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Hindi Grammer

The Hindi Grammar category covers all important topics of Hindi Vyakaran for competitive exams. It includes Sandhi, Samas, Alankar, Muhavare, and sentence structure. Content is prepared especially for CTET, STET, and Bihar Teacher exams. Concepts are explained in a simple and exam-oriented manner. Practice questions help students strengthen their grammar skills.

वर्ण-विचार Varn Vichar #ctet #ctetsuccess #eductet #hindigrammar #vyakaran

 वर्ण किसी भाषा की ऐसी इकाई जिसके खंड संभव न हो वर्ण कहलाती है। या भाषा की अखंडित अथवा निम्नतम इकाई वर्ण कहलाती है।  भाषा की इकाई को दो रूपों में समझा जा सकता है ध्वनि-स्वनिम (Phoneme): ध्वनि जिसका खंड संभव न हो स्वनिम कहलाती है। यह भाषा की सार्थक इकाई होती है। आकृति रूपिम (Morpheme): भाषा की निम्नतम सार्थक इकाई रूपिम कहलाती है।  हिंदी भाषा में कुल 44 वर्ण हैं जिन्हें दो भागों में बाँटा जाता है- 1. स्वर, व 2. व्यंजना।   स्वर स्वतंत्र ध्वनियाँ स्वर कहलाती है अर्थात् वे ध्वनियाँ जिनके उच्चारण में वायु बिना किसी रुकावट के मुख से बाहर निकलती है स्वर कहलाती हैं। हिंदी भाषा की वर्णमाला में कुल ग्यारह स्वरों को शामिल किया जाता है। ‘अ’ को छोड़कर प्रत्येक स्वर का एक मात्रा चिह्न होता है।  इन ग्यारह स्वरों को इनके उच्चारण में मुख से निकलने वाली वायु की मात्रा के आधार पर दो भागों में बाँटा जा सकता है: ह्रस्व स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में केवल एक मात्रा का समय लगे अर्थात् कम समय लगे ह्रस्व स्वर कहलाते हैं। ये संख्या में चार हैं-अ इ उ ऋ । दीर्घ स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में दो मात्रा का समय लगे अर्थात् ह्रस्व स्वरों के मुकाबले दुगुना समय लगे वे दीर्घ स्वर कहलाते हैं। ये संख्या में सात हैं: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ  नोटः प्लुत स्वरः इनके उच्चारण में तीन मात्रा का समय लगता है। (ये स्वर संस्कृत भाषा के अंतर्गत आते हैं।) जैसे ओ३म्, इसमें ओ की ध्वनि को तीन गुना बढ़ाया गया है। इसी प्रकार राइम, इसमें आ की ध्वनि को तीन गुणा बढ़ाया गया है। हिंदी भाषा में बहुधा ‘अं’ व ‘अ’ का प्रयोग भी किया जाता है, इन्हें हिंदी भाषा में स्वरों में स्थान प्राप्त नहीं है, परंतु संस्कृत में इन्हें स्वरों में स्थान दिया जाता है अतः संस्कृत में स्वरों की कुल संख्या तेरह है। इन दोनों को संयुक्त रूप से अयोगवाह कहा जाता है। इनमें ‘अं’ को अनुस्वार तथा ‘अ’ को विसर्ग कहा जाता है। ओष्ठों की आकृतिक के आधार पर दो स्वरों को दो भागों में बाँटा गया है: वृत्ताकार स्वर: जिन स्वरों के उच्चारण में ओष्ठ वृत्ताकार रहते हैं, जैसे-उ, ऊ, ओ, औ, (ऑ)। अवृत्ताकार स्वर: जिन स्वरों के उच्चारण में ओष्ठ वृत्ताकार न होकर फैले रहते हैं, जैसे- अ, आ, इ, ई, ए, ऐ। व्यंजन व्यंजन वे ध्वनियाँ हैं जिनका स्वतंत्र उच्चारण संभव नहीं है। इनके उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता लेनी पड़ती है। 