empathy) प्रतिद्वंद्विता (Rivalry) आसक्ति (Attachment) मित्रता (Friendship) आक्रमकता (Aggressiveness) अहंभाव (Ego Centrism)  पूर्वाग्रह (Prejudice) उत्तर- बाल्यावस्था (6 वर्ष से 12 वर्ष) सामाजिक अनुमोदन प्रतिस्पर्द्धा उत्तरदायित्व सामाजिक कुशलता खेल भावना किशोरावस्था ( 14 वर्ष से 18 वर्ष) दोस्तों का प्रभाव नये सामाजिक समूह विरोधात्मक प्रवृत्ति तीव्र नयी सोच  बालक कैसे चिंतन करते हैं | How Do Children Think 👈👈 👆👆✍️Important Link✍️ 👆👆 👇👇👇👇👇👇👇👇👇 Evaluation of Learning | अधिगम का मूल्यांकन समाजीकरण के कारक या तत्व Factors of Socialization बालक जब इस संसार में आता है तब वह कोरे कागज की तरह होता है, फिर धीरे-धीरे जैसे वह बड़ा होने लगता है अपने आस-पास के साधन द्वारा प्रभावित होने लगता है तथा निरंतर वह आदर्शों व मूल्यों को सीखता है। इन आदर्शों व मूल्यों को वह अपने समाज (परिवार, साथी, स्कूल, शिक्षक) से सीखता है। समाजीकरण के कुछ सक्रिय कारक हैं तो कुछ निष्क्रिय हैं। निष्क्रिय का उदाहरण है- पुस्तकालय; सक्रिय कारक निम्न हैं । परिवार (Family) :-  बालक के समाजीकरण के विभिन्न तत्वों में परिवार का प्रमुख स्थान है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक बालक का जन्म किसी-न-किसी परिवार में ही होता है। परिवार को बालक की प्रथम पाठशाला भी कहते हैं। परिवार एक प्राथमिक समूह जिसमें माता -पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची आदि आते हैं। बालक चूंकि सर्वाधिक समय इन्हीं लोगों के साथ व्यतीत करता है इसलिए परिवार का प्रभाव बालक के नैतिक मूल्यों के विकास में काफी पड़ता है। बालक की सबसे पहले अंतःक्रिया माता-पिता से होता है। माता-पिता से अपने बच्चों को उचित दुलार, प्यार स्नेह आदि मिलने से बच्चों में सुरक्षा की भावना, आत्मविश्वास, आदि का गुण विकसित होता है। यही नहीं, वह अपने परिवार में रहते हुए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने परिवार के आदर्शों, मूल्यों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं तथा मान्यताओं एवं विश्वासों को भी धीरे-धीरे सीख जाता है।  जिन परिवार में टेलीविजन, रेडियो, अखबार, मैगजीन, इंटरनेट आदि का उपयोग होता है उन घरों के बच्चों में समाजीकरण अधिक तीव्र होता है अपेक्षाकृत अभाव वाले घरों के माता-पिता के आपसी संबंधों का भी प्रभाव बालक पर पड़ता है। प्रारंभिक बाल्यावस्था में परिवार का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि ‘मेरा परिवार’ विषय-वस्तु पढ़ाने के लिए सबसे उपयुक्त कक्षा नर्सरी से प्रथम है। आस-पड़ोस ( Neighborhood ): पड़ोस भी एक प्रकार का बड़ा परिवार होता है। जिस प्रकार, बालक परिवार के विभिन्न सदस्यों के साथ क्रिया द्वारा अपनी संस्कृति एवं सामाजिक गुणों का ज्ञान प्राप्त करता है| आस-पड़ोस के व्यक्तियों के संपर्क में आने पर बालक नए-नए व्यवहार सीखता है। बालक अपने पड़ोसियों के साथ काफी समय गुजारता है। अत: पड़ोसियों के साथ पारस्परिक प्रक्रिया का प्रभाव उनके सामाजिक विकास पर पड़ता है। इस प्रभाव के कारण समाजीकरण की प्रक्रिया के साथ-साथ विसमाजीकरण की प्रक्रिया भी घटित होती है। बालक के व्यवहार में उसके समाज का एक महत्त्वपूर्ण योगदान होता है जो न सिर्फ उसे अच्छी शिक्षा प्रदान करता है बल्कि उसके व्यक्तित्व के विकास में भी सहायक होता है। यही कारण है कि अच्छे परिवारों के लोग अच्छे पड़ोस में ही रहना पसन्द करते हैं। स्कूल ( School ):-  परिवार के बाद स्कूल एक ऐसी संस्था है जिससे बालक सर्वाधिक प्रभावित होता है, क्योंकि वहीं पर वह अपने नए मित्रों को तथा ज्ञानात्मक कौशल, सामाजिक कौशल, व्यवहार आदि के रूप में नयी-नयी चीजों को ग्रहण करता है। बालक विद्यालय के वातावरण, शिक्षक के व्यवहार इत्यादि से भी प्रभावित होता है। यहाँ पर वह नए मानकों को प्राप्त करता है और व्यवहार को उसी के अनुरूप ढालने का प्रयास भी करता है। कक्षा में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को महत्त्व दिया जाना चाहिए। शिक्षक को बालक की सामाजिक पृष्ठभूमि की न तो उपेक्षा करनी चाहिए और न ही निंदा, बल्कि सभी को समाज एवं संस्कृति का महत्त्व बताना चाहिए।  