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Evaluation of Learning अधिगम का मूल्यांकन #ctet #eductet #ctetsuccess #cdp #pedagogy #Evaluation

अधिगम का मूल्यांकन ( Evaluation of Learning ) मूल्यांकन क्या है? What is Evaluation? मूल्यांकन शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों के लिए पुनर्बलन का कार्य करता है। मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा अधिगम परिस्थितियों तथा सीखने के अनुभवों के लिए प्रयुक्त की जाने वाली समस्त विधियों और प्रविधियों की उपादेयता की जाँच की जाती है। यह सफलता शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति प्रत्युत्तर का कार्य करती है। इस तरह मापन के आधार पर शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों में आवश्यक सुधार लाने के उद्देश्य से मूल्यांकन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। मूल्यांकन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसका शैक्षिक उद्देश्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध है।  Individual Difference | वैयक्तिक विभिन्नता अधिगम का मूल्यांकन क्या है? What is Learning बालक जो कुछ भी सीखता है या अधिगम करता है उसकी जाँच आवश्यक है जिससे बालक के क्षमता, योग्यता के साथ उन्नति का पता चलता है। बालक की शिक्षा में मूल्यांकन व मापन दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। अधिगम का आकलन:-  इस प्रकार के आकलन का उद्देश्य सीखने या अधिगम प्रगति और शैक्षिक उपलब्धि का आकलन होता है। यह आकलन शुरू से होता रहा है और अभिभावकों द्वारा स्वीकार भी किया गया है। यह संकलनात्मक आकलन होता है जो संपूर्ण शिक्षण सत्र के समाप्त होने के बाद होता है। इस आकलन के द्वारा शिक्षार्थी की अधिगम की क्षमता का आकलन होता है। यह सतत मूल्यांकन का भाग है जो शिक्षण वर्ष में दो बार होता है। इसमें शिक्षार्थियों को अंकों या ग्रेड द्वारा फीडबैक मिलता है। इसमें सुधार की संभावनाएं बहुत ही कम होती हैं। Join Telegram 👈👈👈 Join Facebook 👈👈👈 Youtube 👈👈👈 अधिगम के लिए आकलन :-  यह आकलन निदानात्मक होता है। जिन विद्यार्थियों में अधिगम की प्रगति आशानुरूप नहीं होती है ऐसे विद्यार्थियों में अधिगम संबंधी समस्याओं का विश्लेषण करने के लिए इस आकलन का प्रयोग किया जाता है और उसके बाद उन्हें समस्या के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जाती है। यह रचनात्मक भी होती है, क्योंकि इस आकलन से प्राप्त परिणामों के आधार पर विद्यार्थियों को फीडबैक दिया जाता है, जिससे विद्यार्थी एवं शिक्षक दोनों ही अपनी शिक्षण प्रक्रिया में सुधार कर सकें । एक शिक्षण वर्ष में चार होते हैं। अवलोकन, गृहकार्य, क्लास टेस्ट, दत्त कार्य, क्विज टेस्ट आदि से इस प्रकार का आकलन किया जाता है। इसके द्वारा विद्यार्थियों का तुलनात्मक आकलन नहीं होता बल्कि उनकी व्यक्तिगत कमियों और गुणों का आकलन होता है। यह शिक्षण सत्र के दौरान होता है। मूल्यांकन तथा मापन में अंतर :-  मूल्यांकन उद्देश्य आधारित होता है, जबकि मापन के लिए यह कहा जा सकता है कि उद्देश्य आधारित हो भी सकता है, नहीं भी।  मूल्यांकन के बाद एक भविष्यवाणी संभव है, परंतु मापन के बाद भविष्यवाणी करना संभव नहीं है। मूल्यांकन का क्षेत्र व्यापक होता है जबकि मापन किसी एक गुण या चर का होता है।  मूल्यांकन में स्थिति का निर्धारण किया जाता है, जैसे- श्रेष्ठ, प्रथम, द्वितीय वही मापन में उत्तर के आधार पर अंक प्रदान किया जाता है।  मूल्यांकन मापन के बाद होता है जबकि मापन मूल्यांकन से पहले होता है।  घटना या तथ्य का मूल्य निर्धारण होता है जबकि मापन में घटना या परिणाम के लिए प्रतीक निर्धारण होता है। मूल्यांकन के अंतर्गत बालक के व्यवहार के तीन प्रश्नों (संज्ञानात्मक , भावात्मक और  ज्ञानात्मक) को समाहित करने का प्रयत्न होता है। मूल्यांकन एक सतत व निर्णयात्मक प्रक्रिया है जो उद्देश्य केंद्रित होता है। अब्राहम मास्लो (Abraham Harold Maslow) अच्छे मूल्यांकन की विशेषताएँ  वैधता  विश्वसनीयता व्यावहारिकता तार्किकता उपयोगिता  सतत एवं व्यापक मूल्यांकन सतत एवं व्यापक मूल्यांकन दो शब्दों सतत तथा व्यापक से मिलकर बना है। शिक्षा के क्षेत्र में बदलती हुई परिस्थितियों ने विद्यार्थियों के समग्र मूल्यांकन हेतु अब वार्षिक परीक्षा व संपूर्ण पाठ्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् होने वाली परीक्षा की जगह विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास पर बल दिया जा रहा है। सतत व व्यापक मूल्यांकन इसी सोच का परिणाम है। विद्यालय आधारित मूल्यांकन School Based Evaluation  विद्यालय आधारित मूल्यांकन विद्यालय द्वारा विकसित परीक्षण या अनुसूची या फिर संबंधित बोर्ड द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार होता है। यह मूल्यांकन स्कूल या विद्यालय स्तर पर होता है। विद्यालय आधारित मूल्यांकन शिक्षकों को अपने छात्रों के बारे में जानने का अवसर देता है। बालक क्या सीखते हैं, कैसे सीखते हैं, उनके सोचने का तरीका क्या है, उनकी रुचियों, मनोवृत्ति आदि की पहचान भी करते हैं। विद्यालय आधारित मूल्यांकन बहुआयामी मूल्यांकन होता है। यह छात्रों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। इस तरह के मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य है- बच्चों पर पड़ने वाले दबाव को कम करना, मूल्यांकन व्यापक रूप में करना, बालकों में विभिन्न प्रकार के कौशलों का विकास करना, बालक की त्रुटियों को बताना तथा उसका निदान और उपयोग करना। विद्यालय आधारित मूल्यांकन बाल केंद्रित व विद्यालय केंद्रित दोनों है। यह बालकों की लगभग सभी कार्य योजना का मूल्यांकन करता है।  इसके आगे यहाँ  blue लिंक पर क्लिक कर के पढ़े 👇👇👇 Continuous and Comprehensive Evaluation | सतत् और व्यापक मूल्यांकन

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Individual Difference | वैयक्तिक विभिन्नता #ctet #eductet #ctetsuccess #cdp #pedagogy #kvs #uptet

