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Social Studies (SST)

The Social Studies category covers History, Geography, Polity, and Civics. It is designed for CTET, STET, and school-level exams. Concepts are explained in an easy and structured format. Important topics are covered with exam focus. Helpful for both students and teachers.

Class 6 History: Chapter 1 “क्या, कहाँ, कैसे और कब?

Class 6 history: इतिहास एक ऐसा विषय है, जो अतीत की घटनाओं, व्यक्तियों, समाजों और संस्कृतियों के बारे में जानकारी देता है। हम जब भी इतिहास के बारे में सोचते हैं, हमारे मन में कई सवाल उठते हैं, जैसे: क्या हुआ था? कहाँ हुआ था? कैसे हुआ था? और कब हुआ था? यही सवाल इतिहास को समझने के मुख्य रास्ते हैं। कक्षा 6 के इतिहास के पहले अध्याय “क्या, कहाँ, कैसे और कब?” में इन्हीं सवालों के माध्यम से हम इतिहास के अध्ययन के महत्व और तरीके को समझने की कोशिश करेंगे। 1. इतिहास क्या है? इतिहास, अतीत की घटनाओं, उनके कारणों, और उनके प्रभावों का अध्ययन है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि समय के साथ समाज और संस्कृति में क्या बदलाव आए। यह केवल युद्धों या शासकों के बारे में नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज, संस्कृति, जीवनशैली, धर्म, राजनीति, और विज्ञान के बारे में भी है। जब हम इतिहास पढ़ते हैं, तो हम उन घटनाओं, विचारों और व्यक्तित्वों को जानने की कोशिश करते हैं, जिन्होंने हमारे समाज को आकार दिया। यह हमें यह भी समझने में मदद करता है कि आज का समाज कैसे बना और इसके विकास में कौन से तत्व प्रमुख थे। उदाहरण के लिए, हम यह जानते हैं कि प्राचीन सभ्यताएँ, जैसे मेसोपोटामिया, मिस्र, और सिंधु घाटी सभ्यता, किस प्रकार के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का प्रतिनिधित्व करती थीं। 2. इतिहास को समझने के लिए “क्या, कहाँ, कैसे और कब?“ “क्या” का सवाल इतिहास की घटनाओं के बारे में पूछता है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि क्या हुआ था, कौन से प्रमुख घटनाएँ घटित हुईं, और क्या उसके परिणाम थे। उदाहरण के लिए, “भारत में 1857 में क्या हुआ?” या “महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम में क्या भूमिका निभाई?”। “कहाँ” का सवाल हमें घटना के स्थान के बारे में बताता है। इतिहास में घटनाएँ केवल किसी विशेष स्थान पर घटित होती हैं। उदाहरण के लिए, मौर्य साम्राज्य का केंद्र पाटलिपुत्र था, और सम्राट अशोक ने अपनी अधिकांश नीतियाँ और युद्ध वहीं से चलाए थे। इसी तरह, जब हम कश्मीर के बारे में बात करते हैं, तो हमें यह समझना होता है कि वहाँ का ऐतिहासिक संदर्भ क्या था। “कैसे” का सवाल घटनाओं के कारणों और उनके विकास के तरीके को समझाता है। यह हमें यह जानने में मदद करता है कि किसी घटना या बदलाव का कारण क्या था और उस प्रक्रिया का तरीका क्या था। उदाहरण के लिए, भारत में ब्रिटिश उपनिवेशीकरण के बाद स्वतंत्रता संग्राम कैसे शुरू हुआ और यह प्रक्रिया किस प्रकार से विकासित हुई। या फिर, प्राचीन काल में लोगों ने कृषि और व्यापार को कैसे अपनाया। “कब” का सवाल समय का है। यह हमें यह बताता है कि किसी घटना की शुरुआत और अंत कब हुआ था। समय का सही निर्धारण करने से हम इतिहास को क्रमबद्ध तरीके से समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए, मौर्य साम्राज्य का समय लगभग 322-185 ईसा पूर्व था, और गुप्त साम्राज्य का समय 320-550 ईस्वी तक था। 