बालक के साथी ( Colleague / Friends ) सामान्य आयु के बच्चे एक अलग समूह का निर्माण करते हैं जो वे अपनी इच्छा के अनुकूल करते हैं। बच्चे अपनी इच्छा से किसी नये समूह में शामिल भी होते हैं और उसे छोड़ भी देते हैं। प्रत्येक बालक अपने साथियों के साथ खेलता है। वह खेलते समय जाति-पाँति ऊँच-नीच तथा अन्य प्रकार के भेद भावों से ऊपर उठकर दूसरे बालकों के साथ अन्तःक्रिया द्वारा आनन्द लेना चाहता है। इस कार्य में उसके साथी महत्त्वपूर्ण भूमिक निभाते हैं। अच्छे मित्रगण बनें तो अच्छी आदतें भी बालक सीखता है, अगर संगति अच्छी नहीं हुई तो बालक के व्यवहार पर बुरा प्रभाव भी पड़ता है।  समूह में बालक सहभागिता तथा सामाजिक कौशल को सीखता है।  समुदाय  (Community ):- बालक के समाजीकरण में समुदाय अथवा समाज का गहरा प्रभाव होता है। प्रत्येक समाज अथवा समुदाय अपने-अपने विभिन्न साधनों तथा विधियों के द्वारा बालक का समाजीकरण करना अपना परम कर्त्तव्य समझता है।इन साधनों के अन्तर्गत जातीय तथा राष्ट्रीय प्रथाएँ एवं परम्पराएँ, मनोरंजन एवं राजनीतिक विचारधाराएँ, धार्मिक कट्टरता, संस्कृति, कला साहित्य, इतिहास, जातीय पूर्वधारणाएँ, इत्यादि आती हैं। इन सबके अलावा संस्कृति, भाषा- योग्यता, व्यावसायिक प्रसंग, आर्थिक स्थिति आदि का भी प्रभाव पड़ता है। वर्तमान में बालकों के सामाजीकरण पर टेलिविजन, मीडिया, इंटरनेट, व्हाट्सप आदि का का भी प्रभाव पड़ रहा है, जिससे बालक के मूल्यों, अभिवृत्ति, विश्वास सीधे-सीधे प्रभावित हो रहे हैं। समाजीकरण में खेल की भूमिका ( Role of Play in Socialization ):-  बालक के शारीरिक एवं सामाजिक विकास में खेल की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। खेल को बालक की रचनात्मक, जन्मजात, स्वतन्त्र, आत्मप्रेरित, स्फूर्तिदायक,

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Continuous and Comprehensive Evaluation | सतत् और व्यापक मूल्यांकन #ctet #ctetsuccess #eductet #cdp #pedagogy

 सतत् और व्यापक मूल्यांकन क्या है? What is Continuous and Comprehensive Evaluation? सतत् और व्यापक मूल्यांकन (CCE) का अर्थ छात्रों के विद्यालय आधारित मूल्यांकन की प्रणाली से है, जिसमें छात्रों के विकास के सभी पक्ष शामिल हैं। यह एक बच्चे की विकास प्रक्रिया है, जिसमें दोहरे उद्देश्यों पर बल दिया जाता है। ये उद्देश्य एक ओर मूल्यांकन में निरन्तरता और व्यापक रूप से सीखने के मूल्यांकन पर तथा दूसरी ओर व्यवहार के परिणामों पर आधारित है।  मूल्यांकन अध्यापन एवं अधिगम प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का अंतिम सोपान मूल्यांकन ही है। माध्यमिक स्तर पर सतत एवं व्यापक मूल्यांकन को लागू करने का स्पष्ट निर्देश पूर्व में CBSE द्वारा दिया जा चुका है। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की प्रणाली में छात्रों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखा जाता है।  सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में दो भाव निहित हैं :-  1. सतत मूल्यांकन  2. व्यापक मूल्यांकन  सतत मूल्यांकनः-   सतत मूल्यांकन करने का अर्थ छात्रों के ‘वृद्धि व विकास’ का मूल्यांकन एक बार के बजाय निरंतर करना, क्योंकि अधिगम एक सतत प्रक्रिया है तथा इसका मूल्यांकन भी उसी प्रकार होना चाहिए। सतत मूल्यांकन करने के लिए वर्तमान में तीन प्रकार के मूल्यांकन का प्रयोग किया जाता है (i) निदानात्मक मूल्यांकन (ii) रचनात्मक मूल्यांकन (iii) संकलनात्मक मूल्यांकन  Evaluation of Learning | अधिगम का मूल्यांकन व्यापक मूल्यांकनः-   सतत मूल्यांकन व्यवहार के सिर्फ संज्ञानात्मक मूल्यांकन करता है, जबकि व्यापक मूल्यांकन व्यवहार के तीनों पक्ष संज्ञानात्मक, भावात्मक, क्रियात्मक का मूल्यांकन करता है। विद्यालय की संपूर्ण शैक्षिक गतिविधियों के संदर्भ में इसका प्रयोग किया जाता है। इससे शैक्षिक एवं गैर-शैक्षिक दोनों पक्षों का आकलन होता है। इसके लिए प्रेक्षण विधि समाजमिति, मनोवृत्ति आदी मापनी का प्रयोग किया जाता है। सतत व व्यापक मूल्यांकन का महत्त्व Importance of Continuous and Comprehensive Evaluation शिक्षक को सही कार्य नीति बनाने में मदद करता है। शैक्षिक व गैर शैक्षिक दोनों उपलब्धियों का आकलन होता है। सीखने की प्रक्रिया पर बल दिया जाता है तथा त्रुटि होने पर सुधार करने का उपाय बताया जाता है।  