  वैयक्तिक विभिन्नता की प्रकृति, अर्थ और परिभाषा (Individual Difference :- Nature,  Meaning and Defination)  वैयक्तिक विभिन्नता प्रकृति प्रदत्त है। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से किसी-न-किसी रूप में भिन्न है। कोई व्यक्ति लंबा है तो कोई छोटा, कोई गोरा तो कोई काला, किसी की बुद्धि तीव्र है तो किसी की मंद, रंग, रूप, ‘आकार, बुद्धि संस्कृति आदि के आधार पर निश्चित रूप से कहीं-न-कहीं दो व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न है। यहाँ तक कि एक माँ-बाप के बच्चे, जुड़वाँ बच्चों में भी वैयक्तिक विभिन्नता देखने को मिलती है। ऐसे में व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझना तथा उसके विकास पर बल देना आवश्यक हो जाता है। वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन सर्वप्रथम गाल्टन ने किया। आज बाल मनोविज्ञान बालक के व्यक्तित्व के विकास पर बल डालता है, क्योंकि यदि प्रत्येक बालक के व्यक्तित्व का विकास सही होगा तो निश्चित ही समाज भी अच्छा बनेगा व राष्ट्र भी सशक्त होगा। वैयक्तिक विभिन्नता का ही प्रभाव है कि एक बालक को सौ में सौ अंक मिलते हैं तथा किसी को सौ में शून्य अंक भी प्राप्त होता है। व्यक्ति के स्वभाव, बुद्धि, शारीरिक-मानसिक क्षमता, सांवेगिक विकास, मनोवृत्ति आदि में अंतर होता है, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में इस प्रकार के अंतर को ही वैयक्तिक विभिन्नता कहते हैं। वैयक्तिक विभिन्नता की परिभाषा को जानने से पूर्व ‘व्यक्तित्व’ को समझना आवश्यक है। व्यक्तित्व शब्द अंग्रेजी भाषा के Personality शब्द का पर्याय है। Personality शब्द लैटिन शब्द Persona से बना है जिसका अर्थ होता है-नकाब (Mask), अर्थात् चरित्र के अनुरूप जो धारण करता है। मनुष्य की कोई भी मानसिक, शारीरिक व सामाजिक क्रिया या उसके व्यवहार को उसके व्यक्तित्व से पृथक् नहीं किया जा सकता है, बल्कि व्यक्तित्व वह समग्रता (Totality) है, जिसमें व्यक्ति के संपूर्ण गुणों का परिलक्षण होता है। व्यक्तित्व की 50 से अधिक परिभाषाएं दी जा चुकी हैं, लेकिन उसमें आलपोर्ट की परिभाषा को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।  आलपोर्ट के अनुसार,  “व्यक्ति को व्यक्ति के भीतर पूर्ण मनोशारीरिक तंत्रों का गतिशील या गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण में उसके अपूर्व समायोजन को निर्धारित करता है। “ स्कीनर के अनुसार,  “वैयक्तिक विभिन्नताओं से तात्पर्य व्यक्तित्व के उन सभी पहलुओं से है जिनका मापन व मूल्यांकन किया जा सकता है। “ जेम्स ड्रेवर के अनुसार,  “कोई व्यक्ति अपने समूह के शारीरिक व मानसिक गुणों के औसत से जितनी भिन्नता रखता है उसे वैयक्तिक भिन्नता कहते हैं। “ टॉयलर के अनुसार,    “शरीर के रूप-रंग, आकार, कार्य, गति, बुद्धि, ज्ञान, उपलब्धि, रुचि, अभिरुचि आदि लक्षणों में पाई जाने वाली भिन्नता को वैयक्तिक भिन्नता कहते हैं। “ प्रत्येक शिक्षार्थी स्वयं में विशिष्ट है। इसका अर्थ है कि कोई भी दो शिक्षार्थी अपनीयोग्यताओं, रुचियों और प्रतिभाओं में एकसमान नहीं होते। LIKE OUR FACEBOOK वैयक्तिक विभिन्नताओं के प्रकार(Types of Individual Differences) 1. भाषा के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नताएँ    (Individual Differences Based on            Language)  व्यक्ति में कई तरह के कौशल पाए जाते हैं उनमें एक है- -भाषा कौशल। एक ही उम्र के बालकों में भाषा समान रूप से विकसित नहीं होती है, कुछ में यह जल्दी विकसित नहीं होती है, कुछ में यह जल्दी विकसित होती है तो कुछ में देर से होती है। जिन बालकों में भाषा कौशल का विकास जल्द होना है वो अपने विचारों को भी अभिव्यक्त करने में कुशल होते हैं। भाषा का विकास बालकों में सही तरीके से तथा त्रुटि रहित करना चाहिए, क्योंकि ये हमेशा व्यक्तित्व में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  2. लिंग के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Difference Based on Gender)  पुरुष का शारीरिक गठन स्त्रियों के अपेक्षाकृत अलग होता है। सामान्यतः एक ही वातावरण के अंतर्गत रहने वाले पुरुषों की लंबाई स्त्रियों से अधिक होती है। शारीरिक भिन्नता दिखती है, परंतु मानसिक स्तर पर लड़कियाँ, लड़कों से कहीं भी पीछे नहीं है। यह भी अध्ययन में पाया गया है कि एक ही परिवेश में रहने वाले लड़के-लड़कियों में सहनशीलता ज्यादा पायी गयी है अपेक्षाकृत लड़कों के।  3. परिवार एवं समुदाय के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता(Individual Difference Based on Family and Community)  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ऐसे में निश्चित ही उसके व्यक्तित्व पर उसके परिवार व समाज का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। मानव के व्यक्तित्व के विकास पर उसके परिवार एवं समुदाय का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इसलिए समुदाय के प्रभाव को वैयक्तिक विभिन्नता में भी देखा जा सकता है। अच्छे परिवार एवं समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले बच्चों का व्यवहार सामान्यतः अच्छा होता है। यदि किसी समुदाय में किसी प्रकार के अपराध करने की प्रवृत्ति हो, तो इसका कुप्रभाव उस समुदाय के बच्चों पर भी पड़ता है। बालकों में नैतिकता, सोच, समायोजन आदि का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। परिवार की या समाज की आर्थिक स्तर का भी प्रभाव बालकों पर पड़ता है। 4. बुद्धि के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Difference Based on Intellegence) परीक्षणों के आधार पर ज्ञात हुआ है कि सभी व्यक्तियों की बुद्धि एकसमान नहीं होती।बालकों में भी बुद्धि के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता दिखाई पड़ती है। कुछ बालक अपनी आयु की अपेक्षा अधिक बुद्धि को प्रदर्शित करते हैं, इसके विपरीत कुछ बच्चों में सामान्य बुद्धि पाई जाती है। बुद्धि-परीक्षण के आधार पर यह ज्ञात किया जा सकता है कि कोई बालक किसी अन्य बालक से कितना अधिक बुद्धिमान है?  5. धर्म के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Difference Based on religion)  धर्म को सरल शब्दों में जाने तो क्रियाकलाप या आचरण जो हम नित्य-प्रतिदिन करते हैं अर्थात् धर्म हमारे नियमों, नैतिक मूल्यों और आचरण को निर्धारित तथा नियंत्रित भी करता है। प्रत्येक धर्म सहिष्णुता, प्रेम, भाईचारा आदि सिखलाता है परंतु उनके मानने वालों के व्यवहार में अंतर आता है इसकी मुख्य वजह है धर्म की उदारता, कट्टरता आदि। जिस धर्म में उदारता का भाव ज्यादा होगा निश्चित रूप से मानने वाले की प्रवृत्ति में भी उदारता अधिक देखने को मिलती है।  6. व्यक्तित्व के आधार पर वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Difference Based on Personality)  प्रत्येक बालक या व्यक्ति का व्यक्तित्व अलग-अलग होता है। कोई अंतर्मुखी तो कोई बर्हिमुखी होता है। कुछ लोगों का व्यक्तित्व दूसरे को बहुत प्रभावित करता है तथा कुछ लोग दूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं। टॉयलर के अनुसार, “सम्भवतः व्यक्ति, योग्यता की विभिन्नताओं के बजाय व्यक्तित्व की विभिन्नताओं से अधिक प्रभावित होता है।” इन सबके अलावा शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक आदि के आधार