3. इतिहास को कैसे पढ़ें? इतिहास को पढ़ने के कई तरीके होते हैं। सबसे पहले, हमें इतिहास के स्रोतों को समझना जरूरी है। इतिहास के स्रोत मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं: 1. लिखित स्रोत (Written Sources): यह स्रोत उन लेखों, दस्तावेजों, शिलालेखों, और पत्रों से प्राप्त होते हैं जो किसी घटना या व्यक्ति से संबंधित होते हैं। उदाहरण के लिए, सम्राट अशोक के शिलालेख, जो विभिन्न स्थानों पर खुदवाए गए थे, एक महत्वपूर्ण लिखित स्रोत हैं। इसके माध्यम से हम अशोक के शांतिकारक दृष्टिकोण और उसके शासन के बारे में जान सकते हैं। 2. भौतिक स्रोत (Material Sources): यह स्रोत पुरातात्विक खुदाई, वस्त्र, औजार, भवनों, मूर्तियों, सिक्कों आदि से प्राप्त होते हैं। ये हमें प्राचीन सभ्यताओं के जीवन और संस्कृति के बारे में जानकारी देते हैं। जैसे सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरें, बर्तन और घरों के अवशेष हमें उस समय के जीवनशैली के बारे में बताते हैं। 3. मौखिक स्रोत (Oral Sources): यह स्रोत उन किवदंतियों, लोककथाओं, और मौखिक परंपराओं से प्राप्त होते हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के बीच फैलती हैं। यह प्राचीन भारतीय समाज के धर्म, संस्कृतियों, और मान्यताओं के बारे में जानकारी देती हैं। इतिहास पढ़ने के दौरान हमें इन स्रोतों को ध्यान में रखते हुए किसी घटना के विभिन्न पहलुओं को समझना होता है। यह भी जरूरी है कि हम उस समय की परिस्थितियों और समाज के संरचनात्मक ढाँचे को समझें, ताकि हम किसी घटना का सही मूल्यांकन कर सकें। 4. इतिहास के विभिन्न काल इतिहास का अध्ययन करते समय यह समझना जरूरी है कि समय को विभिन्न हिस्सों में बांटा जाता है। आमतौर पर इतिहास को तीन प्रमुख कालों में विभाजित किया जाता है: 1. प्राचीन काल (Ancient Period): यह काल मानव सभ्यता की शुरुआत से लेकर लगभग 500 ई. तक माना जाता है। इसमें सिंधु घाटी सभ्यता, वेदिक काल, मौर्य और गुप्त साम्राज्य जैसे ऐतिहासिक घटनाएँ शामिल हैं। 2. मध्यकाल (Medieval Period): मध्यकाल का समय लगभग 500 ई. से लेकर 1500 ई. तक माना जाता है। इस काल में भारत में मुस्लिम शासकों का शासन था और विभिन्न साम्राज्य जैसे दिल्ली सल्तनत और मुग़ल साम्राज्य स्थापित हुए। 3. आधुनिक काल (Modern Period): आधुनिक काल की शुरुआत 1500 ई. के आस-पास होती है और यह आज तक चलता है। इसमें ब्रिटिश उपनिवेश, स्वतंत्रता संग्राम, और भारतीय समाज में आए बदलाव शामिल हैं। 5. इतिहास का महत्व इतिहास का अध्ययन हमें केवल अतीत को जानने में मदद नहीं करता, बल्कि यह हमारे वर्तमान और भविष्य को भी आकार देता है। जब हम इतिहास पढ़ते हैं, तो हम यह समझ सकते हैं कि हमारी आज की दुनिया कैसी बनी है, और भविष्य में हमें किन रास्तों पर चलने की आवश्यकता है। इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि समाज में बदलाव कैसे आते हैं और उन बदलावों का समाज पर क्या असर पड़ता है। इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि हमें अतीत की गलतियों से सीखकर भविष्य में बेहतर निर्णय लेने चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि हम इतिहास के युद्धों और संघर्षों को समझते हैं, तो हम शांति और सामंजस्य बनाए रखने के महत्व को समझ सकते हैं। निष्कर्ष कक्षा 6 के इतिहास के पहले

