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अधिगम में सहायक कारक : व्यक्तित्व और पर्यावरणीय Factors Conducive to Learning : Personality and Environmental #ctetexam24

  अधिगम में सहायक कारक : व्यक्तित्व और पर्यावरणीय Factors Conducive to Learning : Personality and Environmental  #cdp #ctet #pedagogy #ctetexam   ‘सीखना’ निरन्तर चलने वाली एक सार्वभौम प्रक्रिया है, प्रत्येक व्यक्ति नित्यप्रति अपने जीवन में नये-नये अनुभव प्राप्त करता रहता है, ये नवीन अनुभव व्यक्ति के व्यवहार में वृद्धि एवं संशोधन करते हैं, शिशु को जन्म के कुछ समय बाद से ही उसे अपने वातावरण में कुछ-न-कुछ सीखने को मिल जाता है, बालक की सीखने की क्रिया की शुरुआत सर्व प्रथम परिवार से ही होता है फिर वह समाज, पास-पड़ोस, मित्र- मण्डली आदि से सीखना आरम्भ करता है, सीखने में उसका पर्यावरण एवं उसकी व्यक्तिगत विशेषताएँ एक सहायक कारक के रूप में बालक को सीखने में योगदान करते हैं।   यहाँ पर हम सीखने में सहायक व्यक्तिगत एवं पर्यावरणीय कारकों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं :-  व्यक्तिगत रुचि इच्छा परिपक्वता अभिप्रेरणा (आंतरिक) दृढ़ता स्व-अध्ययन की विधि  चिंता या दुश्चिंता  थकान वातावरणीय परिवार का वातावरण  स्कूल का वातावरण समाज का वातावरण कक्षा का भौतिक वातावरण अध्यापन विधि शिक्षक का व्यक्तित्व अध्ययन सामग्री विषय का स्तर पुरस्कार एवं दंड   व्यक्तिगत कारक 1. रुचिः–  बालक में सीखने की रुचि होगी तो वह जल्दी सीख सकेगा साथ ही जिस विषयवस्तु को सीखना चाहेगा उसी आसानी से सीख सकेगा। जिन बालकों में विषयवस्तु के प्रति रुचि नहीं होगा तो उन्हें उस विषय को सीखना कठिन होगा। 2. परिपक्वताः–  परिपक्वता अधिगम को प्रभावित करती है। इस बात का समर्थन कई मनोवैज्ञानिकों ने कियाए, जैसे- जीन पियाज़े आदि। जो बालक शारीरिक व मानसिक रूप से परिपक्व होते हैं वे तुलनात्मक रूप से अन्य बालकों की अपेक्षा जल्दी सीख लेते हैं। परिपक्वता आनुवंशिकता से प्रभावित होती है। 3. बुद्धि:–  जिन बालकों में 1.Q. का स्तर अधिक है. वो बालक अपेक्षाकृत दूसरे बालकों से अधिक जल्दी सीख लेते हैं, क्योंकि अधिक 1.Q. वाले बालक अधिकांशतः समझकर सीखते हैं। 4. चिंता या तनावः-  बालक परीक्षा या पढ़ाई करते समय यदि बहुत ज्यादा तनाव या चिंता करें तो अधिगम सही से नहीं कर पाएँगे लेकिन चिंता तो हो परंतु उसकी मात्रा यदि कम हो तो वो लाभकारी होगा। 5. अभिप्रेरणा:-  अभिप्रेरणा का प्रारंभिक बिंदु आवश्यकता है और आवश्यकता के अनुरूप ही बालक अधिकांशतः अधिगम करता है; जैसे- जब वह कक्षा – 2 पास कर कक्षा 3 में जाता है तब वह कक्षा – 3 की पुस्तकें पढ़ता है उनकी बातें सीखना चाहता है न कि कक्षा-2 के अध्याय को पुनः पढ़ता है। 6. स्व – अध्ययन की विधिः-  बालक यदि किसी विषयवस्तु को समझकर उसका संप्रत्यय (Concept) निर्माण कर सीखता है तब उसे आसानी होती है, लेकिन जब वह सिर्फ रटकर सीखना चाहता है तब अधिगम सही ढंग से नहीं हो पाता है।   वातावरणीय कारक   1. परिवार, स्कूल, समाजः-  बालक के अधिगम में उसके परिवार, स्कूल तथा समाज के वातावरण का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। परिवार का माहौल खुशनुमा तथा अच्छा व तनाव रहित होता है वहाँ बालकों के मस्तिष्क का विकास अच्छा होगा व स्वस्थ रहेगा। उसका प्रभाव अधिगम पर भी पड़ेगा। परिवार में यदि तनाव, लड़ाई-झगड़े होते रहेंगे तो निश्चय ही इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।  स्कूल व कक्षा के भौतिक वातावरण का भी बालक के अधिगम पर प्रभाव पड़ता है। अँधेरापन, हवा, रोशनी फर्नीचर, शोरगुल, अनुशासन आदि का प्रभाव अधिगम पर पड़ता है। समाज व आस -पड़ोस का भी अधिगम पर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि बालक में विश्वास, आस्था, संस्कृति, सामाजिक नियमों, रीति-रिवाज, आदर्श, मूल्यों का भी अधिगम पर प्रभाव पड़ता है। ये सभी समाज से ही सीखे जाते हैं।   2. शिक्षक का व्यक्तित्व तथा अध्यापन विधिः-  शिक्षक का व्यक्तित्व जितना अच्छा होगा (यहाँ पर आंतरिक व्यक्तित्व महत्त्वपूर्ण है) उसका उतना ही अच्छा प्रभाव बालकों पर पड़ेगा। शिक्षक एक अच्छे प्रेरक की भूमिका निभाते हुए बालकों में अधिगम की आवश्यकता को महत्त्व देते हुए अधिगम करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।   3. विषय का स्तर:- यदि विषय की विषय-व -वस्तु सरल हो तो वो आसानी से अधिगम कर सकता है और यदि विषय की विषय-वस्तु कठिन है तो उसे अधिगम करने में कठिनता होगी।   4. शिक्षा के अनौपचारिक साधनः- बालक औपचारिक व अनौपचारिक दोनों प्रकार के साधनों से अधिगम करता है। ज्यादातर पारंपरिक रूप से औपचारिक साधन द्वारा ही प्राप्त करने पर बल दिया जाता है, लेकिन अनौपचारिक शिक्षा के साधन भी वर्तमान में अधिगम कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वर्तमान अधिगम कराने का मुख्य उद्देश्य है व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास हो इसके लिए दुनिया, समाज, खेल – कूद आदि के प्रति भी रुचि व जानकारी होना जरूरी है। अनौपचारिक शिक्षा के साधन रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, समाचार-पत्र, पुस्तकालय, चल-चित्र आदि हैं।   Trending news Some important Topics of CDP👇👇👇👇👇👇👇👇 Pavlovs-classical-conditioning-theoryThorndikes-law-of-learning-part-1 Gender-issues-in-social-construction Thorndikes-law-of-learning  Socialization-process समाजीकरण की प्रक्रिया Evaluation-of-learning | मूल्यांकन individual-difference | व्यक्तिक विभिन्नता              

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प्रतिभाशाली, सृजनात्मक तथा विशेष आवश्यकता वाले बालक Talented, Creative and Children with Special Need #ctet2024