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Exigency Hierarchy Theory | आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धान्त |

  आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धान्त | Exigency Hierarchy Theory •  अब्राहम मास्लो एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे। मास्लों के अनुसार, आवश्यकताओं के कई स्तर होते हैं जिन्हें व्यक्तिगत पूर्णता के उच्चतम स्तर तक पहुँचने के लिए एक व्यक्ति को पूरा करने का प्रत्यन्त करना पड़ता है। इस प्रकार एक व्यक्ति को सबसे निचले स्तर पर अपनी प्राथमिक (शारीरिक) आवश्यकताओं को पूरा करने योग्य होना चाहिए। जब एक बार ये आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं तब सुरक्षा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। तत्पश्चात् किसी से जुड़े होने की आवश्यकता और स्नेह करने और स्नेह करवाने की आवश्यकता आती है। • किसी समूह से जुड़े होने की इच्छा जैसे परिवार, मित्र और धार्मिक संगठन, हमें स्नेह किए जाने का और दूसरों द्वारा स्वीकार किए जाने का अनुभव कराते हैं। जब हम ऊपर दी गई आवश्यकताओं को सफलता से सन्तुष्ट होते हैं तब हम आत्म-सम्मान, आत्मविश्वास और आत्म-मूल्य जैसी आवश्यकताओं को पूरा करना चाहते हैं। अगली आवश्यकता ज्ञान और अनुभव सम्बन्धी आवश्यकताएँ हैं, जो अपने ज्ञान और समझ को समाहित करती हैं; तत्पश्चात् आज्ञा और सुन्दरता की आवश्यकता आती है। अन्ततः एक व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच जाता है जिसे हम आत्मसिद्धि कहते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति में आत्मज्ञान की विशेषताएँ होती हैं, ऐसा व्यक्ति समाज के प्रति जिम्मेदार होता है और जीवन की सभी चुनौतियों के लिए तैयार होता है। • आवश्यकताओं की उपरोक्त सूची को पदानुक्रम या श्रृंखलाओं की पंक्ति कहते हैं।  अभिप्रेरणा एवं अधिगम | CTET और अन्य शिक्षक पात्रता परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण ☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻   मास्लो द्वारा प्रतिपादित आवश्यकताओं का पदानुक्रम :-  • जैसे-जैसे जीवन बीतता है व्यक्ति समझदारी और ज्ञान प्राप्त करता जाता है और वह सीखता है कि कैसे परिस्थितियों का सामना करें। इस प्रकार वह पदानुक्रम या सीढ़ी पर ऊपर की ओर चढ़ता जाता है। व्यक्ति किस परिस्थिति का सामना कर रहा है? यह प्रश्न इस बात का निर्धारण करता है कि व्यक्ति पदानुक्रम पर ऊपर चढ़ता है या नीचे आता है। • यह पदानुक्रम बहुत-सी संस्कृतियों के लिए सत्य नहीं है। यह पाया गया है कि कुछ देशों जैसे- स्वीडन और नार्वे में उच्च जीवन शैली बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं और आत्मसिद्धि से ज्यादा सामाजिक आवश्यकताएँ महत्त्वपूर्ण हैं।  • कुछ संस्कृतियों में आत्मसिद्धि की आवश्यकता से सुरक्षा की आवश्यकता ज्यादा प्रबल है इसी तरह काम की सन्तुष्टि से ज्यादा नौकरी की सुरक्षा का महत्त्व है।  CTET पास करने के लिए लिंक पर click करे

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अभिप्रेरणा एवं अधिगम | Motivation and Learning #ctet #ctetsuccess #cdp #pedagogy #eductet #Motivation

  अभिप्रेरणा एवं अधिगम | Motivation and Learning  अभिप्रेरणा को लोग साधारण शब्दों में प्रेरणा के नाम से भी जानते हैं। अभिप्रेरणा का सामान्य अर्थ है- किसी कार्यों को करने के लिए प्रोत्साहित करना ।अंग्रेजी में मोटिवेशन (Motivation) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा की मोटम (Motum) धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- मूव, मोटर और मोशन अभिप्रेरणा का महत्त्व बाल मनोविज्ञान में ‘बालक के व्यवहार के कारणों को समझने में है।  अभिप्रेरणा एक ऐसा आंतरिक बल उत्पन्न करती है जो व्यवहार को लक्ष्य निर्देशित बनाता है। व्यक्ति या बालक के व्यवहार में ‘क्यों’ पक्ष का जवाब अभिप्रेरणा या ‘प्रेरणा’ से मिलता है;  जैसे- यदि कोई बालक गणित की कक्षा शुरू होते ही प्रतिदिन उठकर कक्षा से बाहर चला जाता है तो निश्चित रूपेण उसके इस व्यवहार के पीछे कोई-न-कोई कारण अवश्य होगा;….  जैसे-गणित शिक्षक की शिक्षण विधि उसे समझ में न आती हो या फिर उसकी रुचि विषय में न हो या कोई अन्य कारण हो सकता है। अभिप्रेरणा को उत्पन्न करने वाले कारकों को अभिप्रेरक कहते हैं। अभिप्रेरक व्यक्ति की वे आन्तरिक एवं बाह्य दशाएँ हैं, जो उसे कार्य विशेष के सम्पादन के लिए अभिप्रेरित करती हैं एवं उद्देश्य की प्राप्ति तक क्रियाशील रखती हैं। इस तरह अभिप्रेरक दो प्रकार के होते हैं :-  बाह्य अभिप्रेरक एवं आन्तरिक अभिप्रेरक।  👉🟠 जेम्स ड्रेवर के अनुसार ‘अभिप्रेरणा एक भावात्मक क्रियात्मक कारक है जो कि चेतन अथवा अचेतन लक्ष्य की ओर होने वाली व्यक्ति के व्यवहार की दिशा को निश्चित करने का कार्य करता है। “ 👉🟠 मैकड्रगल  ‘अभिप्रेरक प्राणी में निहित वे शारीरिक व मनोवैज्ञानिक दशायें हैं जो उसे किसी विशेष ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। ”  प्रेरणा एवं अधिगम का मास्लो सिद्धांत ☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻☝🏻 अभिप्रेरणा को प्रभावित करने वाले कारक 1. पुरस्कार व दंड 2. सफलता व असफलता 3. प्रतियोगिता व सहयोग 4. रुचि 5. नवीनता 6. आवश्यकता 7. कक्षा का वातावरण छात्र के लिए 8. आकांक्षा का स्तर अधिगम में अभिप्रेरणा का महत्त्व अभिप्रेरणा या प्रेरणा शिक्षक व छात्र दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। छात्र के लिए :-  अभिप्रेरणा छात्र में जिज्ञासा उत्पन्न करती है तथा उसकी उत्सुकता को बढ़ाती है। अभिप्रेरणा छात्र को न सिर्फ क्रिया करने के लिए आंतरिक बल प्रदान करती है, बल्कि उसे निरंतर क्रियाशील बनाए रखती है। अभिप्रेरणा छात्र की सीखने की अरुचि को रुचि में परिवर्तित कर सकती है। अभिप्रेरणा छात्रों में नैतिक, चारित्रिक, सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देती है तथा राष्ट्र व समाज सेवा की भावना को विकसित करती है। अभिप्रेरणा छात्र को लक्ष्य या उद्देश्यों को प्राप्त कराने में सहायक होती है।  छात्र में अभिप्रेरणा को बढ़ाने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए :-  पढ़ाए जाने वाले विषय उपयोगी हों।  कक्षा का वातावरण सही हो अर्थात् हवा, रोशनी, तथा शांत वातावरण हो । पर्याप्त विद्यार्थियों की आवश्यकता व योग्यता ।  उपयुक्त शिक्षण विधि।   उपयुक्त शिक्षण विधि।  छात्र को दिया जाने वाला पुनर्बलन, जैसे पुरस्कार, दंड, प्रशंसा, निंदा आदि।  छात्र के सफलता या उपलब्धि के परिणाम का उसे जल्द ज्ञान कराना चाहिए।  छात्रों के बीच में प्रतियोगिता, वाद-विवाद, क्विज आदि कराने चाहिए ।  शिक्षक के लिए अभिप्रेरणा का महत्त्व :-  यदि कोई शिक्षक चाहे तो कठिन-से-कठिन विषय को छात्रों को सरलतापूर्वक अधिगम करा सकता है ऐसा वह तब कर पाएगा जब वह खुद अधिगम कराने के लिए प्रेरित हो । शिक्षक को एक अच्छा प्रेरक होना चाहिए तभी वह अपने छात्रों में जिज्ञासा उत्पन्न कर उन्हें क्रियाशील बना सकता है। शिक्षण विधि को सरल रखना चाहिए तथा विषय वस्तु को व्यावहारिकता से जोड़ने के लिए प्रेरित रहना चाहिए। नवीनता व नए खोजों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। ऐसा तभी कर पाएँगे जब उनके अंदर एक अच्छे शिक्षक के रूप में खुद को साबि करने की प्रेरणा होगी। शिक्षक को पुरस्कार व धनात्मक पुनर्बलन देने के लिए प्रेरित रहना चाहिए न कि दंड जैसे हथकंडों का प्रयोग करने के लिए। शिक्षकों को छात्रों में सुरक्षा का भाव उत्पन्न करना चाहिए ताकि वे शिक्षक के साथ अपना सामंजस्य बैठा पाए और अपनी समस्याओं को शिक्षक के सामने रख सके।  शिक्षक को लोकतांत्रिक मूल्यों से प्रेरित होना चाहिए। शिक्षक, छात्रों के आदर्श बनें।