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CTET SST Geography #ctet #ctet2022 #uptet

 ⭕️ ‘भूगोल One Liner क्विज़’ ⭕️  ▪️ क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है— सातवाँ जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है— दूसरा भारत के उत्तर में कौन-कौन-से देश हैं— चीन, नेपाल, भूटान भारत के पूर्व में कौन-सा देश है— बांग्लादेश भारत के पश्चिम में कौन-सा देश है— पाकिस्तान भारत के दक्षिण पश्चिम में कौन-सा सागर है— अरब सागर भारत के दक्षिण-पूर्व में कौन-सी खाड़ी है— बंगाल की खाड़ी भारत के दक्षिण में कौन-सा महासागर है— हिन्द महासागर पूर्वांचल की पहाड़ियाँ भारत को किस देश से अलग करती हैं— म्यांमार से मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरूमध्य भारत को किस देश से अलग करते हैं— श्रीलंका से संपूर्ण भारत की अंक्षाशीय विस्तार कितना है— 8° 4’ से 37°6’ उत्तरी अक्षांश भारत के मध्य से कौन-सी रेखा गुजरती है— कर्क रेखा भारत के उत्तर से दक्षिण तक विस्तार कितना है— 3214 किमी भारत का पूर्व से पश्चिम तक विस्तार कितना है— 2933 km अंडमान-निकोबार द्वीप समूह कहाँ स्थित है— बंगाल की खाड़ी में लक्षद्वीप कहाँ स्थित है— अरब सागर में भारत का दक्षिणी छोर क्या कहलाता है— इंदिरा प्वाइंट इंदिरा प्वांइट को किस दूसरे नाम से भी जाना जाता है— पिगमिलियन प्वाइंट भारत का क्षेत्रफल विश्व के क्षेत्रफल का कितना है— 2. 42% विश्व की कुल जनसंख्या का कितने % भारत में निवास करता है— 17% भारत का कुल क्षेत्रफल कितना है— 32,87,263 वर्ग किसमी भारत की स्थल सीमा से कौन-से देश लगे हैं— बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान, नेपाल, वर्मा, भूटान  भारत की जल सीमा किन देशों से मिलती है— मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार व पाकिस्तान कर्क रेखा किन राज्यों से होकर गुजरती है— राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिमी बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम भारत की मुख्य भूमि की दक्षिणी सीमा कितने अक्षांश है— 8°4′ भारत का मानक समय कहाँ से लिया गया है— इलाहाबाद के निकट नैनी नामक स्थान से भारत के मानक समय और ग्रीनविच समय में कितना अन्तर है— 5 1/2 भूमध्य रेखा से भारत के दक्षिण छोर की दूरी कितनी है— 876 किमी भारत की स्थल सीमा की लंबाई कितनी है— 15200 किमी भारत की मुख्य भूमि की तटरेखा की लंबाई कितनी है— 6100 किमी

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Human Evolution: From Early Society to the City मानव का विकास: प्रारम्भिक समाज से नगर तक

  पाषाण काल आरम्भिक मानव की जानकारी :- भारतीय उपमहाद्वीप में जो मानव बीस हजार साल पहले रहा करते थे, उनके साक्ष्य नर्मदा नदी के तट पर मिले हैं। आज हम उन्हें शिकारी खाद्य संग्राहक के नाम से जानते हैं, यह नाम उन्हें भोजन का इंतजाम करने की विधि के आधार पर दिया गया है। सामान्यतः उस समय के लोग भोजन के लिए जंगली जानवरों का शिकार करते थे, मछलियाँ और चिड़ियाँ पकड़ते थे, फल-मूल दाने, पौधे पत्तियाँ इकट्ठा किया करते थे, इसलिए आज हम उन्हें आखेटक खाद्य संग्राहक के नाम से जानते हैं।                 