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प्याजे का नैतिक विकास का सिद्धांत

Piaget theory of Moral Development प्याजे का नैतिक विकास का सिद्धांत #ctet2024

    Piaget theory of Moral Development प्याजे का नैतिक विकास का सिद्धांत   जीन पियाजे ने 1932 में एक किताब लिखी “The Moral Judgement of the Child” पियाजे का मानना था कि बच्चों के नैतिक निर्णय के विकास में एक निश्चित क्रम एवं तार्किक पैटर्न होता है जो बौद्धिक विकास से संबंधित होता है। Piagets Theory of Cognitive Development संज्ञानात्मक विकास  यहां पढ़ें संज्ञानात्मक विकास👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻   पियाजे के अनुसार–  ‘“नैतिक विकास न्याय के परिपक्व तथा स्वःस्फूर्त प्रत्ययों की प्राप्ति है जिसे बालक अपने को वातावरण के साथ अंतःक्रिया करते हैं, उन्हें परिवर्तित व परिमार्जित करते हैं। “ Piaget : नैतिक विकास की अवस्था 1. प्रतिमान हीनता (Anomy) यह अवस्था जन्म से 5 वर्ष तक होती है। इस अवस्था मे बालक सामाजिक बंधन, कानून, प्रतिबंध से अनभिज्ञ होते हैं। बालक के व्यवहार का मुख्य आधार सुख-दुख का भाव होता है। 2. परायत्त – सत्ता (Heteronomy) यह अवस्था 5 वर्ष से 8 वर्ष की अवस्था होती है । बालक को उसके उचित आचरण करने का प्रशिक्षण दिया जाता है और नैतिक विकास को पुरस्कार तथा दंड से प्रभावित किया जाता है। नैतिक विकास बाह्य सत्ता द्वारा नियंत्रित होता है। 3. परायत्तता – पारस्परिकता (Hetrocity Reciprocity):-  इस अवस्था मे बालको की उम्र 9 वर्ष से 13 वर्ष होती है। इस समय बालक अपने समान आयु वर्ग व वयस्कों के साथ सहयोग पर बल तथा उनके विचारों से प्रभावित होते है। बालक स्वयं यह समझने लगता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं? लेकिन इसका वो आधार दूसरे की भावना को बनाता है; जैसे-मेरे इस व्यवहार से उनको दुःख न पहुँच जाए। 4. स्वायत्तता किशोरावस्था (Autonomy Adolescence) :-  इस अवस्था मे बालको की उम्र 13 वर्ष से 18 वर्ष होती है। किशोर में पूर्ण रूप से सोचने-समझने की क्षमता विकसित हो चुकी होती है। वे अपने व्यवहार के लिए स्वयं उत्तरदायी होते हैं। किशोर स्वयं के लिए वयस्कों सा सम्मान चाहते हैं। पियाज ने नैतिक विकास की अवस्था को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण विकास काल में नैतिकता के तीन स्तर बताए हैं :-  1. नैतिक यर्थाथता (Moral Realism) :- बालक बाध्यता स्वरूप, नैतिक मानकों को स्वीकार करता है तथा उनको आचरण में लाता है परंतु स्वयं की इच्छा से नहीं बल्कि दबाव स्वरूप इन नैतिक प्रतिमान को स्वीकार करता है। नैतिक यथार्थता के दो मूल स्रोत बताए गए हैं- बालकों की बौद्धिक संरचना, वातावरण से प्राप्त अनुभव। 2. नैतिक समानता (Moral Equality) :-  बालक परस्पर सहमति के आधार पर नियमों को बनाते है। बालक सहयोगात्मक खेल अधिक पसंद करते हैं। 3. नैतिक सापेक्षिता (Moral Relativism) :-  बिना किसी बाहरी दबाव के न्याय के आदर्श का अनुसरण किया जाता है लेकिन इसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी होता है। किशोर स्वयं के नियम बनाना शुरू कर देते हैं। Most important Topics for #CTET #CDP 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻   Pavlovs-classical-conditioning-theory Thorndikes-law-of-learning-part-1 Exigency-hierarchy-theory  Motivation-and-learning  Gender-issues-in-social-construction Trending News  CTET                  

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Piaget Theory of Cognitive Development पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त ctet success eductet

Piaget’s Theory of Cognitive Development पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त #ctet #CDP #pedagogy #uptet #ctet2022

         पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त Piaget’s Theory of Cognitive Development    जीन पियाजे ने बालकों के संज्ञानात्मक विकास की व्याख्या अपने सिद्धान्त को चार मुख्य अवस्थाओं में बाँटकर की है। इन्ही अवस्थाओं से गुजरकर बालक का संज्ञानात्मक विकास होता है। ये अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं|       पियाजे संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ:-      1. ज्ञानात्मक क्रियात्मक या संवेदी पेशीय अवस्था (Sensory-motor stage)   यह अवस्था जन्म से दो साल तक होती है। इस अवस्था में शिशु अपनी आँखों, कानों, हाथों और अन्य संवेदी प्रेरक उपकरणों के माध्यम से सोचता है। इस अवस्था में शिशुओं का संज्ञानात्मक विकास 6 उप-अवस्थाओं से होकर गुजरता है।   (i) प्रवर्तक क्रियाओं की अवस्था :-  पहली उप-अवस्था जन्म से 30 दिन तक होती है। इसे प्रतिवर्त्त क्रिया अवस्था भी कहते हैं क्योंकि इस अवस्था में बालक मात्र प्रतिवर्त्त क्रियाएं करता है; जैसे किसी चीज को चूसना आदि।   (ii) मुख्य वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था :-  दूसरी उप-अवस्था 1 माह से लेकर 4 माह तक की अवधि की होती है। इस अवस्था को प्रमुख वृत्तीय प्रतिक्रिया की अवस्था कहते हैं। प्रमुख इसलिए कहते है कि उनके शरीर की प्रमुख प्रतिवर्त्त क्रियाएँ है और वृत्तीय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उन्हें दोहराया जाता है।   (iii) गौण वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था :-  तीसरी उप- अवस्था 4 माह से लेकर 8 माह तक की अवधि की होती है। इस अवस्था में शिशु वस्तुओं को छूने तथा उन्हें इधर-उधर उलट-पलट करता है।   (iv) गौण स्कीमैटा से समन्वय की अवस्था :-  चौथी उप-अवस्था 8 माह से 12 माह तक इस अवस्था में शिशु वयस्कों का अनुकरण करना प्रारंभ कर देते है; जैसे नाना कैसे हँसते है, बड़े पापा कैसे करते हैं, आदि।   (v) तीसरी वृत्तीय प्रतिक्रियाओ की अवस्था :-  पाँचवीं उप-अवस्था 12 माह से 18 माह तक की होती है। इसमें प्रयत्न व त्रुटि. के आधार पर सीखना शुरू कर देता है जानने की प्रबलता बढ़ जाती है।   (vi) मानसिक संयोग द्वारा नवीन साधनों की खोज की अवस्था :- छठी उप-अवस्था 18 माह से 24 माह की अवधि होती है। इस अवस्था में बालक चिंतन करना प्रारंभ कर देता है। (यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि वह बिना भाषा के ज्ञान के चिंतन करता है) बालक में वस्तु स्थायित्व का गुण विकसित हो जाता है अर्थात् वस्तु को उसके सामने से हटा देने पर भी वो यह जानता है कि वस्तु का वजूद है जबकि वह प्रारंभ में यह समझता था कि वस्तु यदि सामने से हट गयी तो वजूद उसका खत्म हो गया। यही कारण है कि इस अवस्था में बालक के सामने से खिलौने हटाने पर वह उसके पाने की जिद करता रहता है।      Jean Piaget Concept (संप्रत्यय)   यहां से पढ़े प्रथम भाग👆🏻👆🏻👆🏻 part 1 read here        2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था ( Preoperational Stage )     संज्ञानात्मक विकास की इस अवस्था की अवधि 2 से 7 वर्ष के मध्य की होती है। बालक के विकास की इस अवधि को प्राय: प्रारम्भिक बाल्यावस्था के नाम से भी जाना जाता है। इस अवस्था में बालकों की मानसिक प्रतीक निर्माण प्रक्रियाओं में असाधारण परिवर्तन होता है। पियाजे ने इस अवस्था को मुख्य दो भागों में बाँटा है, जो निम्न हैं     (i) पूर्व वैचारिक अवस्था ( Pre Conceptual Period ) :-    इस अवस्था की अवधि 2 से 4 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बालक वस्तुओं, शब्द चिन्हों आदि के विषय में अपना मानसिक चिन्तन विकसित करने लगता है। इस अवस्था में बालक में आत्मकेंद्रित का भाव आ जाता है। स्वयं को महत्त्वपूर्ण समझता है उसे यह लगता है कि सूर्य, चंद्रमा आदि उसके पीछे चलते है। बालक में संकेत, भाषा, शब्द तेजी से विकसित होते हैं। इस अवस्था में बालक द्वारा किए जाने वाले कार्य (लाक्षणिक) मुख्यत: अनुकरण तथा खेल के माध्यम से किए जाते हैं।      (ii) अन्तदर्शी अवस्था ( Intuitive Period ) :-    इस अवस्था की अवधि 4 से 7 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बालक का चिन्तन एवं तर्कणा पहले से अधिक परिपक्व हो जाती हैं। परिणामस्वरूप वह साधारण मानसिक क्रियाओं जैसे जोड़, घटाव गुणा व भाग आदि में सम्मिलित तो हो जाता है परन्तु इन मानसिक क्रियाओं के पीछे छिपे नियमों को समझ नहीं पाता है अर्थात् बालक यह तो बता देता है कि 3 × 3 = 9, लेकिन बालक यह बताने में असमर्थ होता है कि 9 + 3 = 3 होगा।       ____ यहां से पढ़े 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻   स्किनर Skinner (important)    Thorndikes-law-of-learning     3. मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था ( Concrete Operational       Stage ) :-    इस अवस्था की अवधि 7 से 11 वर्ष के मध्य की होती है। संज्ञानात्मक विकास की इस अवस्था में बालक का चिन्तन एवं तर्कणा पहली अवस्था (पूर्व संक्रियात्मक अवस्था) की तुलना में अधिक क्रमबद्ध तथा तर्कसंगत हो जाता है, साथ ही उसके चिन्तन में पलटावी गुण भी आ जाता है। इस अवस्था में बालक में संरक्षण, सम्बन्ध तथा वर्गीकरण संप्रत्यय का गुण भी विकसित हो जाता है। परिणामस्वरूप बालक वस्तुओं के गुणों के आधार पर उन्हें विभिन्न वर्गों या उपवर्गों में विभाजित करने लगता है। अतः उपरोक्त आधार पर हम कह सकते हैं कि इस अवस्था में बालक की विचार प्रक्रिया छोटे बच्चों के बजाय बड़ों से अधिक मिलने लगती है।     4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था ( Formal       Operational Stage ) :-    इस अवस्था की अवधि 11 से 15 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बालक में अमूर्त तथा वैज्ञानिक ढंग से सोचने की क्षमता विकसित हो जाती है अर्थात् उनका चिन्तन अधिक लचीला तथा प्रभावी हो जाता है, साथ ही चिन्तन में क्रमबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। जहाँ मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था में बालक वास्तविक संसार के साथ संक्रियाएँ करता है, वहीं औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था में वह संक्रियाओं के साथ ही संक्रिया कर आन्तरिक चिन्तन के माध्यम से व्यापक रूप से तार्किक नियम गढ़ने में समर्थ हो जाता है। इस अवस्था पर शिक्षा के स्तर का भी प्रभाव पड़ता है। जिन बालकों में शिक्षा स्तर की काफी नीचा होता है उनमें औपचारिक संक्रियात्मक चिंतन भी काफी कम होता है जिनमें ज्यादा होगा उनमें चिंतन भी ज्यादा होगा।

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Jean Piaget Concept जीन पियाजे का प्रमुख संप्रत्यय #CTET ctet success eductet