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बिहार के सवा लाख शिक्षकों को 15 अगस्त तक मिल सकता है नियुक्ति पत्र, तीन दिनों में दिव्यांगों के लिए आएगा आवेदन का विज्ञापन

  बिहार के सवा लाख शिक्षकों को 15 अगस्त तक मिल सकता है उच्च न्यायालय के फैसले का शिक्षा मंत्री ने स्वागत किया। सरकार ने पिछले बजट सत्र में घोषणा की थी कि शिक्षक नियुक्ति मामले में सरकार विशेष प्रयास कर न्यायालय से नियुक्ति की इजाजत मांगेगी। कोरोनाकाल और कोर्टबंदी में भी वर्चुअल माध्यम से महाधिवक्ता द्वारा लगातार मुख्य न्यायाधीश को कोर्ट में विशेष उल्लेख किया जाता रहा और आज इस मामले में हमें राहत मिली। राज्य में शिक्षक के लाखों पद रिक्त थे। शिक्षक योग्यता परीक्षा पास अभ्यर्थी सड़क पर घूम रहे थे। सरकार इसे बहुत ही कष्टदायक स्थिति मानती है। इसलिए हम न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हैं।  बिहार के शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा, ‘वैसे तो सरकार एक सप्ताह में नियुक्ति पूरी कर लेने की तैयारी में थी, लेकिन कोर्ट के आदेश से अब हम जल्द दिव्यांगों को अवसर देने के लिए विज्ञापन निकालेंगे। दिव्यांगों को आवेदन के लिए 15 दिन का समय देना है। आवेदन के बाद नया मेरिट लिस्ट बनेगा। नियोजन की पूरी कार्रवाई पूरी होने में दो से तीन महीने लग जायेंगे।’  बदल जाएगी कई बार के प्रयास से तैयार मेधा सूची   छठे चरण के तहत राज्य के प्रारंभिक विद्यालयों में करीब 94 हजार और माध्यमिक-उच्च माध्यमिक स्कूलों में 30020 पदों पर बहाली की प्रक्रिया लम्बे समय से चल रही है। दोनों नियुक्तियों की अधिसूचनाएं 1 व 5 जुलाई 2019 को जारी हुई है। इस दौरान आधा दर्जन बार नियुक्ति के शिड्यूल जारी हुए, लेकिन विभिन्न कारणों से इसे अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका। दिव्यांगों की अपील पर हाईकोर्ट के आदेश पर अगस्त 2020 में नियोजन प्रक्रिया स्थगित की गई। इससे पूर्व बहाली के लिए सभी नियोजन इकाइयों द्वारा मेधा सूची बनायी जा चुकी थी। अब दिव्यांगों के नए आवेदन आने के बाद मेधा सूची पूरी तरह बदलनी पड़ेगी। शिक्षा विभाग प्राथमिक, मध्य, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर पर सभी जिलों में दिव्यांगों के लिए आवंटित पद, उनके विरुद्ध कार्यरत दिव्यांग और उनके हिस्से के रिक्त पदों का ब्योरा जुटा चुका है।  यह बिहार के दिव्यांगों की जीत : संघ नेशनल ब्लांइड एसोसिएशन ने पटना उच्च न्यायालय के फैसले को बिहार के दिव्यांगों और खासतौर से नेत्रहीनों की जीत बताया है। राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ की बिहार शाखा के महासचिव डॉ. विनय कुमार ने हाईकोर्ट व राज्य सरकार का आभार जताया है। कहा कि संघ द्वारा दायर दो याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश ने ऐतिहासिक फैसला दिया। एक याचिका शिक्षक नियोजन से संबंधित थी। जिस पर कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि दिव्यांगों का फॉर्म फिर से भरवाया जाए। आरक्षण का पालन सही तरीके से करते हुए सामान्य अभ्यर्थियों के साथ उनकी नियुक्ति की जाए। दूसरी याचिका बैकलॉग से संबंधित थी जिसमें कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि 1995 से 2017 तक जितनी नियुक्तियां हुईं उनकी गणना कर दिव्यांगों के लिए कितनी सीट बनती है, इसकी सूची राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ को 4 माह में उपलब्ध करायी जाय। नियुक्ति प्रक्रिया में कितना समय लग सकता है  पटना उच्च न्यायालय द्वारा गुरुवार को राज्य के प्राथमिक से लेकर उच्च माध्यमिक तक के विद्यालयों में छठे चरण के नियोजन में आवेदन नहीं करने वाले दिव्यांगों को मौका देने के निर्देश पर शिक्षा विभाग ने तत्काल आगे की तैयारी आरंभ कर दी है। नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने में दो से तीन महीने लगेंगे। शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी ने तीन दिनों के भीतर आवेदन के लिए विज्ञापन जारी करने के संकेत दिये। आवेदन जमा करने के लिए दिव्यांगों को 15 दिन का समय दिया जाएगा। आवेदन से लेकर नियुक्ति पत्र बांटे जाने तक में कुल 60 से 70 दिन लगेंगे। नये आवेदनों के शामिल होने से मेधा सूची भी नए सिरे से बनेगी। फिर उसपर आपत्तियां ली जाएंगी। इसके बाद अंतिम मेधा सूची बनेगी। उसके बाद काउंसिलिंग, फिर नियुक्ति पत्र बंटेगा। उम्मीद है, 15 अगस्त से पहले सवा लाख शिक्षकों को नियुक्ति पत्र बंट जाए। 