सतत मूल्यांकन विद्यार्थियों की कमजोरी को तुरंत पहचान कराता है तथा उसका निदान भी बताता है। यह मूल्यांकन बालकों के सर्वांगीण विकास पर बल देता है। तथा विषय, कैरियर आदि के चुनाव में भी मददगार साबित होता है। उपलब्धि स्तर को निरंतर बनाए रखने व ऊँचा उठाने के लिए प्रेरित करता है ।। अधिगम व शिक्षण प्रक्रिया में छात्र को महत्त्वपूर्ण बनाता है। उपचारात्मक शिक्षण विधि का प्रयोग कर छात्रों की कई समस्याओं का समाधान किया जाता है। यूनिट की समाप्ति पर निष्पादन जाँच करने पर यह पता चलता है कि विषय या किसी अध्याय के अधिगम में समस्या हो रही है। बालकों के लिए एक प्रेरणा का काम करती है जिसमें अधिगम प्रक्रिया में रुचि उत्पन्न होती है।  Evaluation of Learning | अधिगम का मूल्यांकन सतत व व्यापक मूल्यांकन की विधियाँ ( Methods of Continuous and Comprehensive ) सतत व व्यापक मूल्यांकन के लिए निम्न प्रमुख विधियों को प्रयोग में लाया जाता है :-  साक्षात्कार:-  साक्षात्कार आंग्ल भाषा के Interview का हिंदी रूपांतर है, जिसका अर्थ है-आंतरिक विचार। सामान्यतः इस विधि का प्रयोग कर बालकों के विचार तथा दैनिक जीवन के प्रयोग व अधिगम किए गए ज्ञान को जाना जा सकता है। प्रश्नावली:-  बालकों को प्रश्नों की एक सुनियोजित सूची दी जाती है जिनका उन्हें उत्तर देना होता है तत्पश्चात् मूल्यांकन किया जाता है। इसका प्रयोग शाब्दिक व चित्रात्मक दोनों रूपों में होता है। निरीक्षण :-  इस विधि का प्रयोग व्यक्तिगत व सामूहिक अध्ययन दोनों के लिए किया जाता है। बालकों के मूल्यांकन के लिए यह विधि काफी उपयोगी है। प्राकृतिक परिस्थिति में बालक का मूल्यांकन किया जाता है तथा वास्तविक व्यवहार सामने आता है। यह विधि वस्तुनिष्ठ, निश्चित, क्रमबद्ध, प्रमाणिक तथा विश्वसनीय है। व्यवहारवादी इस विधि के प्रयोग पर बल देते हैं। जाँच सूची ( Check List ) :-  जाँच सूची में अध्यापक बालक के सभी तथ्यों जैसे- भाषा के प्रयोग, सामाजिकता, संवेगात्मकता, खेल के दौरान व्यवहार आदि को लिखते जाते हैं जिसको बाद में एकत्रित कर बालक का मूल्यांकन किया जाता है। इस विधि से बालक का उचित मूल्यांकन होता है। विवरण  (Interpretation ) :- विवरण में विद्यार्थी के कुछ समय के कार्य का नमूना एकत्र किया जाता है। यह नमूना दिन-प्रतिदिन के कार्य से भी किया जा सकता है या शिक्षार्थी के बेहतरीन कार्य से भी किया जा सकता है। आवधिक परीक्षा :- सतत मूल्यांकन के लिए यह विधि उपयोगी है, क्योंकि यूनिट में जो कुछ पढ़ाया जाता है, उसकी परीक्षा ली जाती है। ऐसा यूनिट खत्म होने के बाद लेने से तुरंत पता चल जाता है कि अधिगम सही तरीके से हो पाया है कि नहीं या फिर निष्पादन के तरीके में कोई कमी है। वार्षिक परीक्षा :-  यह व्यापक मूल्यांकन के लिए उपयोगी विधि है। उपरोक्त के अलावा जाँच सूची, विवरण, वर्णात्मक कॉर्ड आदि भी सतत व व्यापक मूल्यांकन में सहयोग दान करते हैं।  वर्णनात्मक रिकॉर्ड  ( Descriptive Record ) :- अध्यापक बच्चे को साथी शिक्षार्थी के अनुभव का वर्णनात्मक विवरण भी लिखना चाहिए। इससे बच्चे के जीवन कौशल के प्रत्येक पहलू का पता लगाने में उन्हें अवसर दिया जाता है और वे शिक्षार्थी की और अधिक सम्पूर्ण छवि का सृजन करने के लिए उसके पिछले विवरण को साक्ष्य के रूप में उसका उपयोग कर सकते हैं और संचयी रिकॉर्ड तैयार करने में उपयोग में लाया जा सकता है।  Individual Difference | वैयक्तिक विभिन्नता सतत् और व्यापक मूल्यांकन की विशेषताए  ( Characteristics of Continuous and Comprehensive Evaluation ) वैधता :-  जब कोई मूल्यांकन अपने उद्देश्य की जाँच को पूर्ण करे और वह जितना अधिक पूर्ण करेगा उसकी वैधता उतनी अधिक होगी। शिक्षक को ऐसे प्रश्न ही मूल्यांकन हेतु बनाने चाहिए जो उद्देश्यों की पूर्ति करें।  विश्वसनीयता :-  विश्वसनीयता से तात्पर्य मूल्यांकन प्राप्तांकों की संगतता से होता है अर्थात् एक ही परिस्थिति परीक्षण या मूल्यांकन का परिणाम लगभग एक जैसा ही आए तो विश्वसनीय कहलाता है।  वस्तुनिष्ठता :- मूल्यांकन के लिए दिए गए प्रश्नों का अर्थ सभी छात्र एक समान ढंग से लगाएं तथा उनके उत्तरों की जाँच करते समय शिक्षक की मनोवृत्ति व पूर्वाग्रह का कोई प्रभाव न पड़े।  व्यवहारिकता :-  मूल्यांकन को उत्तम कहलाने के लिए यह आवश्यक है कि वह व्यावहारिक दृष्टिकोण से सही हो तथा प्रश्नों के उत्तर देने में तथा उनके क्रियान्वयन में भी कम समय लगे। मूल्यांकन में मानकीकरण, न्यायसंगतता तथा उपयोगिता का भी गुण होना चाहिए। मूल्यांकन का एक मानक बना होगा तो मूल प्राप्तांकों की व्याख्या करना आसान होगा।