मानव सभ्यता की दृष्टि से पाषाण काल को प्रारम्भिक काल माना है। भारत में पाषाणकालीन सभ्यता का साक्ष्य सर्वप्रथम 1863 ई. में एक विद्वान राबर्ट बुस फुट ने पल्लवरम् (मद्रास) से प्राप्त किया। राबर्ट ब्रसफुट को भारतीय प्रागैतिहासिक का पिता कहा जाता है। पाषाण काल को तीन भागों में विभाजित किया गया है: पुरापाषाण काल  (20,000-12,000 ई.पू.) मध्यपाषाण काल  (12,000-10,000 ई.पू.)  नवपाषाण काल  (10,000 ई.पू. पहले)  1. पुरा-पाषाण काल :-  पुरा-पाषाण काल दो शब्दों-पुरा यानि ‘प्राचीन’ और पाषाण यानि ‘पत्थर’ से बना है। यह काल मानव इतिहास की 99 प्रतिशत कहानी बताता है। भारत की पुरापाषाण युगीन सभ्यता का विकास- प्लीस्टोसिन या हिम युग से हुआ है। अभी तक भारत में पुरा-पाषाणकालीन मनुष्य के अवशेष कहीं से भी नहीं मिल पाए हैं। जो कुछ भी अवशेष के रूप में मिला है वह है- पत्थर के उपकरण। मानव द्वारा प्रयोग किये जाने वाले पत्थर के औजारों के रूप, आकार और जलवायु में होने वाले परिवर्तन के आधार पर इसे निम्न तीन चरणों में विभक्त किया जाता है: 1. निम्न पुरापाषाण काल :- उपकरणः  कुल्हाड़ी, हस्त कुठार, गंडासा प्रयुक्त  पदार्थ: क्वार्टजाइट एवं बिल्लौरी पत्थर। संस्कृतिः चापर-चापिंग पेबुल संस्कृति। हैण्ड एक्स (हस्तकुठार) संस्कृति  मुख्य स्थल: चतौड़ (राजस्थान), सोन नदी/ सोन घाटी (पाकिस्तानी पंजाब), बेलन घाटी (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश) और सिंगरौली घाटी (छोटा नागपुर)।  इस समय के मनुष्य नीग्रटो जाति के थे। 2. मध्य पुरा – पाषाण काल :-  उपकरण:  बेधक, खुरचनी, रन्दे व फलक । प्रयुक्त पदार्थः  क्वार्टजाइट, चर्ट । संस्कृतिः  खुरचनी बेधक संस्कृति ।  मुख्य स्थल: डीडवाना (राजस्थान), नेवासा (महाराष्ट्र), भीमबेटका (नर्मदा घाटी), तुंगभद्रा घाटी। यह निएंडरथल मानव का युग था ।  3. उच्च पुरापाषाण काल :- उपकरणः तक्षणी, फलक, शल्को और फलकों (ब्लेड) पर बने औजार । अस्थि उपकरणः अलंकृत छड़ें, मत्स्य भाला इत्यादि ।  प्रयुक्त पदार्थ : फलक एवं तक्षणी संस्कृति मुख्य स्थल: कुरनूल (आन्ध्र प्रदेश ) – हड्डी के उपकरण व राख के अवशेष, भीमबेटका (मध्य प्रदेश)-गुफा चित्रकारी के अवशेष प्राप्त हुए। आधुनिक स्वरूप वाले ‘होमोसेपियंस’ मानव का उदय इस काल में हुआ। 2. मध्य पाषाण काल :- मध्य पाषाण काल, मानव संस्कृति के उस काल से संबंधित है जो कि नवपाषाण काल के प्रारम्भिक समय में उच्च पुरापाषाण कालीन संस्कृति के बाद विकसित हुआ है। इस काल को पुरापाषाण काल तथा नव पाषाणकाल के बीच का संक्रान्ति काल भी कहते हैं। यह काल लगभग 12000 ई. पू. से प्रारम्भ होकर 10000 ई.पू. के बीच माना जाता है। पुरापाषाण काल में मानव ने अनेक प्रकार के उपकरणों का निर्माण किया तथा कला के क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति की परन्तु उसे आर्थिक क्षेत्र में अधिक सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। उच्च पुरापाषाण में उसने सामूहिक रूप से विशालकाय पशुओं का शिकार करके अपनी खाद्य समस्या को एक सीमा तक हल कर लिया, तथा बचे हुए समय का सदुपयोग कला के क्षेत्र में व्यतीत किया किन्तु फिर भी पुरापाषाणकालीन मानव प्रकृति ही रहा। इस समय तक मानव इस बात से अनभिज्ञ था कि किस प्रकार कृषि के माध्यम को अधिक खाद्य सामग्री प्रदान व तथा पशुपालन के माध्यम से प्रकृति को अधिक खाद्य सामग्री प्रदान करने के योग्य बनाया जा सकता था। यूरोप तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में मानव सभ्यता पुरापाषाण काल के पश्चात एक अन्य संस्कृति में परिवर्तित हो जाती है जिसे मध्य पाषाण काल के नाम से जाना जाता है।  