                            प्रतिभाशाली, सृजनात्मक तथा विशेष आवश्यकता वाले बालकTalented, Creative and Children with Needs     प्रतिभाशाली बालक ( Talented Children) :-    प्रतिभाशाली बालकों को ‘विशिष्ट बालकों’ की श्रेणी में इसलिए रखा गया है; क्योंकि वे उच्च बुद्धि एवं अभिक्षमताओं (Aptitudes) से संपन्न होते हैं तथा ऐसे बालक, जिन की बुद्धिलब्धि 120 से ऊपर होती है, प्रतिभाशाली बालक होते हैं, यथार्थ रूप से 2% से अधिक बालक विद्यालय में इस श्रेणी में नहीं होते, किंतु इसमें कुछ बालक ऐसे हो सकते हैं जिनकी बुद्धि लब्धि 170 और 180 भी हो सकती है। इस योग्यता का बालक भी हमारे सामने एक समस्या का रूप ले सकते हैं; क्योंकि उनकी स्वयं की समस्याएँ बड़ी जटिल होती है। साथ-ही-साथ उनके लिए किस प्रकार के विद्यालय का संगठन तथा प्रबंध हो, यह निर्णय करना भी कठिन है।इस प्रकार के बालक एक साधारण बालक से बहुत अधिक योग्य होते हैं। वे लोग उस कार्य को बहुत शीघ्रता से कर सकते हैं जो एक साधारण बालक नहीं कर सकता। इसके साथी ही प्रतिभाशाली बालकों को यदि यथा एवं उचित समय निर्देशन न प्रदान किया जाए तो वे अपनी उत्तम बुद्धि का अनुचित प्रयोग करने लगते हैं तथा अनुशासनहीन गुटबंदी में सम्मिलित होकर, समाज कार्य करने लगते हैं।     प्रतिभाशाली बालकों की विशेषताएँ (Characteristics of Talented Children) :-    प्रतिभाशाली बालकों में कई प्रकार की विभिन्नताएँ होती हैं। प्रतिभाशाली बालकों के समूह में समरूपता होना आवश्यक नहीं। इन प्रतिभाशाली बालकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित गुणों से संबंधित होती हैं   1. शारीरिक विशेषताएँ :-    (i) शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है और यह विकास कद, भार, चलना, बोलना आदि के रूप में होता है।      (ii) विशिष्ट बुद्धि वाले बच्चों में उत्तम स्वास्थ्य होता है और शारीरिक दोष बहुत कम होते हैं।   (iii) इन बच्चों की ज्ञान इंद्रियाँ प्रखर होती हैं।    (iv) प्रतिभाशाली बालकों में किशोरावस्था के लक्षण शीघ्र दिखाई देते हैं।   2. संवेगात्मक विशेषताएँ :-   (i) संवेगात्मक रूप से प्रतिभाशाली बालक स्थिर और समायोजन से युक्त होते हैं।   (ii) सामान्य तथा प्रसन्न रहते हैं और समस्याओं व कठिनाइयों को स्वतंत्र रूप से हल करना चाहते हैं।   (iii) नवीन व्यक्तियों, स्थानों और परिस्थितियों में ये बालक शीघ्र ही समायोजन कर लेते हैं।   (iv) इसका चरित्र और व्यक्तित्व दूसरे बालकों से श्रेष्ठ होता है।   (v) ये बालक विनोदप्रिय होते हैं।   (vi) ये आत्मविश्वासी एवं जोखिम उठाने वाले होते हैं।   (vii) इस प्रकार ये बालक सामाजिक दृष्टि से भी सुदृढ़ होते हैं।        3. सामाजिक विशेषताएँ :-    (i) ये बालक सामाजिक रूप से अधिक परिपक्व तथा सर्वप्रिय होते हैं।   (ii) इनमें उत्तरदायित्व की भावना, ईमानदारी और विश्वसनीयता पायी जाती है।   (iii) इनमें नेतृत्व की विशेषताएँ बहुत होती है।    (iv) ऐसे बालक घर, स्कूल तथा समुदाय के अन्य कार्यों की जिम्मेदारी लेना बहुत पसंद करते हैं।    (v) अनुशासनपालक व एक-दूसरे को सम्मान करने वाले होते हैं।   (vi) ऐसे बालक लोकप्रिय व्यक्तित्व वाले होते हैं।       4. संवेगात्मक विशेषताएँ :-     (i) नियमित रूप से विद्यालय में उपस्थित रहते हैं।   (ii) बौद्धिक रूप से सर्वश्रेष्ठ होते हैं तथा शैक्षिक उपलब्धि को बहुत महत्त्व देते हैं।   (iii) निर्धारित पाठ्य-पुस्तकों के अतिरिक्त सहायक पुस्तकों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने में रुचि लेते हैं।   (iv) ऐसे बालक शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं।   (v) पुरस्कार और छात्रवृत्तियाँ जीतने में भी प्रतिभाशाली बालक सबसे आगे रहते हैं।   (vi) अपेक्षाकृत कम समय और परिश्रम में अधिक अंक प्राप्त करते हैं।   (vii) अन्य प्रतिभाशाली बालकों से प्रतिस्पर्धा रखते हैं।       5. बौद्धिक विशेषताएँ :-      (i) प्रतिभाशाली बालक मानसिक रूप से सामान्य बालकों से श्रेष्ठ होते हैं।   (ii) इनमें सीखने, समझने, स्मरण तथा तर्क करने की विशेष क्षमता होती है।   (iii) ऐसे बालकों में ज्ञान की जिज्ञासा, मौलिकता तथा दृढ़ इच्छा शक्ति पायी जाती है।   (iv) उत्तम कल्पनाशक्ति एवं अंर्तदृष्टि होती हैं।    (v) तर्क करने की योग्यता सामान्य बालकों से अधिक होती हैं।   (vi) ऐसे बालकों में अवधान का विस्तार भी अधिक होता है।   (vii) ध्यान केंद्रित करने की व्यापक क्षमता होती. हैं।   (viii) इनका अधिगम तीव्र गति से होता है और सरलता से होता है।   (ix) ये स्पष्टवादी, फुर्तीले और श्रेष्ठ आत्म अभिव्यक्ति वाले होते हैं।   (x) एक या एक से अधिक क्षेत्रों में विशिष्ट योग्यता होती है।     6. नकारात्मक विशेषताएँ :-    प्रतिभाशाली बालकों में सामाजिक दृष्टि से कुछ नकारात्मक विशेषताएँ भी देखने को मिलती हैं। इन नकारात्मक विशेषताओं का विकास संभवतः उनकी प्रतिभा का समुचित पोषण एवं उपयोग न करने के कारण होता हैं। कुछ नकारात्मक विशेषताएँ निम्न हैं :-    1. प्रतिभाशाली बालक कई कार्यों में लापरवाह हो जाते हैं।   2. कभी-कभी ईर्ष्यालु एवं अंहकारयुक्त व्यवहार करने लगते हैं।   3. ऐसे बालकों की रुचि दूसरों की आलोचना में अधिक होती है।   4. कभी-कभी आवश्यकता से अधिक बोलना तथा हठ करना।   5. पाठ्यक्रम को सरल समझने के कारण पढ़ने-लिखने में आलस्य प्रदर्शित करते हैं।    6. इस श्रेणी के बालक नटखट और शोर मचाने वाले होते हैं।       प्रतिभाशाली बालकों की शिक्षा :-      1. प्रतिभाशाली बालकों के लिए अपने को व्यवस्थापित करना कठिन होता है क्योंकि पाठशाला की परिस्थितियाँ एक विशेष प्रकार की होती है। हमें प्रतिभाशाली बालक को पढ़ने की तीव्र गति के लिए व्यवस्था करना चाहिए। प्रतिभाशाली बालकों के लिए विशेष कक्षाओं की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।   2. सभी सामान्य और प्रतिभाशाली बालकों को सीखने के लिए समान अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। सभी को अपनी-अपनी प्रतिभा के विकास की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।   3. प्रतिभाशाली बालकों को कक्षा के बाहर की उन क्रियाओं में भी भाग लेना चाहिए जो उनकी शिक्षा से संबंधित नहीं होतीं हैं। यह आशा की जा सकती है कि प्रतिभाशाली बालक उन क्रियाओं का नेतृत्व करे, किंतु अध्यापक को उन्हें नेतृत्व पद अपनी स्वयं की इच्छा के आधार पर नहीं देना चाहिए, नहीं तो दूसरे क्षेत्र इनसे ईर्ष्या करने लगेंगे।   4. जो बालक विशेष रूप से प्रतिभाशाली होते हैं उनको अति विशेष ध्यान की आवश्यकता होती है। अध्यापक उनका व्यक्तिगत रूप से ध्यान

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पिछड़े, विकलांग तथा मानसिक रूप से पिछड़े बालक Backward Disabled and Mentally Retarded Children ctet success eductet

पिछड़े, विकलांग तथा मानसिक रूप से पिछड़े बालक Backward Disabled and Mentally Retarded Children #ctet2024