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Evaluation of Learning अधिगम का मूल्यांकन #ctet #eductet #ctetsuccess #cdp #pedagogy #Evaluation

अधिगम का मूल्यांकन ( Evaluation of Learning ) मूल्यांकन क्या है? What is Evaluation? मूल्यांकन शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों के लिए पुनर्बलन का कार्य करता है। मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा अधिगम परिस्थितियों तथा सीखने के अनुभवों के लिए प्रयुक्त की जाने वाली समस्त विधियों और प्रविधियों की उपादेयता की जाँच की जाती है। यह सफलता शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति प्रत्युत्तर का कार्य करती है। इस तरह मापन के आधार पर शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों में आवश्यक सुधार लाने के उद्देश्य से मूल्यांकन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। मूल्यांकन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसका शैक्षिक उद्देश्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध है।  Individual Difference | वैयक्तिक विभिन्नता अधिगम का मूल्यांकन क्या है? What is Learning बालक जो कुछ भी सीखता है या अधिगम करता है उसकी जाँच आवश्यक है जिससे बालक के क्षमता, योग्यता के साथ उन्नति का पता चलता है। बालक की शिक्षा में मूल्यांकन व मापन दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। अधिगम का आकलन:-  इस प्रकार के आकलन का उद्देश्य सीखने या अधिगम प्रगति और शैक्षिक उपलब्धि का आकलन होता है। यह आकलन शुरू से होता रहा है और अभिभावकों द्वारा स्वीकार भी किया गया है। यह संकलनात्मक आकलन होता है जो संपूर्ण शिक्षण सत्र के समाप्त होने के बाद होता है। इस आकलन के द्वारा शिक्षार्थी की अधिगम की क्षमता का आकलन होता है। यह सतत मूल्यांकन का भाग है जो शिक्षण वर्ष में दो बार होता है। इसमें शिक्षार्थियों को अंकों या ग्रेड द्वारा फीडबैक मिलता है। इसमें सुधार की संभावनाएं बहुत ही कम होती हैं। Join Telegram 👈👈👈 Join Facebook 👈👈👈 Youtube 👈👈👈 अधिगम के लिए आकलन :-  यह आकलन निदानात्मक होता है। जिन विद्यार्थियों में अधिगम की प्रगति आशानुरूप नहीं होती है ऐसे विद्यार्थियों में अधिगम संबंधी समस्याओं का विश्लेषण करने के लिए इस आकलन का प्रयोग किया जाता है और उसके बाद उन्हें समस्या के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जाती है। यह रचनात्मक भी होती है, क्योंकि इस आकलन से प्राप्त परिणामों के आधार पर विद्यार्थियों को फीडबैक दिया जाता है, जिससे विद्यार्थी एवं शिक्षक दोनों ही अपनी शिक्षण प्रक्रिया में सुधार कर सकें । एक शिक्षण वर्ष में चार होते हैं। अवलोकन, गृहकार्य, क्लास टेस्ट, दत्त कार्य, क्विज टेस्ट आदि से इस प्रकार का आकलन किया जाता है। इसके द्वारा विद्यार्थियों का तुलनात्मक आकलन नहीं होता बल्कि उनकी व्यक्तिगत कमियों और गुणों का आकलन होता है। यह शिक्षण सत्र के दौरान होता है। मूल्यांकन तथा मापन में अंतर :-  मूल्यांकन उद्देश्य आधारित होता है, जबकि मापन के लिए यह कहा जा सकता है कि उद्देश्य आधारित हो भी सकता है, नहीं भी।  मूल्यांकन के बाद एक भविष्यवाणी संभव है, परंतु मापन के बाद भविष्यवाणी करना संभव नहीं है। मूल्यांकन का क्षेत्र व्यापक होता है जबकि मापन किसी एक गुण या चर का होता है।  मूल्यांकन में स्थिति का निर्धारण किया जाता है, जैसे- श्रेष्ठ, प्रथम, द्वितीय वही मापन में उत्तर के आधार पर अंक प्रदान किया जाता है।  मूल्यांकन मापन के बाद होता है जबकि मापन मूल्यांकन से पहले होता है।  