3. नवपाषाण काल :-  मानव के सांस्कृतिक इतिहास में नवपाषाण काल, पाषाण युग का अंतिम चरण है। भौतिक प्रगति की दिषा में इस काल का महत्वपूर्ण स्थान है। यूरोप में प्रातिनूतन काल के अन्त एवं सर्वनूतन काल के आरम्भ में जब भूमि पर वनों का विकास हो रही था। तब वहाँ के उच्च पुरापाषाण काल के मानव बदली हुई परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के प्रयास में मध्यपाषाण कालीन संस्कृति में रहे। इसी समय पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में भी महत्वपूर्ण भौगोलिक परिवर्तन हुए। उन परिवर्तनों का प्रभाव मानव के रहन-सहन पर भी पड़ा। इसीलिये इस काल के समाजों ने, जिन्हें आजीविका की पर्याप्त सुविधाएँ नहीं थीं, ऐसे क्रांतिकारी कदम उठाये कि एक नवीन अर्थव्यवस्था में मानव जीवन बदल गया जिसके परिणामस्वरूप एक अधिक उन्नत संस्कृति विकसित हो गई। जिसे पुरातत्ववेत्ता “नवपाषाण काल तथा जाति विज्ञान “बर्बर युग” कहते हैं। इस काल के पूर्व तक मानव अपनी उदरपूर्ति के लिये पूर्णरूपेण प्रकृति पर निर्भर था। इस काल में उसने पहली बार कृषि तथा पशुपालन के द्वारा स्वयं खाद्य पदार्थों का उत्पादन करना प्रारम्भ किया। खाद्योत्पादन से एक सच्ची आर्थिक तथा तकनीकी क्रान्ति का जन्म हुआ। इन साधनों ने समाज के सम्मुख खाद्य समस्या की पूर्ति का एक सम्भावीय विकल्प प्रस्तुत कर दिया। पुरापाषाण काल तथा मध्यपाषाण काल के बर्बर समाजों को प्रकृति कृपा से प्राप्त खाद्यान्न, सीमित मात्रा में मिलते थे। इसी कारण मानव आबादी भी सीमित रहती थी परन्तु नव पाषाणकाल में कम से कम भूमि से अधिक अन्न का उत्पादन करके उसी अनुपात में बढ़ती हुई आबादी का भरण-पोषण किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त इस काल में मानव ने वनों से प्राप्त लकड़ी से नाव, मकान तथा कृषि कर्म में आने वाले औजार अर्थात् काष्ठकला, मृदभांडकला तथा कपड़ा बुनना जैसी कलाओं का आविष्कार भी किया। इन सब उद्योगों में उसे नये ढंग के मजबूत उपकरणों की आवश्यकता पड़ी। इसी कारण नवपाषाण काल में मानव ने पाषाण उपकरणों को अभीष्ट आकार देने के लिए फलकीकरण के पश्चात् गढ़ना, घिसना तथा चमकाना जैसी विधियाँ सीखीं। इन उपकरणों के कारण पुरातत्ववेत्ता इस युग को नवपाषाण काल के नाम से पुकारते हैं। आरंभिक नगर :-  आखेटक खाद्य संग्राहक यह इस महाद्वीप में 20 लाख वर्ष पहले रहते थे इन्हे यह नाम भोजन – करने की विधि के आधार पर दिया

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इतिहास का महत्व :- इतिहास हमारे अतीत अथवा बीते हुए समय का क्रमानुसार अध्ययन है। जो लोग अतीत का अध्ययन करते हैं उन्हें इतिहासकार कहते हैं। इतिहासकार अतीत की जानकारी कई तरह से प्राप्त करते हैं जैस-भौतिक अवशेष, सिक्के, अभिलेख, पांडुलिपियाँ, साहित्यिक स्रोत, विदेशी विवरण इत्यादि । पांडुलिपियों, अभिलेखों तथा पुरातत्त्व से ज्ञात जानकारियों के लिए इतिहासकार सामान्यतः स्रोत शब्द का प्रयोग करते हैं। प्रो. घाटे -” इतिहास हमारे सम्पूर्ण भूतकाल का वैज्ञानिक अध्ययन तथा लेखा-जोखा है। ”  भारतीय इतिहास के स्रोत :-   पुरातत्त्व संबंधी साक्ष्य अभिलेख प्रशस्ति सिक्के साहित्यिक स्रोत पाण्डुलिपियाँ धर्मग्रन्थ बौद्ध धर्म ग्रन्थ जैन धर्म ग्रन्थ सम-सामयिक ग्रन्थ एवं लौकिक साहित्य विदेशियों ने भी भारत की एकता को सकारा है, उन्होंने पूरे देश को ही सिंधु या इंडस नाम दे दिया। इंडिया शब्द इंडस से निकला है, जिसे संस्कृत में सिन्धु कहा जाता है। 