Jean Piaget Concept जीन पियाजे का प्रमुख संप्रत्यय #CTET2024

                Jean Piaget Concept  जीन पियाजे का प्रमुख संप्रत्यय  Jean Piaget परिचय जीन पियाजे (Jean Piaget) एक स्विस मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने बालक के मानसिक विकास के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जन्म 9 अगस्त 1896 को हुआ था और वे 16 सितंबर 1980 को निधन हो गए। पियाजे के सिद्धांतों ने शिक्षा, मनोविज्ञान और विकासात्मक अध्ययन के क्षेत्र में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। ये स्विस मनोवैज्ञानिक थे। मूल रूप से पियाजे जीव वैज्ञानिक थे। जब ये अल्फ्रेड बिने के प्रयोगशाला में बुद्धि परीक्षणों पर साथ कार्य कर रहे थे तभी संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत को भौतिक विकास का सिद्धांत भी कहते हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त की व्याख्या करने से पहले इससे सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय की व्याख्या करना उचित है। मानसिक विकास के क्षेत्र में गहरा प्रभाव पड़ा है और उनके सिद्धांतों का पालन आज भी शिक्षा, मनोविज्ञान और बच्चों के विकास के अध्ययन में किया जाता है। उनकी कृतियाँ जैसे “The Child’s Conception of the World” और “The Origins of Intelligence in Children” महत्वपूर्ण पाठ्यक्रमों का हिस्सा बन गई हैं।     प्रमुख संप्रत्यय   1. अनुकूलनः अनुकूलन की प्रवृत्ति बालक में जन्मजात होती है। अनुकूलन का अर्थ है-वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना। यह दो तरीके से होता है   (i) आत्मसातीकरण (Assimilation)   (ii) समायोजन ( Accommodation)     (i) आत्मसातीकरण:  जब कोई बालक नई परिस्थिति में होता है तब वह पूर्व स्थापित प्रतिरूप (Pattern) के आधार पर व्यवहार करता है और यदि यह प्रतिरूप (pattern) सफल हो जाता है तो वह इसमें कोई परिवर्तन नहीं लाएगा। यही आत्मसातीकरण है। साधारण शब्दों में कहें तो पूर्व की परिस्थिति में प्रयोग किए गए व्यवहार को नवीन परिस्थिति में प्रयोग करने पर सामंजस्य स्थापित हो जाता है तो उस व्यवहार में कोई परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती है।     (ii) समायोजनः  नवीन परिस्थिति में पूर्व किए गए व्यवहार का प्रयोग कर यदि सामंजस्य स्थापित नहीं होता है तब पूर्व किए गए व्यवहार के प्रतिरूप में बदलाव या परिवर्तन बालक करता है इसे ही समायोजन कहते हैं।   Skinners-operant-conditioning-theory   Kurt-lewins-regional-theory-of-learning     2. साम्यधारण (Equilibration):  जब बालक न तो आत्मसातीकरण द्वारा या समायोजन द्वारा सामंजस्य या अनुकूलन स्थापित कर पाता है तब वह आत्मसातीकरण व समायोजन के बीच संतुलन स्थापित करता है इसी प्रक्रियां को साम्यधारण कहते हैं।     3. संरक्षण (Conservation):  यह ऐसी प्रक्रिया है 1. जिसके द्वारा बालक में एक तरफ वातावरण के परिवर्तन तथा स्थिरता में अंतर करने की क्षमता और दूसरी तरफ वस्तु के रंग-रूप में परिवर्तन तथा उसके तत्व में परिवर्तन के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित होती है।     4. संज्ञानात्मक संरचना (Cognitive structure):  जीन पियाजे ने मानसिक योग्यताओं के सेट (set) को संज्ञानात्मक संरचना की संज्ञा दी है। भिन्न-भिन्न उम्र में बालकों की संज्ञानात्मक संरचना में भिन्नता होती है। उदाहरण संज्ञानात्मक संरचना के आधार पर ही एक 10 वर्ष के बालक व 4 वर्ष के बालक के व्यवहार में अंतर समझा जाता है।     5. मानसिक संक्रिया (Mental Operation):  जब बालक के सामने कोई समस्या आती है और वह उसके समाधान हेतु चिंतन करने लगता है, तो वह मानसिक संक्रिया करते समझा 7 जाता है।     6. स्कीम्स (Schemes ):  व्यवहार के संगठित पैटर्न जिसे बार-बार दोहराया जाता है स्कीम्स कहा जाता है, जैसे- बालक स्कूल जाते वक्त ड्रेस पहनता है या जूता पहनता है। वह उसी तरह पहनता है, चाहे उसका ध्यान उस वक्त वहाँ पर न हो क्योंकि व्यवहार इतना संगठित रूप में हो चुका है कि वह उसी तरह कार्य को संपादित करता है।     7. स्कीमा (Schema):  ऐसी मानसिक संरचना जिनका सामान्यीकरण संभव हो।     8. विकेंद्रण (Decentering):  यह यथार्थ चिंतन से संबंधित है। बालक किसी समस्या के समाधान के संबंध में किस सीमा तक वास्तविक रूप में सोच विचार करता है। इस संप्रत्यय का विपरीत आत्मकेंद्रण (ego centric) है। प्रारंभ में बालक आत्मकेंद्रण ढंग से सोचता है और बाद में उम्र बढ़ने पर विकेंद्री ढंग से सोचने लगता है।     9. पारस्परिक क्रिया:  पियाजे के अनुसार बच्चों में वास्तविकता को समझने तथा उसकी खोज करने की क्षमता न केवल बालकों की परिपक्वता और न ही केवल उनके शिक्षण पर निर्भर करती है बल्कि दोनों की पारस्परिक क्रिया पर आधारित है।       सिद्धांत  यहां से पढ़े और पसंद आये तो शेयर भी करे 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻   1. संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत   2. Jean Piaget Moral Development Theory नैतिक विकास का सिद्धांत    CTET UPDATES   Trending News  

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स्किनर का क्रिया-प्रसूत का सिद्धान्त Skinner’s Operant Conditioning Theory ctet success eductet

स्किनर का क्रिया-प्रसूत का सिद्धान्त Skinner’s Operant Conditioning Theory CDP #CTET2024