घटना या तथ्य का मूल्य निर्धारण होता है जबकि मापन में घटना या परिणाम के लिए प्रतीक निर्धारण होता है। मूल्यांकन के अंतर्गत बालक के व्यवहार के तीन प्रश्नों (संज्ञानात्मक , भावात्मक और  ज्ञानात्मक) को समाहित करने का प्रयत्न होता है। मूल्यांकन एक सतत व निर्णयात्मक प्रक्रिया है जो उद्देश्य केंद्रित होता है। अब्राहम मास्लो (Abraham Harold Maslow) अच्छे मूल्यांकन की विशेषताएँ  वैधता  विश्वसनीयता व्यावहारिकता तार्किकता उपयोगिता  सतत एवं व्यापक मूल्यांकन सतत एवं व्यापक मूल्यांकन दो शब्दों सतत तथा व्यापक से मिलकर बना है। शिक्षा के क्षेत्र में बदलती हुई परिस्थितियों ने विद्यार्थियों के समग्र मूल्यांकन हेतु अब वार्षिक परीक्षा व संपूर्ण पाठ्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् होने वाली परीक्षा की जगह विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास पर बल दिया जा रहा है। सतत व व्यापक मूल्यांकन इसी सोच का परिणाम है। विद्यालय आधारित मूल्यांकन School Based Evaluation  विद्यालय आधारित मूल्यांकन विद्यालय द्वारा विकसित परीक्षण या अनुसूची या फिर संबंधित बोर्ड द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार होता है। यह मूल्यांकन स्कूल या विद्यालय स्तर पर होता है। विद्यालय आधारित मूल्यांकन शिक्षकों को अपने छात्रों के बारे में जानने का अवसर देता है। बालक क्या सीखते हैं, कैसे सीखते हैं, उनके सोचने का तरीका क्या है, उनकी रुचियों, मनोवृत्ति आदि की पहचान भी करते हैं। विद्यालय आधारित मूल्यांकन बहुआयामी मूल्यांकन होता है। यह छात्रों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। इस तरह के मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य है- बच्चों पर पड़ने वाले दबाव को कम करना, मूल्यांकन व्यापक रूप में करना, बालकों में विभिन्न प्रकार के कौशलों का विकास करना, बालक की त्रुटियों को बताना तथा उसका निदान और उपयोग करना। विद्यालय आधारित मूल्यांकन बाल केंद्रित व विद्यालय केंद्रित दोनों है। यह बालकों की लगभग सभी कार्य योजना का मूल्यांकन करता है।  इसके आगे यहाँ  blue लिंक पर क्लिक कर के पढ़े 👇👇👇 Continuous and Comprehensive Evaluation | सतत् और व्यापक मूल्यांकन

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Individual Difference | वैयक्तिक विभिन्नता #ctet #eductet #ctetsuccess #cdp #pedagogy #kvs #uptet

  वैयक्तिक विभिन्नता की प्रकृति, अर्थ और परिभाषा (Individual Difference :- Nature,  Meaning and Defination)  वैयक्तिक विभिन्नता प्रकृति प्रदत्त है। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से किसी-न-किसी रूप में भिन्न है। कोई व्यक्ति लंबा है तो कोई छोटा, कोई गोरा तो कोई काला, किसी की बुद्धि तीव्र है तो किसी की मंद, रंग, रूप, ‘आकार, बुद्धि संस्कृति आदि के आधार पर निश्चित रूप से कहीं-न-कहीं दो व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न है। यहाँ तक कि एक माँ-बाप के बच्चे, जुड़वाँ बच्चों में भी वैयक्तिक विभिन्नता देखने को मिलती है। ऐसे में व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझना तथा उसके विकास पर बल देना आवश्यक हो जाता है। वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन सर्वप्रथम गाल्टन ने किया। आज बाल मनोविज्ञान बालक के व्यक्तित्व के विकास पर बल डालता है, क्योंकि यदि प्रत्येक बालक के व्यक्तित्व का विकास सही होगा तो निश्चित ही समाज भी अच्छा बनेगा व राष्ट्र भी सशक्त होगा। वैयक्तिक विभिन्नता का ही प्रभाव है कि एक बालक को सौ में सौ अंक मिलते हैं तथा किसी को सौ में शून्य अंक भी प्राप्त होता है। व्यक्ति के स्वभाव, बुद्धि, शारीरिक-मानसिक क्षमता, सांवेगिक विकास, मनोवृत्ति आदि में अंतर होता है, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में इस प्रकार के अंतर को ही वैयक्तिक विभिन्नता कहते हैं। वैयक्तिक विभिन्नता की परिभाषा को जानने से पूर्व ‘व्यक्तित्व’ को समझना आवश्यक है। व्यक्तित्व शब्द अंग्रेजी भाषा के Personality शब्द का पर्याय है। Personality शब्द लैटिन शब्द Persona से बना है जिसका अर्थ होता है-नकाब (Mask), अर्थात् चरित्र के अनुरूप जो धारण करता है। मनुष्य की कोई भी मानसिक, शारीरिक व सामाजिक क्रिया या उसके व्यवहार को उसके व्यक्तित्व से पृथक् नहीं किया जा सकता है, बल्कि व्यक्तित्व वह समग्रता (Totality) है, जिसमें व्यक्ति के संपूर्ण गुणों का परिलक्षण होता है। व्यक्तित्व की 50 से अधिक परिभाषाएं दी जा चुकी हैं, लेकिन उसमें आलपोर्ट की परिभाषा को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।  