      पिछड़े, विकलांग तथा मानसिक रूप से पिछड़े बालक (Backward Disabled and Mentally Retarded Children) #ctet #cdp #pedagogy  पिछड़ा बालक :- पिछड़े बालक वे बालक होते हैं जो अपने समान उम्र के जो कक्षा बालकों से कम उम्र के बालकों के समान शैक्षिक योग्यता रखते हैं। उदाहरण :-  रोहित नामक एक छात्र, 8 में पढ़ता है तथा उसकी उम्र 16 वर्ष है वहीं 16 वर्ष के छात्र लगभग 10वीं की परीक्षा पास कर चुके होते हैं ऐसे में रोहित शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा बालक हुआ। सामान्यतः शैक्षिक पिछड़ापन भी दो प्रकार का पाया जाता है- सामान्य पिछड़ापन, विशिष्ट पिछड़ापन । सामान्य पिछड़ापन :-  से तात्पर्य यह है कि बालक जिस कक्षा में अपनी उम्र के अनुसार होना चाहिए उस कक्षा के सभी विषयों में शैक्षिक उपलब्धि कम हो अर्थात् सभी विषयों में पिछड़ा हो। विशिष्ट पिछड़ापन :- से तात्पर्य यह है कि बालक अपनी उम्र के अनुसार की कक्षा में किसी एक या दो विषयों में पिछड़ा हुआ हो । पिछड़ेपन की विशेषताएँ Characteristics of Backward Children:-  पिछड़े बालक सामान्य बालक अपेक्षाकृत मंद गति से सीखते हैं की। पिछड़े बालकों का सामान्य बालक के साथ समायोजन भी ठीक से नहीं हो पाता है। इसी कारण से पिछड़े बालकों में कक्षा में आपस में अधिक भिन्नता देखी जाती है। पिछड़े बालक किसी समस्या पर सूक्ष्म रूप से चिंतन नहीं कर सकते हैं। इन बालकों में एकाग्रता की कमी पायी जाती है। योग्यता के अनुरूप इनकी शैक्षणिक उपलब्धि कम होती हैं। बालक के शैक्षणिक पिछड़ेपन का प्रभाव उनके दूसरे क्षेत्रों के कार्यों में भी देखने को मिलता है। (परंतु ऐसा सर्वथा हो यह आवश्यक नहीं है)   पिछड़ेपन के कारण Causes of Backwardness :-  पिछड़ेपन के कई कारण हो सकते हैं जिनमें निम्न कुछ प्रमुख कारण हैं :-  बालक की बुद्धिलब्धि का कम होना या मंद होना। बालक का शारीरिक स्वास्थ्य सही नहीं होना; जैसे- सिर में दर्द, पाचन सही नहीं हो पाना, अकसर गैस बनना, अन्य रोगों आदि का होना। बालक के शारीरिक दोष का होना; जैसे-ज्ञानेंद्रियों में दोष, बोलने में दोष, विकलांगता, निर्बलता आदि। पारिवारिक स्थिति अगर सही नहीं हो; जैसे- – माता-पिता में झगड़ा होते रहना, आर्थिक तंगी, उचित वैवाहिक समायोजन का अभाव, भोजन का न मिलना, आदि।  स्कूल की वातावरणीय स्थिति इसका एक प्रमुख कारण है। स्कूल भवन की कमी या अपर्याप्तता, गंदे, संकीर्ण तथा शोरगुल वाले वातावरण में विद्यालय का स्थित होना, दोषपूर्ण पाठ्यक्रम, दोषपूर्ण शिक्षण विधि, शिक्षक का आचरण आदि। बालकों में संवेगात्मक अस्थिरता अर्थात् बालक संवेगात्मक रूप से स्थिर न हो, जैसे- जरा-जरा सी बात पर आक्रमक होना या फिर रोने लगना। आदि। इससे बालक का आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है। बालक समाज का हिस्सा है और ऐसे में वह समाज से काफी प्रभावित होता है। सामाजिक परिवेश के कारण कई बार बालक स्कूल में कम समय व्यतीत करना चाहता है तथा वह स्कूल से भागने के तरीके ढूँढ़ता है। इस कारण भी वह कक्षा में पढ़ाए गए पाठ्यक्रम को नहीं सीख पाता है।  इसके अन्य कारण भी हैं: जैसे-मित्र – समूह, मित्र-समूह, टेलीविजन, सिनेमा आदि जो बालकों को प्रभावित करते हैं।   पिछड़ेपन को दूर करने के उपाय :-  बालक के शारीरिक दोषों की जांच कर उसका निराकरण करना। बालकों को पौष्टिक आहार के प्रति जागरूक करना तथा सरकार की ओर से ऐसे आहार को प्रदान किया जाना । बालकों के स्वास्थ्य की जाँच करना । बालक पर व्यक्तिगत ध्यान देकर उनकी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। बालक जो पढ़ाई के प्रति रुचि नहीं दिखलाते उन्हें शिल्पकला, हस्तकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, खेल या अन्य क्षेत्रों में उनके रुचि के अनुकूल आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। विद्यालय तथा परिवार का वातावरण उचित बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। परिवार का वातावरण उचित बन सके इसके लिए बालक के माता-पिता से भी आवश्यकतानुरूप बात करनी चाहिए। स्कूल से भागने की प्रवृत्ति का कारण जानकार उसका निवारण ढूँढ़ने का प्रयास करना चाहिए।   मानसिक रूप से पिछड़े बालक Mentally Retarded Children :-  ऐसे बालक जिनकी मानसिक योग्यता सामान्य मानसिक योग्यता से कम तथा सम आयु वर्ग के सामान्य बालक की मानसिक योग्यता की तुलना में मात्रात्मक व गुणात्मक रूप से कम होती है। इसका कारण अकसर शारीरिक या मानसिक रोग होता है और इस दोष के कारण इनमें कई प्रकार की हींन-ग्रंथियाँ (inferiority complex) पैदा हो जाती है। इन बालकों की बुद्धिलब्धि सामान्यतः 80 से कम होती है। मानसिक पिछड़ेपन या मन्दबुद्धिपन की विशेषताएँ Characteristics of Mentally Retarded or Dullness :-  मन्दबुद्धिपन या मानसिक रूप से पिछड़े बालकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-  ऐसे बालक सामान्य बालकों की अपेक्षा धीरे-धीरे विकसित होते हैं। अपूर्ण और दोषपूर्ण शब्दावली लघु अवधान-विस्तार सामान्यीकरण करने सम्बन्धी अयोग्यता प्रयोग की दोषपूर्ण आदतें निरन्तर अस्वस्थता शारीरिक रूप से भी हीन होते हैं संवेगात्मक अस्थिरता का होना सीमित और साधारण रुचियाँ धीमी प्रतिक्रियाएँ मौलिकता का अभाव अनैतिकता और अपराध की ओर झुकाव मानसिक पिछड़ेपन या मन्दबुद्धिपन के कारण Reasons of Mentally Retarded or Dullness :-  वंशानुक्रम इसका महत्त्वपूर्ण कारण है। इसके लिए काफी हद तक गुणसूत्रों का दोष होता है। शारीरिक बीमारियों के कारण गर्भावस्था के दौरान माँ का असामान्य स्थिति होने के कारण, या समय से काफी पहले जन्म होना, जैसे-सातवें माह आदि में तब बालक का मानसिक विकास कम होता है।  बालक संवेग पर यदि उचित नियंत्रण नहीं कर पाता है तब भी उसके अंदर कई प्रकार की मानसिक व्याधियाँ घर कर जाती हैं।   मंद बुद्धि बालकों की समस्याएँ Problem of Mentally Retarded Children :-  ऐसे बालकों में मुख्य रूप से समायोजन की समस्या होती है, परिवार, मित्र-समूह, स्कूल या समाज सभी जगह लगभग इन्हें उपेक्षित किया जाता है तथा इनके अंदर हीनता की भावना भर जाती है जिसके कारण इनका समायोजन सही नहीं हो पाता है। इनका शारीरिक व मानसिक विकास भी सामान्य बालक की तरह नहीं हो पाता है। मंद बुद्धि बालकों के लिए शिक्षा-व्यवस्था Education for Mentally Retarded Children :-  मंद बुद्धि के बालकों के शिक्षा के संदर्भ में मुख्य बात यह है कि शिक्षा उन्हें ऐसी दी जाए जिससे वो आत्मनिर्भर बन सकें। स्वयं की देखभाल, आर्थिक स्वालंबी, सामाजिक प्रशिक्षण को ध्यान में रखते हुए शैक्षिक कार्यक्रम बनाने चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य :-  आत्मविश्वास की भावना जागृत हो। आर्थिक स्वालंबी बनाने वाली हो।  व्यक्तिगत स्वच्छता की आदत का विकास करे। समाज तथा स्कूल में समायोजन