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Cognition & Emotion संज्ञान और संवेग #ctet #ctetsuccess #eductet #cdp #pedagogy

 संज्ञान Cognition संज्ञान का अर्थ समझ या ज्ञान होता है। शैक्षणिक प्रक्रियाओं में अधिगम का मुख्य केन्द्र संज्ञानात्मक क्षेत्र होता है। इस क्षेत्र में अधिगम उन मानसिक क्रियाओं से जुड़ी होती है जिनमें पर्यावरण से सूचना प्राप्त की जाती है। इस प्रकार इस क्षेत्र में अनेक क्रियाएँ होती हैं जो सूचना प्राप्ति से प्रारम्भ होकर शिक्षार्थी के मस्तिष्क तक चलती रहती हैं। ये सूचनाएँ सुनने या देखने के रूप में होती हैं। संज्ञान में मुख्यतः ज्ञान, समग्रता, अनुप्रयोग विश्लेषण तथा मूल्यांकन पक्ष सम्मिलित होते हैं।  बालक एक समस्या – समाधान और वैज्ञानिक अन्वेषण  बालों में संज्ञानात्मक विकास Cognitive Development in Children  संज्ञानात्मक विकास का तात्पर्य बच्चों के सीखने और सूचनाएँ एकत्रित करने के तरीके से है। इसमें अवधान में वृद्धि प्रत्यक्षीकरण, भाषा, चिन्तन, स्मरण शक्ति और तर्क शामिल हैं। पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत के अनुसार हमारे विचार और तर्क अनुकूलन के भाग हैं। संज्ञानात्मक विकास एक निश्चित अवस्थाओं के क्रम में होता है। पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाओं का वर्णन किया है संवेदी-गतिक अवस्था (जन्म से 2 वर्ष) पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2 से 7 वर्ष)  प्रत्यक्ष संक्रियात्मक अवस्था (7 से 11 वर्ष) औपचारिक-संक्रियात्मक अवस्था (11 + वर्ष) प्रारम्भिक बाल्यकाल (2 से 6 वर्ष) में संज्ञानात्मक विकास Cognitive Development in Infancy (2 to 6 Years)  इस काल में बच्चे, शब्द जैसे प्रतीकों, विभिन्न वस्तुओं, परिस्थितियों और घटनाओं को दर्शाने वाली प्रतिमाओं के प्रयोग में अधिक प्रवीण हो जाते हैं। स्कूल जाने तक बच्चों की शब्दावली पर्याप्त अच्छी हो जाती है। वास्तव में बच्चे विभिन्न सन्दर्भों में अन्य भाषाएँ सीखने में अधिक ग्रहणशील हो जाते हैं। अनेक बार वे द्विभाषी या बहुभाषी के रूप में विकसित होते हैं। वे एक भाषी बच्चों की अपेक्षा भाषा की अच्छी समझ वाले होते हैं।  प्रारम्भिक बाल्यकाल में स्थायी अवधान में वृद्धि हो जाती है। एक 3 वर्ष का बच्चा चित्रांकनी से रंग भरने, खिलौने से खेलने या 15-20 मिनट तक टेलीविजन देखने की जिद कर सकता है। इसके विपरीत एक 6 वर्ष का बच्चा किसी रोचक कार्य पर एक घण्टे से अधिक कार्य करता देखा जा सकता है।  बच्चे अपने संविधान में अधिक चयनात्मक हो जाते हैं। परिणामस्वरूप उनके प्रत्यक्षात्मक कौशल भी उन्नत होते हैं। चिन्तन और अधिक तर्कपूर्ण हो जाता है और याद रखने की क्षमता और जानकारी की प्रक्रिया भी उन्नत होती है। वातावरण से अन्तःक्रिया द्वारा बच्चा सामाजिक व्यवहार के सही नियम सीखता है जो उसे विद्यालय जाने के लिए तैयार करते हैं। प्रारम्भिक बाल्यकाल, 2 से 6 वर्ष में बच्चा पूर्व क्रियात्मक अवस्था द्वारा प्रगति करता है।  पूर्व-क्रियात्मक अवस्था की 2 उप-अवस्थाएँ होती हैं :-  प्रतीकात्मक क्रिया (2 से 4 वर्ष) अन्तःप्रज्ञा विचार (4 से 7 वर्ष) प्रतीकात्मक क्रिया, उप-अवस्था में, बच्चे वस्तुओं का मानसिक प्रतिबिम्ब बना लेते हैं और उसे बाद में उपयोग करने के लिए सम्भाल कर रख लेते हैं। उदाहरण के लिए, बच्चा एक छोटे कुत्ते की आकृति बनाए या उससे खेलने का नाटक करे, जोकि वहाँ उपस्थित ही नहीं है। बालक उन लोगों के विषय में बात कर सकते हैं जो यात्रा कर रहे हैं या जो कहीं अन्य स्थान पर रहते हों। वे उन स्थानों का भी रेखाचित्र बना सकते हैं, जो उन्होंने देखे हैं, साथ ही साथ अपनी कल्पना से नये दृश्य और जीव भी बना सकते हैं। बच्चे अपनी वस्तुओं के मानसिक प्रतिबिम्ब का भी खेल में भूमिका निभाने के लिए उपयोग कर सकते हैं। बालक कैसे चिंतन करते हैं   बालक कैसे सोचते है और सीखते है ? लिंक पर क्लीक कर CTET  के इस महत्वपूर्ण टॉपिक को समझे और किसी  शिक्षण परीक्षा में प्रश्नो के आसानी से जवाब दे।    मध्य बाल्यकाल में संज्ञानात्मक विकास Cognitive Development in Childhood  मध्य बाल्यकाल में बच्चे उत्सुकता से भरे होते हैं और बाहरी वस्तुओं को ढूँढने में उनकी रुचि होती है। स्मरण और सम्प्रत्यय ज्ञान में हुई वृद्धि तर्कपूर्ण चिन्तन को तात्कालिक स्थिति के अतिरिक्त सहज बनाती है। बच्चे इस अवस्था में संवेदी क्रियाओं में भी व्यस्त हो जाते हैं जैसे- संगीत, कला और नृत्य एवं रुचियों की अभिवृत्ति को रुचियों का भी विकास इस अवस्था में हो जाता है। पियाजे के सिद्धांत में, मध्य बाल्यकाल में इन्द्रयगोचर सक्रियात्मक अवस्था की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-  तार्किक नियमों को समझना। स्थानिक तर्क में सधार। तार्किक चिंतन, यथार्थ और इन्द्रियगोचर स्थितियों तक सीमित।  मध्य बाल्यकाल में भाषा विकास कई तरीकों से प्रगति करता है। नये शब्द सीखने से अधिक, बच्चे जिन शब्दों को जानते हैं, उनकी अधिक प्रौढ़ परिभाषा सीख लेते हैं। वे शब्दों के मध्य सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं। समानार्थी और विपरीतार्थी शब्दों को और उपसर्ग एवं प्रत्यय जोड़ने पर शब्दों के अर्थ कैसे बदल जाते हैं, को भी समझ लेते हैं। संवेग Emotion संवेग’ अंग्रेजी भाषा के शब्द इमोशन का हिन्दी रूपान्तरण है। इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘इमोवेयर’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है ‘उत्तेजित होना। इस प्रकार संवेग’ को व्यक्ति की ‘उत्तेजित दशा’ कहते हैं। इस प्रकार संवेग शरीर को उत्तेजित करने वाली एक प्रक्रिया है। मनुष्य अपनी रोजाना की जिन्दगी में सुख, दुःख, भय, क्रोध, प्रेम, ईर्ष्या, घृणा आदि का अनुभव करता है। वह ऐसा व्यवहार किसी उत्तेजनावश करता है। यह अवस्था संवेग कहलाती है। वुडवर्थ के अनुसार “संवेग, व्यक्ति की उत्तेजित दशा है।”  ड्रेवर के अनुसार “संवेग, प्राणी की एक जटिल दशा है, जिसमें शारीरिक परिवर्तन प्रबल भावना के कारण उत्तेजित दशा और एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करने की प्रवृत्ति निहित रहती है”। जे.एस.रॉस के अनुसार “संवेग, चेतना की वह अवस्था है, जिसमें रागात्मक तत्व की प्रधानता रहती है।” जरशील्ड के अनुसार “किसी भी प्रकार के आवेश आने, भड़क उठने तथा उत्तेजित हो जाने की अवस्था को संवेग कहते हैं।” सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे समाज के निर्माण लैंगिक मुद्दे और परेशानियों को समझने क लिए लिंक  माध्यम से अध्ययन कीजिये। इस टॉपिक से प्रायः 3 से 6  प्रश्न पूछे जाते है।  संवेग के प्रकार Types of Emotion संवेगों का सम्बन्ध मूल प्रवृत्तियों से होता है। चौदह मूल प्रवृत्तियों के चौदह ही संवेग के हैं, जो इस प्रकार है :-  भय वात्सल्य घृणा कामुकता करुणा व दुःख आत्महीनता आत्माभिमान अधिकार भावना भूख आमोद कृतिभाव आश्चर्य एकाकीपन  संवेगों की प्रकृति Nature of Emotions हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने अच्छे और बुरे अनुभवों के प्रति दृढ़ भावनाओं