आलपोर्ट के अनुसार,  “व्यक्ति को व्यक्ति के भीतर पूर्ण मनोशारीरिक तंत्रों का गतिशील या गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण में उसके अपूर्व समायोजन को निर्धारित करता है। “ स्कीनर के अनुसार,  “वैयक्तिक विभिन्नताओं से तात्पर्य व्यक्तित्व के उन सभी पहलुओं से है जिनका मापन व मूल्यांकन किया जा सकता है। “ जेम्स ड्रेवर के अनुसार,  “कोई व्यक्ति अपने समूह के शारीरिक व मानसिक गुणों के औसत से जितनी भिन्नता रखता है उसे वैयक्तिक भिन्नता कहते हैं। “ टॉयलर के अनुसार,    “शरीर के रूप-रंग, आकार, कार्य, गति, बुद्धि, ज्ञान, उपलब्धि, रुचि, अभिरुचि आदि लक्षणों में पाई जाने वाली भिन्नता को वैयक्तिक भिन्नता कहते हैं। “ प्रत्येक शिक्षार्थी स्वयं में विशिष्ट है। इसका अर्थ है कि कोई भी दो शिक्षार्थी अपनीयोग्यताओं, रुचियों और प्रतिभाओं में एकसमान नहीं होते। LIKE OUR FACEBOOK वैयक्तिक विभिन्नताओं के प्रकार(Types of Individual Differences) 1. भाषा के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नताएँ    (Individual Differences Based on            Language)  व्यक्ति में कई तरह के कौशल पाए जाते हैं उनमें एक है- -भाषा कौशल। एक ही उम्र के बालकों में भाषा समान रूप से विकसित नहीं होती है, कुछ में यह जल्दी विकसित नहीं होती है, कुछ में यह जल्दी विकसित होती है तो कुछ में देर से होती है। जिन बालकों में भाषा कौशल का विकास जल्द होना है वो अपने विचारों को भी अभिव्यक्त करने में कुशल होते हैं। भाषा का विकास बालकों में सही तरीके से तथा त्रुटि रहित करना चाहिए, क्योंकि ये हमेशा व्यक्तित्व में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  2. लिंग के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Difference Based on Gender)  पुरुष का शारीरिक गठन स्त्रियों के अपेक्षाकृत अलग होता है। सामान्यतः एक ही वातावरण के अंतर्गत रहने वाले पुरुषों की लंबाई स्त्रियों से अधिक होती है। शारीरिक भिन्नता दिखती है, परंतु मानसिक स्तर पर लड़कियाँ, लड़कों से कहीं भी पीछे नहीं है। यह भी अध्ययन में पाया गया है कि एक ही परिवेश में रहने वाले लड़के-लड़कियों में सहनशीलता ज्यादा पायी गयी है अपेक्षाकृत लड़कों के।  3. परिवार एवं समुदाय के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता(Individual Difference Based on Family and Community)  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ऐसे में निश्चित ही उसके व्यक्तित्व पर उसके परिवार व समाज का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। मानव के व्यक्तित्व के विकास पर उसके परिवार एवं समुदाय का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इसलिए समुदाय के प्रभाव को वैयक्तिक विभिन्नता में भी देखा जा सकता है। अच्छे परिवार एवं समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले बच्चों का व्यवहार सामान्यतः अच्छा होता है। यदि किसी समुदाय में किसी प्रकार के अपराध करने की प्रवृत्ति हो, तो इसका कुप्रभाव उस समुदाय के बच्चों पर भी पड़ता है। बालकों में नैतिकता, सोच, समायोजन आदि का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। परिवार की या समाज की आर्थिक स्तर का भी प्रभाव बालकों पर पड़ता है। 4. बुद्धि के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Difference Based on Intellegence) परीक्षणों के आधार पर ज्ञात हुआ है कि सभी व्यक्तियों की बुद्धि एकसमान नहीं होती।बालकों में भी बुद्धि के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता दिखाई पड़ती है। कुछ बालक अपनी आयु की अपेक्षा अधिक बुद्धि को प्रदर्शित करते हैं, इसके विपरीत कुछ बच्चों में सामान्य बुद्धि पाई जाती है। बुद्धि-परीक्षण के आधार पर यह ज्ञात किया जा सकता है कि कोई बालक किसी अन्य बालक से कितना अधिक बुद्धिमान है?  5. धर्म के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Difference Based on religion)  धर्म को सरल शब्दों में जाने तो क्रियाकलाप या आचरण जो हम नित्य-प्रतिदिन करते हैं अर्थात् धर्म हमारे नियमों, नैतिक मूल्यों और आचरण को निर्धारित तथा नियंत्रित भी करता है। प्रत्येक धर्म सहिष्णुता, प्रेम, भाईचारा आदि सिखलाता है परंतु उनके मानने वालों के व्यवहार में अंतर आता है इसकी मुख्य वजह है धर्म की उदारता, कट्टरता आदि। जिस धर्म में उदारता का भाव ज्यादा होगा निश्चित रूप से मानने वाले की प्रवृत्ति में भी उदारता अधिक देखने को मिलती है।  