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समावेशी शिक्षा : Inclusive Education

समावेशी शिक्षा Inclusive Education #ctet2024

  समावेशी शिक्षा Inclusive Education समावेशी शिक्षा को सभी व्यक्तियों की समानता के अधिकार को पहचानने और सभी बालकों को विशिष्ट आवश्यकताओं के साथ-साथ शिक्षा के समान अवसर के रूप में देखा जाता है। समावेशी शिक्षा अपंग बालकों की शिक्षा सामान्य स्कूल तथा सामान्य बालकों के साथ कुछ अधिक सहायता प्रदान करने की ओर इशारा करती है। शारीरिक तथा मानसिक रूप से बाधित बालकों को सामान्य बालकों के साथ सामान्य कक्षा में विशिष्ट सेवाएँ देकर विशिष्ट आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए शिक्षा देने में सहायता करती हैं। समावेशी शिक्षा की प्रकृति Nature of Inclusive Education  समावेशी शिक्षा के बारे में सामान्य रूप यह कहा जा सकता है कि सामान्य विद्यालय में सामान्य विद्यार्थी के साथ रहकर विशिष्ट प्रकार के बालकों को शिक्षा प्रदान करना है, जिससे असमर्थ बालकों का सर्वांगीण विकास हो सके। समावेशी शिक्षा में असमर्थ व सामान्य दोनों प्रकार के बालक होते हैं। असमर्थ बालक को कुछ आवश्यकतानुरूप विशेष सुविधाएँ प्रदान की जाती है। इससे असमर्थ बालक भी अपने आप को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं। समावेशी शिक्षा में बालकों में आपसी सूझ-बूझ का विकास होता है। बालक एक-दूसरे की सहायता भी करते हैं तथा इससे समायोजन में भी मदद मिलती है। समावेशी शिक्षा के उद्देश्य छात्रों में समानता की भावना का विकास करना ताकि प्रत्येक छात्र समान गति से आगे बढ़े।  समावेशी शिक्षा मानती है कि व्यवस्था बालक के अनुरूप होना चाहिए। छात्रों के अंदर समायोजन मानसिक मजबूती प्रदान करना। असमर्थ बालकों को सामान्य बालकों के साथ पढ़ाकर उनका आपसी समन्वय बनाना तथा पूर्वाग्रहित सामाजिक उपेक्षाओं से बचाना। असमर्थ बालकों के लिए भी पुस्तकालय, खेल, कला, संगीत आदि की व्यवस्था करना तथा उनमें सहभागी बनाना । शिक्षक बालकों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देना ताकि बालकों के प्रति की गई किसी भी उपेक्षा के कारण वैमनस्यता का भाव उत्पन्न न हो।  सभी छात्रों की समय सारणी लगभग एक जैसी ही हो। समावेशी शिक्षा का निर्धारण छात्रों की बुद्धिलब्धि, मानसिक, शारीरिक आदि योग्यताओं को ध्यान में , रखकर किया जाता है। असमर्थ छात्रों की असमर्थता का पता कर उनकी असमर्थता को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है।  समावेशी शिक्षा की आवश्यकता समाज में विभिन्नता को देखते हुए विद्यालय को इसके प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। बालकों में समानता, सहयोग, समायोजन, प्रेम, सहानुभूति, नैतिक गुणों के विकास तथा असमर्थ बालकों को मानसिक दृढ़ता प्रदान करते हुए उपेक्षाओं की हीन भावना से बाहर निकालना। वंचित बालक Disadvantaged Children वंचित या अलाभान्वित बालक वे बालक होते हैं जो सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक रूप से अलाभान्वित समुदाय से आते हैं। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने ‘वंचित’  का एक ठोस एवं उपयोगी अर्थ बतलाया है कि वंचित बालक वैसे बालक को कहा जा सकता है जो सामाजिक-आर्थिक रूप से तथा सांस्कृतिक रूप से अलाभान्वित समुदाय से आते हैं। भारत में अधिकतर दलित एवं आदिवासी जाति के समुदाय से आने वाले बालकों को वंचित बालक की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति समुदाय में लगभग 90% परिवार ऐसे हैं जो सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक रूप से पिछड़े हुए हैं और ऐसे परिवार के बालकों को वंचित बालक की संज्ञा दी जाती है। वंचित बालकों की पहचान Identity of Disadvantaged Children वचन का तात्पर्य है कि जब किसी बालक की समाज में रहते हुए सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति न हो सके। जब उनसे उसे वंचित रहना पड़े, तब वह वंचित बालक होता है। शिक्षा मनोविज्ञान में वंचित बालक के क्षेत्र को सीमित किया गया है। भारत में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) के लोग ज्यादातर इस परिवार से आते हैं। ऐसे बालकों मे अधिकांशतः आत्मविश्वास की कमी पायी जाती है। नकारात्मक सोच ज्यादा रखते हैं। अलाभान्वित बालकों की बोलचाल लाभान्वित बालकों के मुकाबले भिन्न होती है। वंचित बालकों का बौद्धिक निष्पादन सीमित होता है। पारिवारिक पृष्ठभूमि रूढ़िवादी होती है। परिवार में शिक्षा का अभाव होता है। वंचित बालकों के प्रकार Types of Disadvantaged Children  सामाजिक दृष्टि से वंचित बालक आर्थिक दृष्टि से वंचित बालक अनुसूचित जाति के बालक  अनुसूचित जनजाति के बालक वंचन के प्रभाव Consequences of Deprivation संज्ञानात्मक विकास में कमी अभिप्रेरणा में कमी शैक्षिक उपलब्धि का स्तर कम होना अभिवृत्ति का नकारात्मक होना वंचित बालकों की शिक्षा Disadvantaged Children Education सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक रूप से वंचित बालकों के लिए आवश्यक है कि उचित शिक्षा की व्यवस्था की जाए। वंचित समूह के बालकों को सामान्य बालकों के साथ शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षा व नियम संबंधी महत्त्वपूर्ण तथ्य शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया है, समवर्ती सूची पर केंद्र राज्य दोनों नियम बना सकते हैं। शिक्षा पहले राज्य सूची में था, लेकिन 42वें संविधान संशोधन के द्वारा इसे समवर्ती सूची में रखा गया। संविधान में 86वें संशोधन के द्वारा 2002 में 21(A) जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत 6-14 वर्ष तक के बालकों को अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा देने की बात कही गयी है। अल्पसंख्यक समुदाय की शिक्षा हेतु अनुच्छेद 30 (1) (2) दिया गया है। महिलाओं, बच्चों तथा पिछड़े वर्गों की शिक्षा हेतु अनुच्छेद 15 (iii), (iv), (v) में विशेष प्रावधान दिए गए हैं।  CTET Form Application  Important CTET Question  Teaching News

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मनोविज्ञान का परिचय Introduction of Psychology ctet success eductet