          स्किनर का क्रिया-प्रसूत का सिद्धान्त    स्किनर द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त साधानात्मक अनुबन्धन पर आधारित है। साधानात्मक अनुबन्धन में प्रयोज्य के सीखने के व्यवहार का अध्ययन सक्रिय रूप से किया जाता है। इसी आधार पर उनके इस सिद्धान्त को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। जैसे :-      कार्यात्मक अनुबन्धन का सिद्धान्त नैतिक अनुबन्धन का सिद्धान्त • सक्रिय अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धान्त क्रिया-प्रसूत अनुबन्धन का सिद्धान्त स्किनर के अनुसार, कुछ अनुक्रिया (व्यवहार) स्वाभिक रूप से प्राणी द्वारा किए जाते हैं। उन्होंने अपने सिद्धान्त की व्याख्या दो प्रकार की अनुक्रियाओं के माध्यम से की है जिनका विवरण निम्नवत् है:-   (i) प्रतिवादी अनुक्रिया (ii) क्रिया-प्रसूत अनुक्रिया प्रतिवादी अनुक्रिया:-  यह अनुक्रिया एक स्पष्ट उद्दीपन द्वारा उत्पन्न होती है जिसका स्वरूप अनैच्छिक होता है। जैसे कुत्ते के द्वारा भोजन देखकर लार का स्राव होना ।  क्रिया-प्रसूत अनुक्रिया:-  यह अनुक्रिया एक अस्पष्ट उद्दीपन द्वारा उत्पन्न होती है जिसका स्वरूप ऐच्छिक होता है। जैसे बात चीत करना, टहलना आदि । Some important Topics of CDP Pavlovs-classical-conditioning-theory   Thorndikes-law-of-learning-part-1   Gender-issues-in-social-construction स्किनर Skinner’s Operant Conditioning Theory This hypothesis propounded by Skinner depends on the restrictive agreement. The learning conduct of the student is effectively concentrated on in relevant contracting. On this premise his hypothesis is called by various names. like :- Hypothesis of Functional Contract Theory of Moral Contracting • Standard of Active Adapted Response • Hypothesis of verbal contractility According to Skinner, certain reactions (ways of behaving) are performed normally by the creature. He has made sense of his hypothesis through two sorts of responses, whose subtleties are as per the following:-  (I) respondent reaction (ii) obstetric reaction   Respondent Response:- This reaction is created by an unequivocal upgrade which is compulsory in nature. Like discharge of spit in the wake of seeing food by canine. Activity attentive reaction:- This reaction is produced by a vague boost whose nature is deliberate. Like talking, strolling and so on. Important Topics  👇👇👇👇👇👇👇👇   Thorndikes-law-of-learning    Socialization-process समाजीकरण की प्रक्रिया    Evaluation-of-learning | मूल्यांकन   individual-difference | व्यक्तिक विभिन्नता     CTET LATEST UPDATE  Trending News  CTET Notes            

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कर्ट लेविन का सीखने का क्षेत्रीय सिद्धान्त Kurt Lewin’s Regional Theory of Learning ctet success eductet

कर्ट लेविन का सीखने का क्षेत्रीय सिद्धान्त Kurt Lewin’s Regional Theory of Learning CTET2024

          कर्ट लेविन का सीखने का क्षेत्रीय सिद्धान्त  कर्ट लेविन द्वारा प्रतिपादित सीखने का क्षेत्रीय सिद्धान्त गेस्टाल्ट सिद्धान्त के ही समान है परन्तु यह सिद्धान्त इससे थोड़ा-सा भिन्न है क्योंकि यह अनुभव के स्थान पर व्यवहार को अधिक महत्त्व देता है तथा मानवीय अभिप्रेरण पर भी बल देता है। कर्ट लेविन ने अपने मत का आधार वातावरण में व्यक्ति की स्थिति को बताया। लेविन ने जीवन-स्थल के आधार पर व्यक्ति के अनुभवों की व्याख्या की है। उसके अनुसार जीवन-स्थल वह वातावरण है जिसमें व्यक्ति रहता है और उससे प्रभावित होता है। किसी व्यक्ति का यह जीवन-स्थल मनोवैज्ञानिक शक्तियों पर निर्भर करता है। लेविन के अनुसार सीखना कोई अनोखी क्रिया नहीं है। उसने बताया कि सीखने की क्रिया को समझने के लिए हमें केवल यह समझना होता है कि जीवन-स्थल का नव संगठन किस प्रकार होता है तथा मनोवैज्ञानिक संसार की संरचना किस प्रकार होती है? अतः सीखना हमारे अनुभवों या जीवन-स्थल की संरचना में परिवर्तन लाने से होता है। लेविन ने आगे बताया कि वास्तव में, सीखना वातावरण का संगठन है। कर्ट लेविन के क्षेत्रीय सिद्धान्त के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रत्यय निम्न है:- क्षेत्र :- लेविन के अनुसार क्षेत्र का तात्पर्य मानव के उस सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिक जगत से है जिसमें वह रहता है तथा किसी समय विशेष में भ्रमण करता है। जीवन विस्तार :-  जीवन-विस्तार का आशय उस वातावरण से है जिसमे मनुष्य है और उस वातावरण का प्रभाव व्यक्ति पर निरन्तर पड़ता रहता है। वातावरण से तात्पर्य प्राकृतिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक वातावरण है जिसमें व्यक्ति लगातार संघर्ष करता रहता है और उससे प्रभावित होता रहता है।  बाह्य आवरण :-  बाह्य आवरण से आशय व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक वातावरण के बाहर चारों ओर रहता है। यह प्राणी से सम्बन्धित वातावरण के उन पक्षों से निर्मित होता है, जिसका प्रत्यक्षीकरण व्यक्ति स्वयं नहीं कर पाता किन्तु उस व्यक्ति का अध्ययन करने वाले लोग उसका प्रत्यक्षीकरण कर सकते हैं।  तलरूप:-  लेविन ने तलरूप का प्रत्यय रेखागणित से लिया है जिसमें अन्दर बाहर तथा सीमा के प्रत्ययों की विवेचना की जाती है।  अवरोध:- कर्ट लेविन ने इसे वातावरण का एक गत्यात्मक पहलू बताया है जो व्यक्ति के लक्ष्य या उद्देश्य तक पहुँचने के मार्ग में आ खड़ा होता है तथा उसके आगे बढ़ने की गति को अवरुद्ध कर देता है।   Some important Topics of CDP Pavlovs-classical-conditioning-theory   Thorndikes-law-of-learning-part-1   Gender-issues-in-social-construction                  Kurt Lewin’s Regional                Theory of Learning      The regional theory of learning propounded by Kurt Lewin is similar to the Gestalt theory, but this theory is slightly different from it because it gives more importance to behavior rather than experience and also emphasizes on human motivation. Kurt Levin based his opinion on the position of the individual in the environment. Levine has explained the experiences of the individual on the basis of place of life. According to him the place of life is the environment in which a person lives and is affected by it. This place of life of a person depends on the psychological forces. According to Levine, learning is not a unique activity. He said that in order to understand the process of learning, we only have to understand how the new organization of the living space takes place and how the psychological world is structured. Thus learning takes place by bringing about changes in the structure of our experiences or living space. Levine further pointed out that in fact, learning is the organization of the environment. कर्ट लेविन : Some of the important concepts of Kurt Lewin’s Regional :- Regional theory are as follows. According to Lewin, the field refers to the whole psychological world of man in which he lives and travels at a particular time. Life Extension:-  Life-extension refers to the environment in which human beings are and the extent of that environment. The effect keeps on falling on the person. Environment means natural, social and psychological environment In which a person constantly struggles and keeps getting affected by it.  Outer cover :- Outer cover refers to the surroundings outside the psychological environment of the individual. It is formed from those aspects of the environment related to the animal, which the person himself is not able to perceive, but the people who study that person can perceive him. Topography:-  Levin has taken the concept of plane form from geometry, in which the concepts of inside, outside and limit are considered. Obstacles :- Kurt Levin has described it as a dynamic aspect of the environment that stands in the way of a person reaching his goal or objective and impedes his progress   Dalton-method-importent-for-ctet Important CTET Topic  CTET LATEST UPDATES                      