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बालक एक समस्या – समाधान और वैज्ञानिक अन्वेषण | Child As a Problem Solver and Scientific Investigator #ctet #ctetsuccess #eductet #uptet #cdp #pedagogy

बालक एक समस्या – समाधान और वैज्ञानिक अन्वेषण  समस्या समाधान का अर्थ साधारण शब्दों में कहें तो किसी भी समस्या का समाधान चाहे समस्या छोटी हो या बड़ी जब भी सामने आती है तब उसके समाधान हेतु कुछ निश्चित सोपानों या कदमों का अनुसरण किया जाता है। बालक जब एक बार किसी समस्या का समाधान कर लेता है तब वह भविष्य में उन्हीं सोपानों का प्रयोग करता है जिससे उसने समस्या का समाधान निकाला था। समस्या समाधान के लिए चिंतन करना जरूरी है।  बालक का मानसिक विकास मानसिक विकास से तात्पर्य मानसिक क्षमताओं के विकास से है। मानसिक क्षमता के अंतर्गत चिंतन करने की क्षमता, तर्क करने की क्षमता, याद रखने की क्षमता, सही अर्थ देने की क्षमता आदि सम्मिलित है। जब बालक इन मानसिक क्षमताओं के आधार पर मानसिक कार्य संपन्न करने लगता है तब यह माना जाता है कि बालक का मानसिक विकास सही दिशा में हो रहा है। मानसिक विकास की प्रक्रिया जन्म से पूर्ण परिपक्वता आने तक चलती है।  बालक एक समस्या-समाधान के रूप में बालक बचपन से लेकर बड़े होने तक अनेक ऐसी समस्याओं का सामना करता है जिनका उसे स्वयं समाधान ढूंढना पड़ता है। बालक अपनी समस्या का हल ढूंढने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।  बच्चों को इस स्तर के योग्य बनाने के लिए आवश्यक है कि उसका व्यक्तिगत विकास किया जाए जिससे कि वह सभी प्रकार की परिस्थितियों का सही ढंग से सामना कर सके।  Gender Issues in Social Construction | सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे बालक का एक अच्छा समस्या समाधान कैसे बनाया जाए बालक के सामने छोटी-छोटी समस्या रखनी चाहिए ताकि आत्मविश्वास बढ़े। बालकों को छोटी-छोटी समस्या के समाधान करने पर पुरस्कृत करते रहना चाहिए।  बालकों में चिंतन व तर्क का विकास प्रायोगिक रूप से करना चाहिए।  बालकों में भाषा, कौशल आदि का विकास किया जाना चाहिए। बालकों को बार-बार अभ्यास कराकर अपनी कमियों को दूर करना सीखना चाहिए। बालक में प्रत्यय निर्माण पर बल देना चाहिए। बालकों को स्वावलंबी बनने के लिए प्रोत्साहित तथा आत्मविश्वास का गुण जाग्रत करना चाहिए। बच्चे में आत्म पहचान का गुण विकसित करके अपनी कमियों को स्वीकार करना तथा दूर करना सिखाकर बच्चे को स्वावलम्बी बनाने के लिए प्रोत्साहित करके बच्चे में भाषा का विकास करके बच्चे को बार-बार प्रयास करके  समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि जब भी कोई समस्या सामने आती है तब उस वक्त सिर्फ वही एक समस्या हमारे पास नहीं होती है बल्कि कई और समस्याएं भी होती हैं। लेकिन आवश्यकतानुरूप प्राथमिकता के अनुसार समस्या समाधान करने हेतु समस्या का चयन किया जाता है। तत्पश्चात् उस समस्या से संबंधित जानकारी एकत्रित की जाती है। जानकारी, के अनुसार संभावित समाधान पर विचार किया जाता है। चिंतन-मनन के द्वारा जो समाधान सामने आता है, उसका मूल्यांकन व परीक्षण किया जाता है फिर जो निष्कर्ष आते हैं उन पर निर्णय लिया जाता है। एक जैसी समस्या के समाधान में अक्सर पूर्व से मिलते-जुलते समाधान का प्रयोग किया जाता है।  बालक चिंतन कैसे करते है? किसी भी शिक्षण पात्रता परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण TOPIC समस्या समाधान की क्षमता बालक के तार्किक योग्यता पर निर्भर करती है, क्योंकि समस्या आने पर उसके समाधान के लिए क्रमबद्धता के साथ प्रयास करना तार्किक क्षमता को स्पष्ट करता है वहीं समस्या आने पर कई बालक समाधान का प्रयास न कर चिंता में बेवजह डूब जाते हैं, परेशान होते हैं तथा गलत कदम उठा लेते हैं। बालक के माता-पिता व शिक्षक को चाहिए कि बालकों को मानसिक रूप से मजबूत और उनमें तार्किक क्षमता का भी विकास करें जिससे वो समस्या समाधान कर सकें। समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि निम्नलिखित है :- समस्या का चयन समस्या से संबंधित जानकारी  संभावित समाधानों का निर्माण 4. संभावित समाधानों का मूल्यांकन संभावित समाधानों का परीक्षण निष्कर्षों का निर्णय समाधान का उपयोग/प्रयोग CTET Concept of Development and Growth | विकास की अवधारणा और वृद्धि  बालक, एक वैज्ञानिक अन्वेषक के रूप में निरीक्षण:-  बालक सबसे पहले विषय-वस्तु की परिस्थितियों का निरीक्षण करता है।  तुलना:-  विषय-वस्तु और परिस्थितियों में तुलना करता है। प्रयोगः- तुलना के आधार पर विचारों का प्रयोग करता है।  प्रदर्शन:-  फिर उस प्राप्त प्रयोग का प्रदर्शन या निरीक्षण करते हैं। सामान्यीकरण:-  परिणाम आने पर सिद्धांत निर्मित होते हैं, जो सामान्यीकरण को बताते हैं। प्रमाणीकरण:-  पुनः प्रयोग करके समस्या का सामान्यीकरण करना।