1. उच्चारण प्रयत्न के आधार परः उच्चारण प्रयत्न से हमारा तात्पर्य है स्वर तंत्री में श्वास का कंपन, श्वास (प्राण) की मात्रा तथा जिह्वा या अन्य अवयवों द्वारा श्वास के अवरोध की प्रक्रिया।  क. स्वरतंत्री में श्वास का कंपन/ घोषत्व के आधार पर इस आधार पर वर्णों के दो भेद हैं- 1. अघोष, 2. सघोष । 1. अघोषः जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कंपन नहीं होता, जैसे-सभी वर्गों के पहले तथा दूसरे व्यंजन (क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ) तथा श ष स और फ अघोष व्यंजन कहलाते हैं। 2. सघोषः जिन ध्वनियों के उचचाण में स्वर तंत्रियों में कंपन होता है, जैसे-सभी वर्गों के तीसरे, चौथे व पाँचवें वर्ण, ड़ ढ़ ज़ य र ल व ह सघोष व्यंजन होते हैं। ख. श्वास या प्राण की मात्राः इस आधार पर दो भेद हैं: 1. अल्पप्राण, 2. महाप्राण | 1. अल्पप्राणः जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास की मात्रा कम निकलती है, जैसे- सभी वर्गों के पहले, तीसरे व पाँचवें वर्ण तथा ड़ य र ल व अल्पप्राण व्यंजन कहलाते हैं। 2. महाप्राणः जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास की मात्रा अधिक निकलती है, जैसे- सभी वर्गों के दूसरे व चौथे वर्ण तथा श ष स ह महाप्राण व्यंजन कहलाते हैं। ग. जिह्वा व अन्य अवयवों द्वारा श्वास का अवरोधः इस आधार पर व्यंजनों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है-1. स्पर्श, 2. अंतस्थ व 3. ऊष्म व्यंजन। 1. स्पर्श: जिन व्यंजनों के उच्चारण में एक उच्चारण अवयव (जिह्वा या ओष्ठ) दूसरे उच्चारण अवयव का स्पर्श करता है, इनमें य और व को अर्ध स्वर ‘इ’ को तथा सभी वर्गों के वर्णों (क से म तक) को स्थान दिया जाता है। 2. अंतस्थ: जिन व्यंजनों के उच्चारण में श्वास का अवरोध कम होता है, उन्हें अंतस्थ व्यंजन कहते हैं, जैसे-य, र, ल, व। ‘ल’ को पाश्विक व्यंजन भी कहा जाता है। 3. ऊष्मः घर्षण के साथ हवा निकलने के कारण श ष स ह को ऊष्म व्यंजन कहा जाता है। संघर्ष व्यंजनः इनमें वायु स्थान विशेष से घर्षण करते हुए निकलती है, जैसे -ज तथा फ उत्क्षिप्त व्यंजनः जिनके उच्चारण के समय जीभ पहले ऊपर उठकर मूर्धा को स्पर्श करती है और फिर एकदम नीचे गिरती है वे उत्क्षिप्त व्यंजन कहलाते हैं, जैसे- ड़ और ढ़। वर्णमाला वर्णों का समूह वर्णमाला कहलाता है। हिंदी भाषा की वर्णमाला में 11 स्वरों व 33 व्यंजनों को मिलाकर कुल 44 वर्ण हैं। नासिक्यः प्रत्येक वर्ग का पाँचवाँ वर्ण नासिक्य वर्ण कहलाता है। ट-वर्ग में दो ध्वनियाँ और होती हैं-ड़ ढ़। इन्हें उत्क्षिप्त ध्वनियाँ कहा जाता है, परंतु वर्णमाला में स्थान नहीं दिया जाता है। इसके अलावा क्ष, त्र, ज्ञ, व श्र संयुक्त वर्णों को भी वर्णमाला में स्थान नहीं दिया जाता। उच्चारण स्थान हिंदी भाषा में प्रत्येक ध्वनि के लिए स्वरतंत्री के हिसाब से एक निश्चित स्थान होता है। उसी स्थान को उच्चारण स्थान कहा जाता है। उच्चारण स्थान के आधार पर ध्वनियों को निम्न प्रकार से बाँटा जा सकता है: कंठ्य (कंठ) :-   क ख ग घ ङ ह मूर्धन्य (मूर्धा) :-  ट ठ ड ढ ण ड़ ढ़ तथा ष वर्त्स्य (दंतमूल) :- स र ल दंतोष्ठ्य (दाँत व ओष्ठ)  :- व फ तालव्य (तालु) :-  च छ ज झ ञ, य और श दंत्य (दाँत) त थ द ध न ओष्ठ्य (ओष्ठ) :- प फ ब भ म