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ऊसूबेल के सीखने का सिद्धान्त | Ausubels's Theory of Learning ctet success eductet

ऊसूबेल के सीखने का सिद्धान्त | Ausubels’s Theory of Learning #ctet2024

                 ऊसूबेल के सीखने का सिद्धान्त    डेविड ऊसूबेल ने संज्ञान द्वारा सीखने पर आधारित इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया था। इसको संज्ञानात्मक सिद्धान्त इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस सिद्धान्त का मूल उद्देश्य सीखते समय व्यक्ति में क्या होता है, का वर्णन करना है। इस सिद्धान्त में मूल रूप से यह बताने की कोशिश की गई है कि सीखने की प्रक्रिया में जब नई विषय-वस्तु को शिक्षार्थी अपने पूर्व ज्ञान के साथ जोड़ते हैं तो उस नई विषय-वस्तु का क्या होता है? इस सिद्धान्त में शिक्षार्थी के पूर्व ज्ञान के भण्डार को ‘संज्ञानात्मक संरचना’ कहा गया है और जब शिक्षार्थी इस संज्ञानात्मक संरचना में नई विषय-वस्तु से सीखी गई अनुभूतियों को सार्थक ढंग से जोड़ता है या सम्बन्धित करता है, तो उसे उसका आत्मसात्करण होता है।   ऊसूबेल ने अपने सीखने के सिद्धान्त में सीखने के निम्नांकित चार प्रकार का वर्णन किया है:- रटकर सीखना विषय-वस्तु को बिना समझे हू-ब-हू सीखना ।  अर्थपूर्ण सीखना विषय-वस्तु को समझ कर आत्मसात करना। अभिग्रहण सीखना विषय-वस्तु का हू-ब-हू तथा समझकर सीखना। अन्वेषण सीखना विषय-वस्तु में से नये विचार की खोज कर उसे सीखना।   Very important topics  Pavlovs-classical-conditioning-theory Thorndikes-law-of-learning-part-1 Exigency-hierarchy-theory  Motivation-and-learning  Gender-issues-in-social-construction  CTET Latest news  CTET Notes  Tranding News        Ausubels’s Theory of Learning     This theory based on learning by cognition was propounded by David Usubel. It is called cognitive theory because the basic purpose of this theory is to describe what happens in a person while learning. This theory basically tries to explain that in the process of learning, when learners add a new subject matter with their previous knowledge, what happens to that new content? In this theory, the store of prior knowledge of the learner is called ‘cognitive structure’ and when the learner meaningfully connects or relates the learned experiences with the new subject matter in this cognitive structure, then it is assimilated.     Usubel has described the following four types of learning in his Theory of Learning.   Learning by rote learning without understanding the subject matter.    Meaningful learning To understand and assimilate the subject matter.   Learning to Reception Learning through and understanding of the subject matter.    Learning to Explore by discovering and learning new ideas out of the conten          

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पॉवलाव का अनुबन्धन-अनुक्रिया का सिद्धान्त Pavlov's Classical Conditioning Theory ctet success eductet

पॉवलाव का अनुबन्धन-अनुक्रिया का सिद्धान्त Pavlov’s Classical Conditioning Theory CTET2024