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बालक कैसे चिंतन करते हैं | How Do Children Think #ctet #ctetsuccess #eductet #cdp #pedagogy #uptet #supertet

                    बालक कैसे चिंतन करते हैं? How Do Children Think? चिंतन एक मानसिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में प्रतिमाओं, प्रतीकों, संप्रत्यय नियमों एवं अन्य इकाइयों का मानसिक जोड़-तोड़ होता है। इस प्रक्रिया में प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, अधिगम, ध्यान (अवधान) आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। बालक के सामने जब कोई समस्या आती है तब वह उसका समाधान ढूँढ़ता है और समाधान चिंतन से प्राप्त करता है। बालक में चिंतन की प्रक्रिया Process of Thinking in Children   बालक समस्या के सामने आने पर उसके समाधान हेतु प्रयास करने लगता है। समस्या के समाधान के लिए सकारात्मक दिशा में कार्य करता है (चिंतन)। यही चिंतन प्रक्रिया की शुरुआत है जो बालक तर्क, रुचि, जिज्ञासा, प्रत्यक्षीकरण, कल्पना संप्रत्यय, अनुभव के आधार पर या इनमें से किसी आधार पर समस्या के समाधान हेतु सोचता है। सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे 👈👈 Important for all Teaching Exam.  बालकों में चिंतन योग्यता को कैसे बढ़ाया जाए ? How to Enhance Thinking Ability in Children  रुचि के विकास पर ध्यान देना चाहिए। उत्तरदायित्व की भावना को समझाना चाहिए। बालकों को प्रेरित किया जाए कि वह लक्ष्य को पा सकते हैं तथा समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। बालकों में आत्म-विश्वास को बढ़ाना चाहिए तथा उनमें धनात्मक मनोवृत्ति का विकास करना चाहिए। समस्या का अभ्यास कराना चाहिए और इसे अभ्यास करते समय आयु का ध्यान रखा जाना चाहिए।  तर्क, वाद-विवाद, संगोष्ठी, समूह परिचर्चा में उनकी भागीदारी करानी चाहिए। विकास की अवधारणा और वृद्धि 👈👈 Important for all Teaching Exam.  बालक कैसे अधिगम करता है?  How Do Children Learn?  बालक परिवार, आस-पड़ोस, साथी समूह, स्कूल, शिक्षक, अपने अनुभव आदि के माध्यम से अधिगम करता है। बालक अधिगम सामान्य: या तो अभ्यास द्वारा करता है या अनुभव के माध्यम से करता है। बालक कुछ क्रियाओं को या ज्ञान को अभ्यास के द्वारा अधिगम करता है तथा कुछ को अनुभव के द्वारा करता है। भले ही बालक व अधिगम विषय-वस्तु के बीच माध्यम कुछ भी हो। बालक के अधिगम का तरीका भी सबका अलग-अलग होता है। जिन बालकों की IQ का स्तर अधिक होता है वह समझकर सीखना पसंद करते हैं वहीं कम I.Q. वाले बालक उसे रटकर सीखना पसंद करते हैं। बालक प्रयास व त्रुटि द्वारा भी सीखते हैं। प्रयास व त्रुटि का सिद्धांत थॉर्नडाइक द्वारा दिया गया जिसमें तत्परता, अभ्यास तथा प्रभाव का नियम शामिल है। बालक में अन्वेषण सीखना भी होते देखा जाता है। बालक द्वारा प्रेक्षण, विवेचना तथा करके देखना आदि विधि का अधिगम हेतु उपयोग करते हैं।  अधिगम | विकास के साथ अधिगम का सम्बन्ध 👈👈 Important for all Teaching Exam.  बालक विद्यालयी उपलब्धि में क्यों और कैसे असफल होते हैं? बालक स्कूल में क्यों असफल होते हैं या यूँ कहें कि क्यों फेल होते हैं तो कुछ कारण प्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं, जो निम्न हैं- अभ्यास में कमी: बालक यदि अर्जित ज्ञान का अभ्यास नहीं करेगा तो स्मृति से बहुत सारी बातें विलोपित होने लगती हैं वहीं अगर अभ्यास किया जाता रहा है, तो स्मृति में चिन्ह बने रहते हैं।  उचित प्रेरणा व मार्गदर्शन का अभावः बालक यदि लक्ष्य के प्रति प्रेरित नहीं होते हैं तो निश्चित ही फिर लक्ष्य प्राप्ति में कठिनाई होती है। इतना ही नहीं उचित प्रेरणा के साथ सही मार्गदर्शन भी प्रदान किया जाना चाहिए जिस पर चलकर लक्ष्य तक पहुँचा जा सके। बौद्धिक क्षमता बालक में यदि बौद्धिक क्षमता की कमी हो तो वो सीधे सरल प्रश्नों के जवाब तो आसानी से रटकर दे पाता है, लेकिन तार्किक प्रश्न या थोड़े घुमावदार प्रश्न, जिसे कठिन प्रश्न भी कहते हैं, का जवाब देना उसके लिए कठिन हो जाता है। मनोवृत्ति व आत्मविश्वास किसी भी लक्ष्य को पाने या सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मविश्वास तथा सकारात्मक मनोवृत्ति का होना जरूरी है। इसकी कमी से सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है।  निष्पादनः बालक कितना सीखता है इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि वह सीखे गए ज्ञान का सही इस्तेमाल व प्रदर्शन उचित अवसर पर कर पाता है कि नहीं। बालक का स्वास्थ्यः बालक शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होगा तभी सफलता की दर अधिक होगी अन्यथा वह अपनी पूरी योग्यता स्मृति का सही इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। 

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Gender Issues in Social Construction | सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे #ctet #ctetsuccess #eductet #cdp #pedagogy #ctet2022