मनोविज्ञान का परिचय Introduction of Psychology #ctet2024

मनोविज्ञान का परिचय    Psychology को शताब्दियों पूर्व ” दर्शन शास्त्र ” कि एक शाखा केरूप मे माना जाता था । मनोविज्ञान को स्वतंत्र विषय बनाने के लिए इसे परिभाषित करना शुरू किया। PSYCHOLOGY शब्द कि उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दो PSYHE+LOGOS से मिलकर हुई हैं, PSYCHE का अर्थ होता है ” आत्मा का” तथा LOGOS का अर्थ होता हैं “अध्ययन करना ” इस शाब्दिक अर्थ के आधार पर सर्वप्रथम प्लेटो, अरस्तु और डेकार्ट के द्वारा मनोविज्ञान को ” आत्मा का विज्ञान ” माना गया । आत्मा शब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अंत मे यह परिभाषा अमान्य हो गई । 17वीं शताब्दी मे इटली के मनोवैज्ञानिक पॉम्पोनोजी ने मनोविज्ञान को ” मन या मस्तिष्क का विज्ञान ” माना । बाद मे यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।19वीं शताब्दी में विलियम वुन्ट, विलियम जेम्स, वाइव्स और जेम्स सली आदि के द्वारा Psychology को ” चेतना का विज्ञान ” माना गया था, अपूर्ण अर्थ होने के कारण यह परिभाषा भी अमान्य हो गई । 20वीं शताब्दी में Psychology को ” व्यवहार का विज्ञान ” माना हैं और आज तक यह परिभाषा प्रचलित हैं ।  व्यवहार का विज्ञान मानने वाले प्रमुख मनोवैज्ञानिक हैं – वाटसन, इसके अलावा वुडवर्थ , स्किनर , थॉर्नडॉइक और मैक्डुगल आदि मनोवैज्ञानिकों ने भी मनोविज्ञान को ” व्यवहार का विज्ञान ” माना है विलियम वुन्ट ने जर्मनी के ” लिपजिग ” स्थान पर 1879 ई. में प्रथम ” मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला ” स्थापित की, इसलिए विलियम वुन्ट को ” प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक ” माना जाता हैं विलियम मैक्डुगल ने अपनी पुस्तक ” आउट लाइन साइकोलॉजी ” के पृष्ट संख्या 16 पर ” चेतना शब्द ” की भरसक निन्दा की हैं । Psychology व्यवहार का शुध्द विज्ञान हैं “- वाटसन । “तुम मुझे कोई भी बालक दे दो में उसे वैसा बनाउँगा जैसा मैं उसे बनाना चाहता हूँ ” – वाटसन । ” मनोविज्ञान ने सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया ,फिर मन का त्याग किया ,फिर चेतना का त्याग किया और आज Psychologyव्यवहार के विधि के स्वरूप को स्वीकार करता हैं ” – वुड़वर्थ । Psychology और बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र  मनोविज्ञान (Psychology) मानव मस्तिष्क और व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन है। यह व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक, और शारीरिक प्रक्रियाओं को समझने में मदद करता है। बाल विकास और शिक्षाशास्त्र (Child Development and Pedagogy, CDP) में मनोविज्ञान का महत्व अत्यधिक है क्योंकि बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास को समझने से उनके बेहतर शैक्षिक अनुभव और शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है। बाल विकास और शिक्षाशास्त्र (CDP) का मनोविज्ञान में महत्व बालकों के विकास में मानसिक प्रक्रियाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बाल विकास एक समग्र प्रक्रिया है जिसमें बच्चे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, और भावनात्मक दृष्टिकोण से विकसित होते हैं। मनोविज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि बच्चे कैसे सीखते हैं, उनके व्यवहार में क्या बदलाव होते हैं, और उनके मानसिक विकास के विभिन्न पहलू क्या हैं। विकासात्मक  (Developmental Psychology): विकासात्मक मनोविज्ञान बच्चों के विकास के विभिन्न चरणों पर केंद्रित है। इसमें शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक विकास की समझ शामिल है। विकासात्मक मनोविज्ञान के सिद्धांतों से यह ज्ञात होता है कि बच्चों का मानसिक विकास किस प्रकार से होता है और किस उम्र में वे कौन-सी क्षमताएँ विकसित करते हैं। उदाहरण स्वरूप, एक बच्चा अपनी पहली बात 1-2 साल की उम्र में कह सकता है, और 4-5 साल की उम्र तक वह आत्मनिर्भरता की भावना विकसित करने लगता है। संज्ञानात्मक  (Cognitive Psychology): संज्ञानात्मक मनोविज्ञान का उद्देश्य यह समझना है कि बच्चे किस प्रकार सोचते हैं, समझते हैं और याद करते हैं। यह हमें यह जानने में मदद करता है कि बच्चों के मस्तिष्क में जानकारी का प्रसंस्करण कैसे होता है। उदाहरण के लिए, एक बच्चा जब कुछ नया सीखता है तो वह उसे अपने पिछले अनुभवों से जोड़कर समझता है। यह प्रक्रिया बच्चों की समझ और उनके निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। भावनात्मक और सामाजिक विकास (Emotional and Social Development): बच्चों का भावनात्मक और सामाजिक विकास उनके जीवन के शुरुआती वर्षों में बहुत महत्वपूर्ण होता है। मनोविज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि बच्चे अपने आस-पास के वातावरण, परिवार, और मित्रों के साथ कैसे संबंध स्थापित करते हैं। बच्चों में सहानुभूति, आत्म-सम्मान, और सामाजिक कौशलों का विकास कैसे होता है, यह समझने के लिए Psychology आवश्यक है। यह बच्चों को भावनाओं को पहचानने, प्रबंधित करने और दूसरों के साथ सहायक और सम्मानजनक तरीके से संवाद करने में मदद करता है। शिक्षा (Psychology in Education): बच्चों की शैक्षिक क्षमता को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। शिक्षक बच्चों की व्यक्तिगत जरूरतों और मानसिक अवस्था के अनुसार पाठ्यक्रम को ढाल सकते हैं। यह बच्चों की अलग-अलग क्षमताओं और सीखने के तरीके के आधार पर शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया को सरल बनाता है। शिक्षक को यह समझना होता है कि एक ही पाठ्यक्रम को बच्चे अलग-अलग तरीकों से ग्रहण करते हैं और उनकी सीखने की गति भी भिन्न हो सकती है। सकारात्मक (Positive Psychology):  बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करता है। इसमें बच्चों को खुश रहने, अपने जीवन में उद्देश्य समझने और अपनी क्षमताओं पर विश्वास करने के लिए प्रेरित किया जाता है। स्कूलों में यह प्रक्रिया बच्चों के मानसिक तनाव को कम करने में मदद करती है और बच्चों में आत्मसम्मान को बढ़ावा देती है। सीखने के सिद्धांत (Learning Theories): Psychology के सिद्धांतों से बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, बिहेवियरिज्म (Behaviorism), कनेक्शनिज्म (Connectionism), और कंस्ट्रक्टिविज्म (Constructivism) जैसे सिद्धांत बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। बिहेवियरिज्म: इसमें यह माना जाता है कि बच्चों का व्यवहार बाहरी वातावरण से प्रभावित होता है। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों के सकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा देना है। कंस्ट्रक्टिविज्म: इस सिद्धांत के अनुसार, बच्चों को ज्ञान सक्रिय रूप से स्वयं बनाना चाहिए। शिक्षक उन्हें दिशा देते हैं, लेकिन बच्चे स्वयं समझ विकसित करते हैं। शिक्षाशास्त्र और मनोविज्ञान के बीच संबंध शिक्षाशास्त्र का उद्देश्य बच्चों की शिक्षा और विकास के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करना है। बाल विकास और Psychology के सिद्धांतों को समझकर शिक्षकों को बच्चों की जरूरतों को पहचानने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा किसी शैक्षिक गतिविधि में रुचि नहीं ले रहा है, तो शिक्षक को

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Can a Simple Graduate Holder applicable for CTET test? #ctet #ctetupdate