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Hindi Grammar Bhasha aur Lipi भाषा व लिपि #ctet #ctethindi #hindigrammar

 भाषा Bhasha ( Language)  प्राणी जगत में मानव को विशिष्ट प्राणी का दर्जा मिला है. इसका श्रेय मानव के एक विशिष्ट गुण को जाता है। वह है भाषा, मानव परस्पर विचारों का आदान-प्रदान कर सकता है और न केवल आदान-प्रदान अपितु विचारों का संधारण व नई पीढ़ी के लिए उनका संरक्षण करने की भी क्षमता रखता है। मानव द्वारा विचारों के आदान-प्रदान के लिए जिस साधन का प्रयोग किया जाता है उसे भाषा कहते हैं। अन्य शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि “भाषा वैचारिक विनिमय का साधन है।” भाषा के रूप विचारों के परस्पर संप्रेषण के लिए भाषा रूपी साधन का प्रयोग मानव कई प्रकार से कर सकता है, जैसे-मौखिक प्रयोग, लिखित प्रयोग व सांकेतिक प्रयोग। इसी आधार पर हम भाषा को तीन अलग-अलग रूपों में विभाजित कर सकते हैं।  मौखिक भाषा लिखित भाषा  सांकेतिक भाषा मौखिक भाषा भाषा के जिस रूप का प्रयोग हम स्वरतंत्री व वाणी की सहायता से करते हैं, वह भाषा का मौखिक रूप कहलाता है। सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि बोलकर प्रयोग की गई भाषा मौखिक भाषा कहलाती है। भाषा के मौखिक रूप का प्रयोग हम अपने जीवन काल में सबसे पहले करना सीखते हैं इसलिए मौखिक भाषा, भाषा का ‘मूल’ रूप कहलाती है। मौखिक भाषा को संरक्षित नहीं कर सकते कारण विश यह मूल रूप तो है; परंतु अस्थायी है। यद्यपि वर्तमान में तकनीकी ने इस कथन को झुठला दिया है। लिखित भाषा  भाषा का वह रूप जिसमें विचार-विनिमय के लिए हम लिखित चिह्नों या संकेतों का प्रयोग करते हैं। वह भाषा का लिखित रूप कहलाता है। लिखित भाषा सदैव मौखिक भाषा के उपरांत ही सार्थक हो सकती है। लिखित रूप भाषा को स्थायित्व प्रदान करता है। अतः यह भाषा का स्थायी रूप कहलाता है। सांकेतिक भाषा कई बार अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए हम ध्वनि व चिह्नों का प्रयोग न करके शारीरिक संकेतों व हाव-भाव का प्रयोग करते हैं भाषा का यही रूप सांकेतिक भाषा कहलाता है। बहुत-से व्याकरण शास्त्री सांकेतिक भाषा को भाषा के रूपों में स्थान नहीं देते। इसके पीछे उनका तर्क है कि शारीरिक संकेत विकृत अर्थ संप्रेषित कर सकता है। लिपि Lipi ( Script ) किसी भी भाषा को लिखित/ स्थायी रूप देने के लिए जिन चिह्नों अथवा लिखित संकेतों का प्रयोग किया जाता है वे लिपि कहलाते हैं। एक ही लिपि का प्रयोग एक से अधिक भाषाओं को लिखने के लिए किया जा सकता है, जैसे- हिंदी व संस्कृत दोनों को लिखने के लिए एक ही लिपि देवनागरी का प्रयोग होता है। देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। विभिन्न लिपियों को लिखने के तरीके भी भिन्न होते हैं, जैसे-हिंदी को बाएँ से दाएँ लिखा जाता है व उर्दू को दाएँ से बाएँ। लिपि व भाषा का सम्बन्ध विचित्र है, किसी भी भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिए हम किसी भी लिपि का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरणतः हिंदी भाषा को व्यक्त करने के लिए यदि रोमन लिपि का प्रयोग किया जाये तो वह कुछ इस प्रकार होगा-MAIN EK SACHCHA BHARTIYA HOON! इस प्रकार यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कोई भी भाषा किसी लिपि विशेष की पराधीन नहीं है। किसी भी भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिए हम किसी भी लिपि का प्रयोग कर सकते हैं। परन्तु फिर भी प्रत्येक भाषा को (लिखित रूप में) व्यक्त करने के लिए एक मानक लिपि का प्रयोग किया जाता है, जिसे निम्नलिखित तालिका में सूचीबद्ध किया गया है –         भाषा                 मानक              संकेत हिंदी                देवनागरी।          क ख पंजाब              गुरुमुखी             * संस्कृत              देवनागरी           क ख अंग्रेजी              रोमन                 k K भाषा परिवार मानव के परिवार की तरह ही भाषाओं के परिवार होते हैं। एक ही मूल भाषा से जन्मी भाषाएँ एक ही परिवार की भाषाएँ कहलाती हैं। एक ही मूल स्रोत के कारण इन भाषाओं में बहुत सारी समानताएं पायी जाती हैं। विश्व की लगभग 7000 भाषाओं को 12 मुख्य भाषा परिवारों में विभक्त किया जाता है। ये परिवार हैं- भारोपीय  द्रविड़ चीनी सेमेटिक  हेमेटिक  आग्नेय यूराल – आल्टाइक बाँटू अमेरिकी काकेशस सूडानी बुशमैन। #ctet #ctetsuccess #eductet #ctetupdate भारत में संसार के चार भाषा परिवारों की भाषाएँ बोली जाती हैं, जिनमें से भारोपीय भाषा परिवार व द्रविड़ भाषा परिवार मुख्य हैं। उत्तर-भारत की अधिकांश भाषाएँ, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रांसीसी, रूसी, फारसी, एवं ग्रीक आदि भाषाओं को भारोपीय भाषा परिवार की भाषाएँ माना जाता है। दक्षिण-भारत में बोली जाने वाली भाषाएँ द्रविड़ कुल की भाषाएँ हैं।

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