 सामाजिक निर्माण लैंगिक मुद्दे (Gender Issues in Social Construction)  सामाजिक रचना के रूप में लिंग की भूमिका  समाज की रचना में स्त्री व पुरुष दोनों की भूमिका है। किसी एकमात्र से समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। प्राचीन काल में कभी स्त्री को बहुत महत्त्व दिया जाता था, परंतु समय के बदलाव ने पैतृक समाज को जन्म दिया। स्त्री हो या पुरुष दोनों में शारीरिक भिन्नताएँ तो हैं, परंतु श्रेष्ठता की कल्पना महज एक भ्रम है। सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे में हम समाज के रचना में रचना में इस भूमिका को समझेंगे।  आज बदली परिस्थितियों में महिलाएँ भी हर क्षेत्र में अपना नाम कर रही हैं तथा कई क्षेत्रों में पुरुषों से काफी आगे भी निकल चुकी है। चूँकि समाज के दोनों आवश्यक अंग हैं ऐसे में किसी भी प्रकार की श्रेष्ठता की बात करना गलत होगा और साथ ही समाज को स्त्री व पुरुष में बाँटना गलत होगा। कभी धर्म, कभी जाति, कभी नस्ल आखिर हम लोग कब तक बँटते रहेंगे? एक उत्कृष समाज के निर्माण में लोगो को लैंगिक मुद्दे  छोड़ना ही होगा। Learning | अधिगम Important Topic for All Teaching Exams 👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻 पूर्वाग्रह  पूर्वाग्रह बिना किसी तथ्य के या  तर्क के आधार पर किसी के प्रति धारणा बना लेना। इसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं होता है। यह एक तरह की मनोवृति ही है जो व्यक्ति को किसी समूह या उसके सदस्य के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल ढंग से सोचने, प्रत्यक्षण करने अनुभव करने तथा कोई क्रिया करने के लिए पहले से तत्पर बना देती है। उदाहरण-‘लड़कियां गणित में अधिक अफसल होती हैं। या ‘लड़कियाँ अच्छा गाना गाती हैं लड़कों की अपेक्षा’। इसमें दोनों उदाहरण पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं। पूर्वाग्रह का संबंध पक्षपात से है। यह जाति, धर्म, लिंग, समाज, क्षेत्र आदि पर आधारित हो सकता है। शिक्षक को या विद्द्यालय प्रबंधन को किसी भी पक्षपात पूर्ण व्यवहार तथा पूर्वाग्रह से बचना चाहिए साथ ही बच्चो को भी इनसे बचाना चाहिए।  Very Important For CTET and TET ( Concept of Development and Growth)  click here 👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻 पूर्वाग्रह विवेकहीन होते हैं। पूर्वाग्रह अर्जित होते हैं। पूर्वाग्रह पूर्ण रूप से किसी समूह द्वारा संचालित होते हैं। पूर्वाग्रह का संबंध वास्तविकता से नहीं होते हैं। पूर्वाग्रह दृढ़ तथा स्थिर प्रवृत्ति के होते हैं। पूर्वाग्रह संवेगात्मकता से प्रभावित होते हैं। मनोवृति  या  अभिवृति अभिवृति  मनोवृत्ति का संबंध किसी विषय, धारणा या विचार से होता है।  मनोवृत्ति संज्ञानात्मक, भावात्मक, व्यवहारात्मक संगठन का एक संगठित तंत्र है।  मनोवृत्ति सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों होती है।  मनोवृत्ति में इन तीनों संघटकों की कुछ खास-खास विशेषताएँ होती हैं।  मनोवृत्ति सीखी जाती है। मनोवृत्ति अपेक्षाकृत स्थायी होती है (परिवर्तन संभव है)।  इसमें परिवर्तन संगत और असंगत दोनों रूपों में होते हैं।  मनोवृत्ति में प्रेरणात्मक गुण होते हैं इसलिए विशिष्ट दिशा में निर्देशित होती है।  मनोवृति  और  पूर्वाग्रह  में अंतर CTET SUCCESS मनोवृत्ति में परिवर्तन अपेक्षाकृत आसान है जबकि पूर्वाग्रह में परिवर्तन आसान नहीं है।  मनोवृत्ति के निर्माण में मूलभूत बातें छिपी होती है जबकि पूर्वाग्रह में ऐसा नहीं होता है।  मनोवृत्ति व्यक्तिगत होती है तथा पूर्वाग्रह सामाजिक या समूह निहित होती है।  मनोवृत्ति सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में पायी जाती है जबकि पूर्वाग्रह अधिकांश नकारात्मक भावों को रखता है।

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Learning | अधिगम | विकास के साथ अधिगम का सम्बन्ध #ctet #ctetsuccess #cdp #pedagogy #ctet2022 #kvs #uptet

  अधिगम (Learning) अधिगम का अर्थ होता है “सीखना”। अधिगम एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवन भर चलती रहती है जिसके द्वारा हम कुछ ज्ञान प्राप्त करते रहते है या इससे हमारे व्यवहार में परिवर्तन होता है। जन्म के बाद से ही बालक सीखना शुरू कर देता है जो मृत्यु तक चलती रहती है। अधिगम व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहायता करता है जिससे जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता मिलती है। अधिगम के बाद व्यक्ति स्वयं और दुनिया को समझने के योग्य हो जाता है। अधिगम के विषय मे विद्वानों द्वारा दिये गए कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएं निम्न प्रकार से है :-  गेट्स के अनुसार :- “अनुभव द्वारा व्यवहार में रूपांतर लाना ही अधिगम है। ई० ए० पील :- “अधिगम व्यक्ति में एक परिवर्तन है, जो उसके वातावरण के परिवर्तनों के अनुसरण में होता है।”  क्रो एवं क्रो के अनुसार ” सीखना आदतों, ज्ञान एवं अभिवृत्तियों का अर्जन है। इसमें कार्यो को करने के नवीन तरीके सम्मिलित है और इसकी शुरुआत व्यक्ति द्वारा किसी भी बाधा को दूर करने अथवा नवीन परिस्थितियों में अपने समायोजन को लेकर होती है। इसके माध्यम से व्यवहार में उत्तरोत्तर परिवर्तन होता रहता है। यह व्यक्ति को अपने अभिप्राय अथवा लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ बनाती है। इस प्रकार विद्वानों के परिभाषाओ के माध्यम से हम समझ सकते है कि “यदि किसी विषय वस्तु के ज्ञान के आधार पर कुछ परिवर्तन करने एवं उत्पादन करने में सक्षम हो गया हो तो उसके सीखने की प्रक्रिया को अधिगम कहा जायेगा ।”  विकास का अधिगम से संबंध   सीखना जीवन भर चलने वाली एक प्रक्रिया है, इसका किसी विशेष आयु वर्ग से जोड़ कर नही देखा जा सकता है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि अधिगम और विकास एक-दूसरे से अन्तःसम्बन्धित है। विकास अधिगम को प्रभावित करता है और अधिगम भी विकास को प्रभावित करता है। विकास और अधिगम एक समान गति से आगे नही बढ़ता है। शारीरिक विकास, विशेषकर छोटे बच्चो में मानसिक और संज्ञानात्मक विकास में मददगार है। मानसिक और भाषायी विकास,सामाजिक विकास एवं अधिगम को को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। अर्थ निकलना, अमूर्त सोच (Abstract Thought) की क्षमता विकसित करना विवेचना व कार्य, अधिगम की सर्वांधिक महत्वपूर्ण पहलू है। भावनाएं, दृष्टिकोण और आदर्श , संज्ञानात्मक विकास के अभिन्न हिस्से है तथा भाषायी विकास , मानसिक चित्रण, अवधारणाओं व तार्किकता से इनका गहरा संबंध है। बच्चे एक दूसरे से व्यक्तिगत स्तर पर विभिन्न तरीको से सीखते है। वे अनुभव के माध्यम से , स्वयं करके या बना कर, प्रयोग करने से , पढ़ने से, सुनने, पूछने इत्यादि जरियो से अभिव्यक्त करने से सीखते है। अपने विकास के रास्ते मे बच्चो को इस प्रकार का अवसर मिलने चाहिये। बालको में प्राकृतिक और सामाजिक दुनिया के प्रक्रिया का भी विकास होता है। इसमें दुसरो के साथ अपने रिश्तों के विभिन्न सिद्धान्त भी शामिल है। जिसमे आधार पर उन्हें ये मालूम चलता है कि चीझे जैसी है वैसी क्यों है? साथ ही उन्हें मालूम चलता है कि कारण और कारक के बीच क्या संबंध है और कार्य व निर्णय लेने के क्या आधार है।

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