  Can a Simple Graduate Holder applicable for CTET test?  केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (CTET) एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है जो केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा हर साल दो बार उन उम्मीदवारों के लिए आयोजित की जाती है जो सरकारी अनुभाग में शिक्षण कार्य को सुरक्षित करना चाहते हैं। आवेदक जो प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के लिए शिक्षण क्षेत्र में अपने करियर को आगे बढ़ाने के इच्छुक हैं। सीटीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी। CTET केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा है, जिसके आधार पर उम्मीदवार विभिन्न सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में विभिन्न रिक्तियों के लिए आवेदन कर सकते हैं।  CTET में दो पेपर की परीक्षा होती है – पेपर1 और पेपर 2 । इन दोनों या किसी एक के लिए अभ्यार्थियों को स्नातक (graduation) की डिग्री के साथ साथ b.ed होना अनिवार्य है।  CTET 2022 चयन प्रक्रिया  CTET 2022 चयन प्रक्रिया केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (CTET) के लिए उपस्थित होने वाले उम्मीदवारों को CTET ऑनलाइन परीक्षा में उनके स्कोर के आधार पर शॉर्टलिस्ट किया जाएगा। CTET केवल एक पात्रता परीक्षा है जिसका अर्थ है, CTET उत्तीर्ण करना उम्मीदवारों को नौकरी की गारंटी नहीं देता है। उन्हें उपलब्ध रिक्तियों के आधार पर विभिन्न स्कूलों में भर्ती के लिए आवेदन करना होगा, जिसके लिए सीटीईटी प्रमाणन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए उम्मीदवारों को चयनित होने के लिए 60% से अधिक या उसके बराबर अंक प्राप्त करने होंगे। CTET 2022 Eligibility पात्रता CTET 2022 पात्रता मानदंड कक्षा 1 से 5 और कक्षा 6 से 8 के लिए शिक्षक पद के लिए उम्मीदवारों के चयन के लिए पात्रता मानदंड अलग है। आइये इन दोनों वर्गों के लिए उम्मीदवारों द्वारा आवश्यक शैक्षिक योग्यता पर एक नज़र डालें: कक्षा 1-5 के लिए शैक्षिक योग्यता एक उम्मीदवार जिसने अपनी वरिष्ठ माध्यमिक या इसके समकक्ष परीक्षा न्यूनतम 50% अंकों के साथ पूरी की है और प्रारंभिक शिक्षा में डिप्लोमा (2 वर्ष की अवधि) के अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो रहा है या एक उम्मीदवार जिसने एनसीटीई विनियम 2002 के अनुसार न्यूनतम 45% अंक हासिल करके सीनियर सेकेंडरी या इसके समकक्ष परीक्षा पूरी की हो और प्रारंभिक शिक्षा में डिप्लोमा (2 वर्ष की अवधि) के अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो। या एक उम्मीदवार जिसने न्यूनतम 50% अंकों के साथ वरिष्ठ माध्यमिक या इसके समकक्ष परीक्षा पूरी की है और प्रारंभिक शिक्षा स्नातक (4 वर्ष की अवधि) के अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हुआ है। या एक उम्मीदवार जिसने न्यूनतम 50% अंकों के साथ सीनियर सेकेंडरी या इसके समकक्ष परीक्षा पूरी की हो और डिप्लोमा इन एजुकेशन (2 साल की अवधि) के अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो। या एक उम्मीदवार जिसके पास स्नातक की डिग्री है और प्रारंभिक शिक्षा में डिप्लोमा (2 वर्ष की अवधि) के अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो रहा है। कक्षा 6-8 के लिए शैक्षिक योग्यता एक उम्मीदवार जो स्नातक की डिग्री रखता है और प्रारंभिक शिक्षा में डिप्लोमा (2 वर्ष की अवधि) के अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो रहा है। या एक उम्मीदवार जिसने 50% अंकों के साथ अपनी स्नातक की डिग्री पूरी कर ली है और शिक्षा में स्नातक की अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो रहा है। या एक उम्मीदवार जिसने अपनी स्नातक की डिग्री 40% अंकों के साथ पूरी की है और एनसीटीई के नियमों के अनुसार, स्नातक शिक्षा के अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो रहा है। या एक उम्मीदवार जिसने न्यूनतम 50% अंकों के साथ सीनियर सेकेंडरी या इसके समकक्ष परीक्षा पूरी की है और 4 साल की अवधि के बैचलर ऑफ एलीमेंट्री एजुकेशन की अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो रहा है। या एक उम्मीदवार जिसने 50% अंकों के साथ सीनियर सेकेंडरी या इसके समकक्ष परीक्षा पूरी की हो और B.A.Ed/B.Sc.Ed या B.A/B.Sc.Ed की अंतिम वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण या उपस्थित हो। या एक उम्मीदवार जिसके पास 50% अंकों के साथ स्नातक की डिग्री है और 1 साल की अवधि के बी.एड कार्यक्रम में उत्तीर्ण या उपस्थित हो रहा है। _______________________________________________ Can a Simple Graduate Holder applicable for CTET test?  Central Teacher Eligibility Test (CTET) is a national level exam conducted by the Central Board of Secondary Education (CBSE) twice every year for the candidates who want to secure teaching job in the government section.  Applicants who are willing to pursue their career in teaching field for primary and upper primary classes.  Must have passed CTET exam.  CTET is the central teacher eligibility test based on which candidates can apply for various vacancies in various government and government aided schools. There are two paper exams in CTET – Paper 1 and Paper 2.  For both or any one of these, it is mandatory for the candidates to have a bachelor’s degree as well as b.ed. CTET 2022 Selection Process  CTET 2022 Selection Process Candidates appearing for the Central Teacher Eligibility Test (CTET) will be shortlisted on the basis of their score in CTET Online Examination.  CTET is only an eligibility test which means, qualifying CTET does not guarantee a job to the candidates.  They have to apply for recruitment in various schools based on the available vacancies, which require CTET certification, for which candidates have to score more than or equal to 60% in order to get selected. CTET 2022 Eligibility CTET 2022 Eligibility Criteria The eligibility criteria is different for the selection of candidates for the post of teacher for class 1 to 5 and class 6 to 8.  Let us have a look at the educational qualification required by the candidates for both these categories: Educational Qualification for Classes 1-5 A candidate who has completed his/her Senior Secondary or its equivalent examination with minimum 50% marks and passed or appearing in final year examination of Diploma in Elementary Education (2 years duration)  either A candidate who has completed Senior Secondary or its equivalent examination in accordance with NCTE Regulations 2002 securing minimum 45% marks and passed or appearing in the final year examination of Diploma in Elementary Education (2 years duration).  either A candidate

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भाषा और विचार Language and Thought ctet success eductet