   पॉवलाव का अनुबन्धन –             पॉवलाव का अनुबन्धन-अनुक्रिया का सिद्धान्त (Pavlov’s Classical Conditioning Theory) एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है, जिसे रूस के मनोवैज्ञानिक इवान पावलोव (Ivan Pavlov) ने विकसित किया था। यह सिद्धान्त मनुष्यों और पशुओं में व्यवहार के विकास को समझाने के लिए प्रमुख रूप से प्रयोग में आता है। पावलोव का शोध विशेष रूप से कंडीशनिंग (conditioning) की प्रक्रिया को समझने में सहायक था, जो यह बताता है कि किस प्रकार एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया (unconditioned response) को एक सामान्य उत्तेजना (neutral stimulus) से जोड़कर एक नया व्यवहार उत्पन्न किया जा सकता है। पॉवलाव के शोध का प्रमुख उद्देश्य पावलोव का प्रारंभिक अध्ययन पाचन तंत्र (digestive system) पर था, और उन्होंने कुत्तों पर प्रयोग करते हुए पाया कि कुत्ते भोजन देखते समय लार (salivation) छोड़ते थे। लेकिन पावलोव ने यह देखा कि यदि कुत्तों को भोजन से पहले कोई विशेष उत्तेजना (जैसे घंटी की आवाज) दी जाती थी, तो कुछ समय बाद वे घंटी की आवाज सुनते ही लार छोड़ने लगते थे, भले ही भोजन नहीं दिया जा रहा हो। यह घटना क्लासिकल कंडीशनिंग (Classical Conditioning) या अनुबन्धन-अनुक्रिया सिद्धान्त (Conditioned Reflex Theory) के रूप में जानी गई। पॉवलाव के प्रयोग की मुख्य बातें: पावलोव ने कुत्तों पर किए गए प्रयोग में चार प्रमुख तत्वों की पहचान की: अस्वीकृत उत्तेजना (Unconditioned Stimulus – UCS): यह वह उत्तेजना है जो स्वाभाविक रूप से और स्वतः किसी प्रतिक्रिया (response) को उत्पन्न करती है। जैसे, भोजन एक अस्वीकृत उत्तेजना है जो कुत्ते में लार उत्पन्न करती है। अस्वीकृत प्रतिक्रिया (Unconditioned Response – UCR): यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक और स्वतः उत्पन्न होती है जब कुत्ता भोजन प्राप्त करता है। जैसे, भोजन खाने पर कुत्ते की लार का स्राव होना। तटस्थ उत्तेजना (Neutral Stimulus – NS): यह वह उत्तेजना है जो पहले कुत्ते में कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करती। जैसे, घंटी की आवाज, जो पहले कुत्ते में लार का स्राव नहीं करती थी। सशर्त उत्तेजना (Conditioned Stimulus – CS): जब तटस्थ उत्तेजना (जैसे घंटी की आवाज) को अस्वीकृत उत्तेजना (जैसे भोजन) के साथ जोड़ा जाता है, तो वह उत्तेजना एक सशर्त उत्तेजना में परिवर्तित हो जाती है, जो अब प्रतिक्रिया उत्पन्न करने में सक्षम होती है। घंटी की आवाज (जो पहले तटस्थ थी) अब भोजन की तरह प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। सशर्त प्रतिक्रिया (Conditioned Response – CR): यह वह प्रतिक्रिया है जो सशर्त उत्तेजना के प्रति उत्पन्न होती है, जो अस्वीकृत प्रतिक्रिया की तरह होती है। जैसे, घंटी की आवाज सुनते ही कुत्ता लार छोड़ने लगता है। पावलोव के अनुबन्धन-अनुक्रिया के सिद्धान्त के चरण: प्रारंभिक अवस्था (Before Conditioning): UCS (भोजन) → UCR (लार का स्राव)। NS (घंटी की आवाज) → कोई प्रतिक्रिया नहीं। कंडीशनिंग प्रक्रिया (During Conditioning): NS (घंटी की आवाज) और UCS (भोजन) को एक साथ जोड़ा जाता है। बार-बार दोनों उत्तेजनाओं (घंटी और भोजन) का एक साथ अनुभव होता है। अंतिम अवस्था (After Conditioning): CS (घंटी की आवाज) → CR (लार का स्राव)। अब, घंटी की आवाज सुनने से कुत्ते में लार का स्राव उत्पन्न होने लगता है, भले ही भोजन न दिया जाए। पावलोव के सिद्धान्त का प्रभाव: स्वाभाविक प्रतिक्रियाएँ: पावलोव ने सिद्ध किया कि स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं (जैसे लार का स्राव) को शर्तों के तहत नियंत्रित किया जा सकता है। यह सिद्धान्त यह भी बताता है कि एक सामान्य उत्तेजना को कई बार किसी अन्य स्वाभाविक उत्तेजना के साथ जोड़ने से उसे एक नई प्रतिक्रिया उत्पन्न करने में सक्षम बनाया जा सकता है। मानव व्यवहार और शिक्षा: पावलोव का सिद्धान्त यह भी दर्शाता है कि हमारे व्यवहार और प्रतिक्रियाएँ अक्सर बाहरी उत्तेजनाओं के कारण प्रभावित होती हैं। इसका प्रयोग मानसिक स्वास्थ्य उपचार, शिक्षा, और व्यवहार चिकित्सा में भी किया जाता है, जैसे, शर्तीय व्यवहार का इलाज करना (जैसे, भय या चिंता को नियंत्रित करना)। शर्तीयता का प्रयोग: पावलोव के सिद्धान्त का प्रभाव न केवल पशु व्यवहार अध्ययन में, बल्कि मानव व्यवहार में भी देखने को मिलता है। यह सिद्धान्त यह समझने में मदद करता है कि किसी विशेष अनुभव से जुड़े डर, इच्छाएँ या आदतें कैसे विकसित होती हैं। निष्कर्ष: पावलोव का अनुबन्धन-अनुक्रिया सिद्धान्त यह बताता है कि सामान्य उत्तेजनाएँ (जो स्वाभाविक रूप से कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करतीं) को किसी स्वाभाविक उत्तेजना के साथ जोड़कर उन्हें एक नई प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। यह सिद्धान्त मनोविज्ञान, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और मानव और पशु दोनों के व्यवहार को समझने में मदद करता है। Important Topics  👇👇👇👇👇👇👇👇   Thorndikes-law-of-learning    Socialization-process समाजीकरण की प्रक्रिया          ☝️☝️☝️☝️☝️        Pavlov’s Classical   Conditioning Theory       Important Topics  CTET Result  Ctet Important Question 👇👇👇👇👇👇👇👇   Evaluation-of-learning | मूल्यांकन   individual-difference | व्यक्तिक विभिन्नता      

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Thorndike – Laws of Learning Part 2| सीखने के गौण नियम भाग – 2