6. व्यक्तित्व के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Difference Based on Personality)  प्रत्येक बालक या व्यक्ति का व्यक्तित्व अलग-अलग होता है। कोई अंतर्मुखी तो कोई बर्हिमुखी होता है। कुछ लोगों का व्यक्तित्व दूसरे को बहुत प्रभावित करता है तथा कुछ लोग दूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं। टॉयलर के अनुसार, “सम्भवतः व्यक्ति, योग्यता की विभिन्नताओं के बजाय व्यक्तित्व की विभिन्नताओं से अधिक प्रभावित होता है।” इन सबके अलावा शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक आदि के आधार

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Exigency Hierarchy Theory | आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धान्त |

  आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धान्त | Exigency Hierarchy Theory •  अब्राहम मास्लो एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे। मास्लों के अनुसार, आवश्यकताओं के कई स्तर होते हैं जिन्हें व्यक्तिगत पूर्णता के उच्चतम स्तर तक पहुँचने के लिए एक व्यक्ति को पूरा करने का प्रत्यन्त करना पड़ता है। इस प्रकार एक व्यक्ति को सबसे निचले स्तर पर अपनी प्राथमिक (शारीरिक) आवश्यकताओं को पूरा करने योग्य होना चाहिए। जब एक बार ये आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं तब सुरक्षा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। तत्पश्चात् किसी से जुड़े होने की आवश्यकता और स्नेह करने और स्नेह करवाने की आवश्यकता आती है। • किसी समूह से जुड़े होने की इच्छा जैसे परिवार, मित्र और धार्मिक संगठन, हमें स्नेह किए जाने का और दूसरों द्वारा स्वीकार किए जाने का अनुभव कराते हैं। जब हम ऊपर दी गई आवश्यकताओं को सफलता से सन्तुष्ट होते हैं तब हम आत्म-सम्मान, आत्मविश्वास और आत्म-मूल्य जैसी आवश्यकताओं को पूरा करना चाहते हैं। अगली आवश्यकता ज्ञान और अनुभव सम्बन्धी आवश्यकताएँ हैं, जो अपने ज्ञान और समझ को समाहित करती हैं; तत्पश्चात् आज्ञा और सुन्दरता की आवश्यकता आती है। अन्ततः एक व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच जाता है जिसे हम आत्मसिद्धि कहते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति में आत्मज्ञान की विशेषताएँ होती हैं, ऐसा व्यक्ति समाज के प्रति जिम्मेदार होता है और जीवन की सभी चुनौतियों के लिए तैयार होता है। • आवश्यकताओं की उपरोक्त सूची को पदानुक्रम या श्रृंखलाओं की पंक्ति कहते हैं।  अभिप्रेरणा एवं अधिगम | CTET और अन्य शिक्षक पात्रता परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण ☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻   मास्लो द्वारा प्रतिपादित आवश्यकताओं का पदानुक्रम :-  • जैसे-जैसे जीवन बीतता है व्यक्ति समझदारी और ज्ञान प्राप्त करता जाता है और वह सीखता है कि कैसे परिस्थितियों का सामना करें। इस प्रकार वह पदानुक्रम या सीढ़ी पर ऊपर की ओर चढ़ता जाता है। व्यक्ति किस परिस्थिति का सामना कर रहा है? यह प्रश्न इस बात का निर्धारण करता है कि व्यक्ति पदानुक्रम पर ऊपर चढ़ता है या नीचे आता है। • यह पदानुक्रम बहुत-सी संस्कृतियों के लिए सत्य नहीं है। यह पाया गया है कि कुछ देशों जैसे- स्वीडन और नार्वे में उच्च जीवन शैली बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं और आत्मसिद्धि से ज्यादा सामाजिक आवश्यकताएँ महत्त्वपूर्ण हैं।  • कुछ संस्कृतियों में आत्मसिद्धि की आवश्यकता से सुरक्षा की आवश्यकता ज्यादा प्रबल है इसी तरह काम की सन्तुष्टि से ज्यादा नौकरी की सुरक्षा का महत्त्व है।  CTET पास करने के लिए लिंक पर click करे

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अभिप्रेरणा एवं अधिगम | Motivation and Learning #ctet #ctetsuccess #cdp #pedagogy #eductet #Motivation