भाषा और विचार Language and Thought #ctet2024

            भाषा और विचार भाषा और विचार : भाषा व्यक्ति के विचार को व्यक्त करने का एक माध्यम है। यह हमें विचारों का आदान-प्रदान करने में मदद करती है। भाषा के माध्यम से हम अपने विचार किसी के सामने रख सकते हैं। भाषा के माध्यम से विचारों को प्रकट करने में स्पष्टता आ जाती है। भाषा के द्वारा हम अपने भावों को अभिव्यक्त करते है। यह हमें स्वयं अर्जित करनी पड़ती है।  विश्वकोष के अनुसार, “भाषा ध्वनि प्रतीकों या संकेतों की ऐसी मान्य व्यवस्था है जिसके द्वारा एक समूह के लोग आपस में विचार-विनिमय करते हैं। “ भाषा और विचार की विशेषताएँ भाषा अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। भाषा का विचारों से गहरा संबंध है। भाषा स्वयं के द्वारा अर्जित की जाती है। भाषा का अर्जन लगातार अनुकरण के द्वारा होता है। भाषा में समाज द्वारा स्वीकृत ध्वनि संकेतों का प्रयोग किया जाता है। भाषा समाज, संस्कृति तथा सभ्यता से जुड़ी होती है। भाषा जो आस-पास बोली जाती है उसे आसानी से अर्जित कर लिया जाता है। भाषा की अपनी एक संरचना होती है। भाषा मे विभिन्नता और अनेकरूपता होती है। प्रत्येक भाषा की अपनी सीमा और संरचना होती है।  भाषा संश्लेषशात्मकता से विश्लेषणात्मक की तरफ ले जाती है।                    भाषा विकास का क्रम  Sequence of Language Development      बालक में भाषा विकास को दो चरणों में बाँटा गया है    1. प्राक् भाषा विकास अवस्था (Pre speech development)    2. उत्तरकालीन भाषा विकास अवस्था (later speech development)      1. प्राक् भाषा अवस्था (Pre-speech Development)   (i) क्रंदन (Crying): बालक जन्म लेते ही रोने, चिल्लाने की चेष्टा करता है। बालक रोता है तो रोने से उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।   (ii) बलबलाना (Babbling): बालक रोने के अलावा दूसरे महीने से कुछ अस्पष्ट ध्वनियाँ भी पैदा करता है जिनमें स्वर ध्वनियों का प्रयोग करता है, तीन चार माह बाद वह व्यंजन ध्वनि कोई-कोई बोलना शुरू करता है; जैसे बा, पा, मा, आदि। परंतु ये पूरी तरह स्पष्ट नहीं होते। 7-8 महीने में वह छोटे शब्द बोलने लगता है।   (iii) हाव-भाव (Gestures): हाव-भाव का प्रदर्शन बालक भाषा के पूरक के रूप में करता है। ऐसा वह इसलिए करता है कि शब्दों को वो बोल नहीं पाता है।   (iv) सांवेगिक अभिव्यक्तिः बालक संवेग को हँसकर, बाँह फैलाकर प्रदर्शित करता है वहीं दुःखद संवेग को रोकर तथा चिढ़कर अभिव्यक्त करता है।   2. उत्तरकालीन भाषा विकास की अवस्था (Later Speech Development ) :    इस अवस्था में क्रियात्मक पहलू और मानसिक पहलू का विकास होता है। अर्थपूर्ण शब्द भाषा का निकालना क्रियात्मक पहलू है तथा उन शब्दों को सही अर्थ – में समझना मानसिक पहलू है। इसमें पाँच चरण हैं   (i) दूसरों की भाषा समझनाः इसमें बालक को दूसरे की भाषा समझना होता है। दूसरे की भाषा समझने के लिए यह आवश्यक है कि शिशु परिवार के सदस्यों द्वारा बोले जाने वाले वाक्यों तथा शब्दों का अर्थ समझे तभी वह शब्दों को सही-सही प्रयोग कर पाएगा।   (ii) शब्दावली का निर्माण करनाः शब्दावली निर्माण में बालक वैसे शब्दों को पहले सीखता है जो उसकी आवश्यकता की पूर्ति करे। दो वर्ष के बालक का औसतन शब्द कोश 200-300 शब्द होता है।   (iii) शब्दों का वाक्य में प्रयोग: शब्दों को मिलाकर बालक वाक्य छोटे-छोटे बनाने लगता है; जैसे-माँ, दूध दो। भूख लगी है आदि। वाक्य प्रयोग में धीरे-धीरे प्रवीणता भी आती है। लेकिन कई बार यह भी देखा जाता है कि 20-24 महीने का बालक कुछ बड़े वाक्य का भी प्रयोग कर देते हैं; जैसे- “आपका दिमाग खराब हो गया है क्या।” इतने लंबे वाक्य कोई प्रयोग करता है तो यह अपवादिक स्थिति है तथा वातावरण का प्रभाव माना जाता है।   (iv) उच्चारणः बालक को न सिर्फ शब्द का प्रयोग करना चाहिए बल्कि उसके सही-सही उच्चारण भी सीखना होता है। उच्चारण वह अनुकरण द्वारा सीखता है। उच्चारण बालक के अधिगम की प्रक्रिया पर निर्भर करता है।   (v) भाषा विकास का स्वामित्वः इस अवस्था में व्यक्ति भाषा को लिखना, पढ़ना, बोलना अच्छे से जानने लगता है। भाषा पर भी अच्छा नियंत्रण हो जाता है। भाषा पर पूरा नियंत्रण हो ऐसा सबके लिए संभव नहीं है, परंतु आवश्यकतानुरूप इसको वो जान लेता है।     भाषा सीखने के साधन   भाषा सीखने के निम्न प्रमुख साधन हैं:-    1. अनुकरण (Imitation): बालक परिवार के सदस्यों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा को सर्वप्रथम सीखता है। बालक के सामने जैसे बोलते हैं वह अनुकरण के माध्यम से उसे सीखता है।   2. खेल (Play): खेल के माध्यम से बालक टेढ़ी-मेढ़ी लकीर खींचना, खेल सामग्री को देखकर अक्षर बनाना ऐसे खेलों में प्रयोग भाषा के अक्षरों को लिखना, पढ़ना, बोलना सीखता है, जैसे -वृत्त बनाना, Apple देख ‘A’ बनाना आदि।   3. कहानी सुनकरः बालकों को कहानी सुनना बहुत अच्छा लगता है। कहानी में काल्पनिक बाते तो होती है, परंतु वो नैतिकता, पशु के ऊपर, खेल से संबंधित या छोटे बच्चों पर हो तो उसमें प्रयुक्त भाषा के शब्दों को जल्दी सीख लेता है।   4. प्रश्नोत्तरः बालक अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए अकसर प्रश्न पूछते हैं, इन प्रश्नों के उत्तर पाकर वह वस्तु का अर्थ समझते हैं तथा नये शब्दों को ग्रहण भी करते हैं उपरोक्त साधन भाषा सीखने में बालक को सहायता प्रदान करते है।     भाषा विकास के सिद्धान्त   भाषा विकास के निम्न प्रमुख सिद्धांत हैं :-     1. वागेंद्रियों की परिपक्वताः भाषा का विकास वागेंद्रियों की परिपक्वता पर निर्भर करता है। वागेंद्रियों, जैसे-जिह्वा, होठ, दाँत, गला, तालु, नाक आदि। जब तक इन अंगों में परिपक्वता नहीं होगी तब तक भाषा पर नियंत्रण संभव नहीं है। इन अंगों के विकास के साथ वातावरण का उचित होना भाषा विकास के लिए आवश्यक है।   2. अनुबंधन का सिद्धांतः भाषा विकास में साहचर्य का बहुत महत्त्व है। यह उद्दीपक-अनुक्रिया (S-R) के बीच स्थापित होता है। स्किनर का मानना है। कि व्यवहार कार्यों की तरह भाषा का भी विकास होता है। उद्दीपक-अनुक्रिया के बीच अनुबंधन स्थापित होता है जो विकास भाषा के विकास में मददगार साबित होते हैं।   3. बैंडूरा का सिद्धांत: बैंडूरा अपने सामाजिक सीखने के सिद्धांत में अनुकरण पर बल

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लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त

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लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त     लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त              Lawrence Kohlberg Theory of                        Moral Development        परिचय :-    लॉरेन्स कोहलबर्ग (1927-1987) एक अमेरिकन मनोवैज्ञानिक थे। जीन पियाजे के नैतिक मुद्दों के सिद्धान्त से प्रभावित होकर ही उन्होंने ‘नैतिक न्याय’ को अपने अध्ययन क्षेत्र के रूप में चुना। उन्होंने 10 से 16 वर्ष तक के बालकों से लिए साक्षात्कार से प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण करके पियाजे के सिद्धान्त को विस्तारित, परिवर्तित तथा परिष्कृत किया। उन्होंने पाया कि बालक का विकास कुछ निश्चित अवस्थाओं में होता है, जो अवस्थाएँ सार्वभौमिक होती हैं।   कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के तीन स्तर बताए तथा प्रत्येक स्तर की दो-दो अवस्थाएं बताई हैं। कोहलबर्ग का मानना था कि नैतिक विकास में इन अवस्थाओं का क्रम निश्चित होता है। कोह्लबर्ग ने प्रत्येक स्तर में ‘आत्मन (Self) तथा ‘प्रत्याशाओं’ (Expectation) के संबंध की अभिव्यक्ति की है।       1. प्राक् रूढ़िगत नैतिकता का स्तर या पूर्व परंपरागत स्तर (Pre Conventional Level):    इस स्तर में ऐसे नियमों का पालन किया जाता है जिनका निर्माण अन्य द्वारा किया जाता है। मानक दूसरे लोग ही तय करते है। सही या गलत का कोई विचार नहीं होता ऐसे नियम का पालन पुरस्कार पाने या दंड से बचने के लिए किया जाता है।   अवस्था   (i) दंड एवं आज्ञाकारिता उन्मुखता (Punishment and obedience orientation) :    इस अवस्था में बच्चों में दंड से दूर रहने की प्रवृत्ति पायी जाती है। बच्चे अपने से बड़े या माता- -पिता के आज्ञा का पालन करते है दंड से बचने हेतु ।   (ii)साधनात्मक सापेक्षवादी उन्मुखता (Instrumental relavitist orientation) :    बच्चों में पुरस्कार पाने की अभिप्रेरणा प्रबल होती है, बालक सहभागिता या प्यार तात्कालिक पुरस्कार पाने के लिए छलयोजित व्यवहार भी करते हैं। यहाँ विनिमय या अदला-बदली का भाव देखा जाता है।         2. परंपरागत स्तर या रूढ़िगत नैतिकता का स्तर (Conventional level):    बालक दूसरे के नैतिक मानकों को अपने में आंतरीकृत करते हैं। उन मानकों के सही/ गलत का निर्णय करते हैं तथा उस पर अपनी सहमति बनाते हैं तथा अपनी आवश्यकता के साथ-साथ दूसरे की आवश्यकता का भी ध्यान रखते हैं।   अवस्था   (i) परस्पर एकरूप अभिमुखता   परंपरा को धारण करना समाज के नियम के अनुरूप व्यवहार करना समाज के नियम के अनुरूप नैतिकता होनी चाहिए समाज से अनुमोदन बच्चे पाना चाहते हैं तथा स्वयं को उत्तम लड़का, अच्छी लड़की कहलाना पसंद करते हैं।     (ii) अधिकार संरक्षण अभिमुखताः इसमें सामाजिक नियमों से आगे बढ़कर कानूनी नियम भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अब यह उम्मीद की जाती है कि सामाजिक तथा कानूनी नियम के अनुरूप नैतिकता होनी चाहिए।     (iii) आचरण स्वतः पूर्ण रूप से नियंत्रित होते हैं। अपने मूल्य को किशोर नैतिक सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में सुनिश्चित करते हैं। नैतिक विकास का यह स्तर नैतिकता का सबसे उच्च स्तर होत है। इसलिए, वास्तविक नैतिकता भी कहते हैं।   अवस्था   (i) सामाजिक अनुबंध उन्मुखता (Social contract orientation):  बालक उन वैयक्तिक अधिकार तथा नियम को महत्त्व देते हैं, जो लोकतांत्रिक रूप से मान्य होता है। बहुसंख्यक लोगों के कल्याण के हित को महत्त्व दिया जाता है।   (ii) सार्वभौमिक नीतिपरक उन्मुखता (Universal ethical principle orientation):  इस अवस्था में सार्वभौमिक नैतिक नियम को महत्त्व दिया जाता है। किशोर स्वयं ही नैतिक नियम को महत्त्व देते तथा अपनी निंदा से बचने का प्रयास करते हैं।     कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत का शिक्षा में महत्त्व   शिक्षक को बालक के व्यवहार को समझने में तथा अवस्था के ज्ञान से शिक्षक को इस बात की जानकारी होती है कि कुछ ऐसे व्यवहार है जो समय के साथ परिवर्तित होंगे उन्हें दंड देने की आवश्यकता नहीं है।   शिक्षक बालक में अनुशासन स्थापित करने, कदाचार मुक्त परीक्षा कराने, समाज या राष्ट्र के प्रति -अनुशासित रखने में मदद कर सकते हैं।         Important Topics 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻   लेव व्यगोत्स्की   जीन पियाजे   कर्ट लेविन   पॉवलव Pavlovs   थार्नडाइक का सिद्धान्त   मैस्लो का सिद्धांत     #CTET #CTET2022 #eductet #ctetsuccess CTET News CDP Important