2500 वर्ष पूर्व ईरानियों व यूनानियों ने सिन्धु को हिंदोस व इंडोस और इस नदी के पूर्व में स्थित भूमि प्रदेश को इंडिया कहा। उत्तर-पश्चिम में रहने वाले लोगों के एक समूह के लिए इस शब्द का प्रयोग किया जाता था। इसका वर्णन 3500 वर्ष पुरानी कृति ऋग्वेद में मिलता है। 1. पुरातत्त्व संबंधी साक्ष्य :-  अधिकांश अवशेष सारे देश में बिखरे अनेकानेक टीलों के नीचे दबे हुए हैं। टीला धरती की सतह के उस उभरे हुए भाग को कहते हैं, जिसके नीचे पुरानी बस्तियों के अवशेष रहते हैं। जिस विज्ञान के आधार पर पुराने टीलों का क्रमिक स्तरों में विधिवत् उत्खनन किया जाता है और प्राचीन काल के लोगों के भौतिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है उसे पुरातत्त्व (आर्किऑलॉजि ) कहते हैं और पुरातत्त्व के अध्ययन करने वालों को पुरातत्त्वविद् कहते हैं। पुरातत्त्वविद् पत्थर, ईंट से बनी इमारतों के अवशेषों, औजारों, हथियारों, बर्तनों, आभूषणों तथा सिक्कों की प्राप्ति के लिए खुदाई करते हैं। इसके अलावा पुरातत्त्वविद् जानवरों, चिड़ियों तथा मछलियों की हड्डियाँ भी ढूँढते हैं इससे उन्हें यह जानने में मदद मिलती है कि अतीत में लोग क्या खाते थे।  भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग :- भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग का जनक कनिंघम को माना जाता है, जो कि एक ब्रिटिश पुरातत्त्व शास्त्री तथा सेना में अभियांत्रिक थे। इनका पूरा नाम अलेक्जेंडर कनिंघम था। भारतीय पुरातत्त्व विभाग की स्थापना 1784 ई. में की गई। 2. अभिलेख :-  अभिलेख पत्थर अथवा धातु जैसी कठोर सतह पर उत्कीर्ण किए जाते हैं जैसे मुहरों, प्रस्तरस्तंभों, स्तूपों, चट्टानों और ताम्रपत्रों पर मिलते हैं तथा मंदिरों की दीवारों और मूर्तियों पर भी मिलते हैं। हड़प्पा संस्कृति अभिलेख अभी तक पढ़े नहीं जा सके हैं। ये संभवतः किसी भावचित्रात्मक लिपि में लिखे गए हैं जिसमें विचारों और वस्तुओं को चित्रों के रूप व्यक्त किया जाता था। अशोक के अधिकतर अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है। यह लिपि बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी। केवल उत्तरी-पश्चिमी भारत के कुछ अभिलेख खरोष्ठी लिपि में हैं जो दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। लघमान एवं शेरकुना से प्राप्त अशोक के अभिलेख यूनानी तथा आरमेइक लिपियों में हैं। इस प्रकार अशोक के अभिलेख मुख्यतः ब्राह्मी, खरोष्ठी, यूनानी तथा आरमेइक लिपियों में मिले हैं। अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सर्वप्रथम 1837 में सफलता मिली। जेम्स प्रिन्सेप ने अशोक के अभिलेखों को पढ़ा (लेकिन खोज सबसे पहले पाद्रेपी फैन्थेलर ने की थी)।  अफगानिस्तान के कंधार से मिला 2250 वर्ष पुराना अभिलेख यूनानी तथा आरमेइक नामक दो लिपियों में है।   मध्य प्रदेश के एरण से प्राप्त वाराह प्रतिमा पर हूणराज तोरमाण के लेखों का विवरण है। 