                        Part – 2                                       सीखने के गौण नियम       Subordinate Laws of Learning  Part 1:- Thorndikes Law of Learning Part-1 | थार्नडाइक का सिद्धांत – भाग 1 1. बहु-प्रतिक्रिया का नियम Law of Multiple Responses)  इस नियम के अनुसार व्यक्ति के सामने जब नई समस्या आती है तो वह उसे सुलझाने के लिए अनेक प्रकार की क्रियाएँ करता है और तब तक करता रहता है जब तक कि वह सही अनुक्रिया की खोज नहीं कर लेता। ऐसा होने पर उसकी समस्या सुलझ जाती है और उसे सन्तोष मिलता है। असफल होने पर व्यक्ति को हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए बल्कि एक के बाद एक उपाय पर अमल करते रहना चाहिए जब तक कि सफलता प्राप्त न हो जाए। यह नियम ‘प्रयत्न एवं भूल’ पर आधारित है।  2. मानसिक स्थिति का नियम (Law of Mental Status) इस नियम को तत्परता या अभिवृत्ति का नियम भी कहते हैं। यह नियम इस बात पर बल देता है कि बाहरी स्थिति की ओर प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति की मनोवृत्ति पर निर्भर करती हैं अर्थात्, यदि व्यक्ति मानसिक रूप से सीखने के लिए तैयार है तो नये कार्यो को आसानी से सीख लेगा और यदि वह मानसिक रूप से सीखने के लिए तैयार नहीं है तो उस कार्य को नहीं सीख सकेगा। निद्रा, सभ्यता, थकावट, आकाँक्षाएँ, भावनाएँ आदि सभी हमारी मनोवृत्ति को प्रभावित करती हैं। उदाहरणार्थ मूर्ति को देखकर हिन्दू हाथ जोड़ लेते हैं, मूर्ति के सामने मस्तक टेककर सन्तुष्ट होते हैं और मूर्ति को चोट पहुंचाने से उन्हें भी चोट पहुँचती है। Exigency Hierarchy Theory| मैस्लो का सिद्धांत 3. आंशिक क्रिया का नियम (Law of Partial Function) यह नियम इस बात पर बल देता है कि कोई एक प्रतिक्रिया सम्पूर्ण स्थिति के प्रति नहीं होती है। यह केवल सम्पूर्ण स्थिति के कुछ पक्षों अथवा अंशों के प्रति ही होती है। जब हम किसी स्थिति का एक ही अंश दोहराते हैं तो प्रतिक्रिया हो जाती हैं। इस नियम में इस प्रकार ‘अंश से पूर्ण की ओर’ शिक्षण सूत्र का अनुसरण किया जाता है। पाठ योजना को छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त करके पढ़ाना इसी नियम पर आधारित है। संक्षेप में, व्यक्ति किसी समस्या के उपस्थित होने पर उसके अनावश्यक विस्तार को छोड़कर उसके मूल तत्त्वों पर अपनी अनुक्रिया केन्द्रित कर लेता है। आंशिक क्रियाओं को करके समस्या का हल ढूंढ लेने को ही थॉर्नडाइक ने आंशिक क्रिया का नियम बताया है। 4. समानता का नियम ( Law of Equality ) इस नियम का आधार पूर्व ज्ञान या पूर्व अनुभव है। किसी नवीन परिस्थिति या समस्या के उपस्थित होने पर व्यक्ति उससे मिलती-जुलती अन्य परिस्थिति या समस्या का स्मरण करता है, जिससे वह पहले भी गुजर चुका है और ऐसी स्थिति में व्यक्ति नवीन परिस्थिति में वैसी ही अनुक्रिया करता है जैसी उसने पुरानी परिस्थिति में की थी। समान तत्त्वों के आधार पर नवीन ज्ञान को पूर्व ज्ञान से सम्बद्ध करके पढ़ाने से सीखना सरल हो जाता है। ज्ञात से अज्ञात की ओर’ शिक्षण सूत्र इसी नियम पर आधारित है। Individual Difference | वैयक्तिक विभिन्नता 5. साहचर्य परिवर्तन का नियम (Law of Associative Changing) जैसा कि इस नियम के नाम से ही स्पष्ट है, इसमें सीखने की अनुक्रिया का स्थान परिवर्तन होता है। यह स्थान परिवर्तन मूल उद्दीपक से जुड़ी हुई अथवा उसकी किसी सहचारी उद्दीपक वस्तु के प्रति किया जाता है। उदाहरणार्थं भोजन सामग्री को देखकर कुत्ते के मुँह से लार टपकने लगती है लेकिन कुछ समय बाद खाने के प्याले को देखकर ही लार टपकने लगती है। थॉर्नडाइक ने अनुकूलित-अनुक्रिया को सहचारी स्थान परिवर्तन का ही एक विशेष रूप माना है। Thorndikes Law of Learning Part-1 | थार्नडाइक का सिद्धांत – भाग 1

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Thorndike’s Law of Learning Part 1 | थॉर्नडाइक के सीखने के नियम भाग 1