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Lev Vygotsky

Lev Vygotsky Social and Cultural theory लेव वाइगोत्सकी सामाजिक सांस्कृतिक सिद्धान्त #ctet #ctet2024 #uptet #htet #stet #teaching #CDP #pedagogy

                  Lev Vygotsky  :लेव सिमकोविच वाइगोत्सकी (लेव वाइगोत्सकी)     Lev Semyonovich Vygotsky लेव वाइगोत्सकी   परिचय:-  लेव सिमकोविच वाइगोत्सकी (1896-1934) सोवियत रूस के एक मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने बालकों के सामाजिक विकास से सम्बन्धित एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उनके द्वारा प्रतिपादित इस संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त को सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है।   वायगोत्सकी का सामाजिक – सांस्कृतिक सिद्धांत Social and cultural theory of Lev Vygotsky   वायगोत्सकी ने अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में समाज व संस्कृति पर अत्यधिक बल डाला है। यही कारण है कि उनके सिद्धांत को ‘सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत’ भी कहा जाता है। वायगोत्सकी सामाजिक कारक व भाषा को महत्त्वपूर्ण मानते हैं तथा शिक्षक व वयस्क की भूमिका को भी स्वीकारते हैं। इनका मानना है कि ‘सहयोगात्मक अधिगम’ (collaborative learning) अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।   वायगोत्सकी ने कहा कि संज्ञानात्मक विकास एक अंतर्वैयक्तिक (Interpersonal) सामाजिक परिस्थिति में संपन्न होता है जिसमें बालकों को अपने वास्तविक विकास के स्तर अर्थात् जहाँ वे बिना किसी मदद के स्वयं कोई कार्य कर सकते हैं, से अलग उनके संभाव्य विकास के स्तर (अर्थात् जहाँ वे किसी की सहायता प्राप्त कर कोई कार्य कर सकते हैं) की ओर ले जाने का प्रयास किया जाता है। इन दोनों के बीच के अंतर को वायगोत्सकी ने समीपस्थ विकास का क्षेत्र (Zone of Proximal Development or ZPD) कहा है।   वायगोत्सकी का मानना था कि भाषा व चिंतन दोनों का विकास अलग-अलग होता है, बाद में कार्य करने के लिए दोनों मिल भी सकते हैं लेकिन संभावना कम है, परंतु बिना भाषा के चिंतन नहीं किया जा सकता है। इन्होंने ही भाषा की अवस्था बतायी, जो निम्नवत है   1. सहज अवस्था (Native Stage):  इस अवस्था में बालक कोई भी शब्द धीरे-धीरे आराम और आसानी से सीख लेता है। इसमें कोई चिंतन नहीं करता कि वह क्यों कर रहा है। इस अवस्था में अधिगम कराने के लिए चित्र का प्रयोग किया जाता है।   2. अहं केंद्रित अवस्था (Ego Centric Stage):  इस अवस्था में वह अपने आप को महत्त्वपूर्ण समझता है और अपनी बातों को दुहराते रहता है।   3. आंतरिक भाषण ( Inner Speech):  आत्म नियमन के लिए भाषा का उपयोग किया जाता है। बालक मन-मन में पढ़ने लगता है तथा सोचने लगता है।   Important Topics  👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻 जीन प्याजे का सिद्धांत Jean Piaget Theory   स्किनर का सिद्धांत Skinner Theory    कर्ट लेविन का सिद्धांत Kurt Lewins Theory   थार्नडाइक नियम / सिद्धांत Thorndikes Law  👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻     वायगोत्सकी ने चिंतन के लिए निम्न अवस्थाएं बताई हैं :-    1. एक सी वस्तुओं को इकट्ठा करना (Collection of same things) :-   एक जैसी वस्तुओं को इकट्ठा करता है और अन्य से भिन्नता स्थापित करने का ज्ञान प्राप्त करता है।   2. सृजनात्मक रूप से चिंतन (Thinking as a creativity):-  अपनी तरफ से भी कुछ चीजें जोड़ता है-प्रत्यक्षीकरण (perception)।   3. संप्रत्यात्मक चिंतन (Conceptual thinking):  इसमें सप्रत्यय को समझकर वह उत्तर देता है। इसके लिए भाषा जरूरी है।         वाइगोत्सकी के सिद्धान्त में खेल की भूमिका       Role of Play in Vygotsky’s Theory   वायगोत्सकी खेल को महत्त्वपूर्ण मानते हुए कहते हैं कि यह बालक के संज्ञानात्मक, संवेगात्मक तथा सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है, क्योंकि खेल व्यवहार को संगठित करता है तथा आत्म-नियंत्रण के विकास में सहायक सिद्ध होता है।   वाइगोत्सकी के अनुसार “खेल बच्चों के लिए निकट विकास क्षेत्र का भी निर्माण करते हैं। खेल में बच्चा हमेशा अपनी आयु से अधिक और अपने दैनिक व्यवहार के स्तर से ऊपर उठकर बर्ताव करता है। खेल के भीतर विकास की सारी प्रवृत्तियाँ सारभूत रूप से मौजूद रहती हैं। खेल और विकास के सम्बन्ध की तुलना शिक्षा और विकास के सम्बन्ध से की जा सकती है। खेल बालक के विकास का मुख्य स्रोत हैं और निकट विकास क्षेत्र की भी रचना करता है।   खेल की केवल विषय-वस्तु ही निकट विकास क्षेत्र को परिभाषित नहीं करती है। खेलने के लिए बच्चा जिस मानसिक प्रक्रिया में संलग्नित होता है वह निकट विकास क्षेत्र की रचना करती है। बच्चा निकट विकास क्षेत्र के उच्चतर स्तर पर काम कर सके इसके लिए कल्पित स्थितियों से प्राप्त भूमिकाएँ, नियम तथा प्रेरणा सहायक सिद्ध होते हैं। यदि हम खेल और खेल के बाहर की स्थितियों में बच्चे के व्यवहारों की तुलना करेंगे तो हमें निकट विकास क्षेत्र के उच्चतर तथा निम्नतर स्तर दिखाई देंगे।    खेल के माध्यम से बच्चा अपने व्यवहार को नियन्त्रित कर सकता है। यदि बच्चे को खेल का अनुभव नहीं मिलता तो उसके संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा सामाजिक विकास को हानि पहुँचती है। अतः उपरोक्त आधार पर हम कह सकते है कि खेल बच्चों के लिए निकट विकास क्षेत्र का निर्माण करने में सहायक होता है।   CTET News

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