  अभिप्रेरणा एवं अधिगम | Motivation and Learning  अभिप्रेरणा को लोग साधारण शब्दों में प्रेरणा के नाम से भी जानते हैं। अभिप्रेरणा का सामान्य अर्थ है- किसी कार्यों को करने के लिए प्रोत्साहित करना ।अंग्रेजी में मोटिवेशन (Motivation) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा की मोटम (Motum) धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- मूव, मोटर और मोशन अभिप्रेरणा का महत्त्व बाल मनोविज्ञान में ‘बालक के व्यवहार के कारणों को समझने में है।  अभिप्रेरणा एक ऐसा आंतरिक बल उत्पन्न करती है जो व्यवहार को लक्ष्य निर्देशित बनाता है। व्यक्ति या बालक के व्यवहार में ‘क्यों’ पक्ष का जवाब अभिप्रेरणा या ‘प्रेरणा’ से मिलता है;  जैसे- यदि कोई बालक गणित की कक्षा शुरू होते ही प्रतिदिन उठकर कक्षा से बाहर चला जाता है तो निश्चित रूपेण उसके इस व्यवहार के पीछे कोई-न-कोई कारण अवश्य होगा;….  जैसे-गणित शिक्षक की शिक्षण विधि उसे समझ में न आती हो या फिर उसकी रुचि विषय में न हो या कोई अन्य कारण हो सकता है। अभिप्रेरणा को उत्पन्न करने वाले कारकों को अभिप्रेरक कहते हैं। अभिप्रेरक व्यक्ति की वे आन्तरिक एवं बाह्य दशाएँ हैं, जो उसे कार्य विशेष के सम्पादन के लिए अभिप्रेरित करती हैं एवं उद्देश्य की प्राप्ति तक क्रियाशील रखती हैं। इस तरह अभिप्रेरक दो प्रकार के होते हैं :-  बाह्य अभिप्रेरक एवं आन्तरिक अभिप्रेरक।  👉🟠 जेम्स ड्रेवर के अनुसार ‘अभिप्रेरणा एक भावात्मक क्रियात्मक कारक है जो कि चेतन अथवा अचेतन लक्ष्य की ओर होने वाली व्यक्ति के व्यवहार की दिशा को निश्चित करने का कार्य करता है। “ 👉🟠 मैकड्रगल  ‘अभिप्रेरक प्राणी में निहित वे शारीरिक व मनोवैज्ञानिक दशायें हैं जो उसे किसी विशेष ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। ”  प्रेरणा एवं अधिगम का मास्लो सिद्धांत ☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻 अभिप्रेरणा को प्रभावित करने वाले कारक 1. पुरस्कार व दंड 2. सफलता व असफलता 3. प्रतियोगिता व सहयोग 4. रुचि 5. नवीनता 6. आवश्यकता 7. कक्षा का वातावरण छात्र के लिए 8. आकांक्षा का स्तर अधिगम में अभिप्रेरणा का महत्त्व अभिप्रेरणा या प्रेरणा शिक्षक व छात्र दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। छात्र के लिए :-  अभिप्रेरणा छात्र में जिज्ञासा उत्पन्न करती है तथा उसकी उत्सुकता को बढ़ाती है। अभिप्रेरणा छात्र को न सिर्फ क्रिया करने के लिए आंतरिक बल प्रदान करती है, बल्कि उसे निरंतर क्रियाशील बनाए रखती है। अभिप्रेरणा छात्र की सीखने की अरुचि को रुचि में परिवर्तित कर सकती है। अभिप्रेरणा छात्रों में नैतिक, चारित्रिक, सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देती है तथा राष्ट्र व समाज सेवा की भावना को विकसित करती है। अभिप्रेरणा छात्र को लक्ष्य या उद्देश्यों को प्राप्त कराने में सहायक होती है।  छात्र में अभिप्रेरणा को बढ़ाने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए :-  पढ़ाए जाने वाले विषय उपयोगी हों।  कक्षा का वातावरण सही हो अर्थात् हवा, रोशनी, तथा शांत वातावरण हो । पर्याप्त विद्यार्थियों की आवश्यकता व योग्यता ।  उपयुक्त शिक्षण विधि।   उपयुक्त शिक्षण विधि।  छात्र को दिया जाने वाला पुनर्बलन, जैसे पुरस्कार, दंड, प्रशंसा, निंदा आदि।  छात्र के सफलता या उपलब्धि के परिणाम का उसे जल्द ज्ञान कराना चाहिए।  छात्रों के बीच में प्रतियोगिता, वाद-विवाद, क्विज आदि कराने चाहिए ।  शिक्षक के लिए अभिप्रेरणा का महत्त्व :-  यदि कोई शिक्षक चाहे तो कठिन-से-कठिन विषय को छात्रों को सरलतापूर्वक अधिगम करा सकता है ऐसा वह तब कर पाएगा जब वह खुद अधिगम कराने के लिए प्रेरित हो । शिक्षक को एक अच्छा प्रेरक होना चाहिए तभी वह अपने छात्रों में जिज्ञासा उत्पन्न कर उन्हें क्रियाशील बना सकता है। शिक्षण विधि को सरल रखना चाहिए तथा विषय वस्तु को व्यावहारिकता से जोड़ने के लिए प्रेरित रहना चाहिए। नवीनता व नए खोजों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। ऐसा तभी कर पाएँगे जब उनके अंदर एक अच्छे शिक्षक के रूप में खुद को साबि करने की प्रेरणा होगी। शिक्षक को पुरस्कार व धनात्मक पुनर्बलन देने के लिए प्रेरित रहना चाहिए न कि दंड जैसे हथकंडों का प्रयोग करने के लिए। शिक्षकों को छात्रों में सुरक्षा का भाव उत्पन्न करना चाहिए ताकि वे शिक्षक के साथ अपना सामंजस्य बैठा पाए और अपनी समस्याओं को शिक्षक के सामने रख सके।  शिक्षक को लोकतांत्रिक मूल्यों से प्रेरित होना चाहिए। शिक्षक, छात्रों के आदर्श बनें।

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