 Thorndike’s Law of Learning – Part 1         थॉर्नडाइक के सीखने के नियम – भाग 1  थॉर्नडाइक ने अपने प्रयोगों के आधार पर कुछ सीखने के नियमों का प्रतिपादन किया है जिसे दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है – मुख्य नियम तथा गौण नियम। मुख्य नियमों के अन्तर्गत तीन नियम हैं तथा गौण नियमों के अन्तर्गत पाँच नियम हैं। इस प्रकार थॉर्नडाइक ने सीखने के आठ नियम बताए हैं।                           मुख्य नियम ( Major Law )  तत्परता का नियम ( Law of Readiness ) अभ्यास का नियम ( Law of Exercise ) प्रभाव का नियम    ( Law of Effect )  Project Method of Teaching  👈🏻👈🏻           👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻            तत्परता का नियम ( Law of Readiness )  तत्परता के नियम का तात्पर्य यह है कि जब प्राणी अपने को किसी कार्य को करने या सीखने के लिए तैयार समझता है, तो वह बहुत शीघ्र कार्य करता है या सीख लेता है और उसे अधिक मात्रा में सन्तोष भी मिलता है। सीखने को तैयार न होने पर उसे उस क्रिया में असन्तोष मिलता है। जब प्राणी किसी कार्य को करने के लिए तैयार रहता है तो उसमें उसे आनन्द आता है और वह उसे शीघ्र सीख लेता है तथा जिस कार्य के लिए वह तैयार नहीं होता और उस कार्य को करने के लिए बाध्य किया जाता है तो वह झुंझला जाता है और उसे शीघ्र सीख भी नहीं पाता। तत्परता में कार्य करने की इच्छा निहित है। इच्छा न होने पर प्राणी डर के मारे पढ़ने अवश्य बैठ जाएगा लेकिन वह कुछ सीख नहीं पाएगा। तत्परता ही बालक के ध्यान को केन्द्रित करने में सहायक होती है।                अभ्यास का नियम ( Law of Exercise )  यह नियम प्रयोग करने तथा प्रयोग न करने पर आधारित है। इस नियम के अनुसार किसी क्रिया को बार-बार करने या दोहराने से वह याद हो जाती है और छोड़ देने पर या न दोहराने से वह भूल जाती है।             उदाहरण के रूप में कविता और पहाड़े याद करने के लिए उन्हें बार-बार दोहराना पड़ता है तथा अभ्यास के साथ-साथ उपयोग में भी लाना पड़ता है। ऐसा न करने पर सीखा हुआ कार्य भूलने लगते है। याद की गई कविता को कभी न सुनाया जाए तो वह धीरे-धीरे भूलने लगती है। यही बात साइकिल चलाना, टाइप करना, संगीत आदि में भी लागू है। थॉर्नडाइक के अनुसार अभ्यास के नियम के अन्तर्गत दो उप-नियम आते हैं :-            उपयोग का नियम “जब एक परिवर्तनीय संयोग एक स्थिति और अनुक्रिया के बीच बनता है तो अन्य बातें समान होने पर वह संयोग दृढ़ हो जाता है।’ अनुपयोग का नियम “अनुपयोग के नियम के अनुसार कुछ समय तक किसी परिस्थिति और अनुक्रिया के बीच पुनरावृत्ति नही होने से संयोग क्षीण पड़ जाता है।” डगलस एवं हॉलैण्ड के अनुसार, “जो कार्य बहुत समय तक किया या दोहराया नहीं जाता है, वह भूल जाता है। इसी को अनुपयोग या अनभ्यास का नियम कहते हैं।” Continuous and Comprehensive Evaluation.  सतत् और व्यापक मूल्यांकन 👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻                     प्रभाव का नियम  ( Law of Effect )  थॉर्नडाइक का यह नियम सीखने और अध्यापन का आधारभूत नियम है। इस नियम को ‘सन्तोष-असन्तोष’ का नियम भी कहते है। इसके अनुसार जिस कार्य को करने से प्राणी को हितकर परिणाम प्राप्त होते है और जिसमें सुख और सन्तोष प्राप्त होता है, उसी को व्यक्ति दोहराता है। जिस कार्य को करने से कष्ट होता है और दुःखद फल प्राप्त होता है, उसे व्यक्ति नहीं दोहराता है। इस प्रकार व्यक्ति उसी कार्य को सीखता है जिससे उसे लाभ मिलता है तथा सन्तोष प्राप्त होता है। संक्षेप में, जिस कार्य के करने से पुरस्कार मिलता है उसे सीखते हैं और जिस कार्य के करने से दण्ड मिलता है उसे नहीं सीखा जाता। इसके विपरीत “दुःखद अथवा असन्तोषजनक परिणामों से उत्तेजना तथा अनुक्रिया का सम्बन्ध निर्बल हो जाता है।”   सीखने के गौण नियम (Subordinate Laws of Learning) Part 2 को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक को क्लिक करे । 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻 Thorndike Laws of Learning – part-2

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CDP EVS Important Question

 EVS & CDP Important Question 1. पर्यावरण का अध्ययन जीव विज्ञान की किस शाखा के अंतर्गत किया जाता है? – पारिस्थितिकी(Ecology) 2. पारिस्थितिकी संबंधित है? – जीव और पर्यावरण के संबंधों से Telegram https://t.me/ctetsuccess 3. सदरलाल बहुगुणा  से संबंधित प्रमुख तथ्य है? – प्रसिद्ध पर्यावरणविद, चिपको आंदोलन के प्रमुख नेता, टेहरी बांध का विरोध, वृक्षमित्र के रूप में विश्व प्रसिद्ध 4. ‘चिपको वूमेन’ के नाम से किसे जाना जाता है? – गौरा देवी Must follow our Facebook https://www.facebook.com/CtetSuccessOff/ 5. चिपको आंदोलन(Chipko Movement) कब  और कहा शुरू किया गया था? – 26 मार्च 1974 उत्तर प्रदेश, रैणी गांव,चमोली जिले(वर्तमान उत्तराखंड के भाग में) 6. चिपको आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था? – वनों में पेड़ों की कटाई को रोकना Continuous and Comprehensive Evaluation सतत् और व्यापक मूल्यांकन 7. चेचक(smallpox),रेबीज,पोलियो रोग किसके द्वारा फैलता है? – विषाणु(वायरस) 8. सामान्य सर्दी और विभिन्न प्रकार के बुखार(फ्लू) किसके द्वारा होता है? – विषाणु(वायरस) Join telegranTelegram https://t.me/ctetsuccess 9. पौधे नाइट्रोजन  का उपयोग किस रूप में करते हैं? – नाइट्रेट 10. परकाशसंश्लेषण(Photosynthesis) में प्रकाश अभिक्रिया होती है? – ग्रेनम में Exigency Hierarchy Theory | आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धान्त | 11. इबोला और चिकन पॉक्स किसके द्वारा होता है? – विषाणु 12. आयरन के मुख्य स्रोत है? – सेम, मटर, सोयाबीन, पालक 13. मानव शरीर में आयरन सहायक होता है? – हीमोग्लोबिन के निर्माण में, मांसपेशियों में ऑक्सीजन इकट्ठा करने में Follow Our Instagram 14. रडियोधर्मी प्रदूषण को किस और नाम से भी जाना जाता है? – नाभिकीय प्रदूषण(Nuclear pollution) 15. बालक की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है?        – परिवार 16. रडियोधर्मी पदार्थ से कौन सी विकिरण उत्सर्जित नहीं होती? –एक्स किरणे, रेडियो तरंगे  Follow Our Instagram 17. रडियो धर्मी(Radioactive) पदार्थों से उत्सर्जित होती है? – अल्फा, बीटा, गामा विकिरण 18. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम  (Environment Protection Act) किस वर्ष से लागू किया गया? – 1986 19. सामाजिक जीवन के आधार हैं? – सहिष्णुता,अनुशासन-सहयोग और पारस्परिक स्नेह की भावना https://t.me/ctetsuccess 20. “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है” यह कथन किसका है? यूनानी दार्शनिक- अरस्तु Follow Our Instagram  Must follow our Facebook https://www.facebook.com/CtetSuccessOff/ www.eductet.com

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