3. प्रशस्ति :-  प्रशस्तियों में राजाओं और विजेताओं के गुणों और कीर्तियों का बखान तो रहता है, पर उनकी पराजयों और कमजोरियों का जिक्र नहीं होता। प्रशस्तियों की रचना विद्वान ब्राह्मणों तथा कवियों द्वारा की गई थी, जो अकसर प्रशासन में मदद करते थे। इलाहाबाद के अशोक स्तम्भ पर समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग स्तम्भ लेख एक प्रशस्ति अभिलेख है, जिसमें समुद्रगुप्त की विजयों और नीतियों का पूरा वर्णन मिलता है। ऐहोल अभिलेख भी एक प्रशस्ति अभिलेख है, यह चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति ने लिखा है। जिसमें पुलकेशिन द्वितीय तथा हर्षवर्धन के बीच हुए युद्ध का वर्णन मिलता है। 4. सिक्के :-  सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (न्यूमिस्मेटिक्स) कहते हैं। पुराने सिक्के ताँबा, चाँदी, सोना और सीसा धातु के बनते थे। भारत के प्राचीनतम सिक्के आहत सिक्के हैं जो ई.पू. पाँचवीं सदी के हैं। ठप्पा मारकर बनाये जाने के कारण भारतीय भाषाओं में इन्हें आहत मुद्रा कहते हैं।  इन पर पेड़, मछली, साँड, हाथी, अर्धचन्द्र आदि आकृतियाँ बनी होती थी।  आरम्भिक सिक्के अधिकतर चाँदी के होते थे, जबकि ताँबे के सिक्के बहुत कम थे। सर्वाधिक सिक्के मौर्योत्तर कालों में मिले हैं जो विशेषत: सीसे, चाँदी, ताँबा एवं सोने के हैं।  भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्के कुषाणों ने जारी किये लेकिन सोने के सर्वाधिक सिक्के गुप्त शासकों ने जारी किये तथा सातवाहनों ने सीसे के सर्वाधिक सिक्के जारी किये। सातवाहनों ने पोटीन के भी सिक्के जारी किये। सिक्कों पर राजवंशों और देवताओं के चित्र, धार्मिक-प्रतीक और लेख भी अंकित रहते हैं और ये सभी तत्कालीन कला और धर्म पर प्रकाश डालते हैं। मूर्तियाँ, मंदिर, भवन, चित्रकला इत्यादि भी अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्य हैं। प्राचीन काल में महलों और मंदिरों की शैली से वास्तुकला के विकास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। दक्षिण पूर्व एशिया व मध्य एशिया से प्राप्त मंदिरों तथा स्तूपों से भारतीय संस्कृति के प्रसार पर प्रकाश पड़ता है तथा चित्रकला से हमें उस समय के जीवन के विषय में जानकारी मिलती है। अजन्ता के चित्रों में मानवीय भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति मिलती है। अजन्ता की गुफाएँ महाराष्ट्र में हैं। 5. साहित्यिक स्रोत :- साहित्यिक स्त्रीत दो प्रकार के हैं-1. धार्मिक साहित्य 2. लौकिक-साहित्य। धार्मिक साहित्य में ब्राह्मणग्रन्थ-वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति ग्रन्थ व ब्राह्मणेत्तर ग्रन्थ आते हैं। लौकिक साहित्य में ऐतिहासिक ग्रन्थ, जीवनियाँ, कल्पना प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन आता है।  पांडुलिपियाँ :-  प्राचीन समय में पुस्तकों को हाथ से लिखा जाता था जिसे पांडुलिपि कहा जाता है, जो मंदिरों तथा बिहारों से प्राप्त होती हैं। हस्तलिखित होने के कारण इन्हें पांडुलिपि या मैन्यूस्क्रिप्ट कहते हैं। सामान्यतः पांडुलिपियाँ ताड़पत्तों अथवा हिमालय क्षेत्र में उगने वाले भुर्ज नामक पेड़ की छाल से बने विशेष तरीके से तैयार भोजपत्र पर लिखी जाती हैं। पांडुलिपियों में धार्मिक मान्यताओं, व्यवहारों, राजाओं के जीवन, औषधियों व विज्ञान आदि विषयों की चर्चा मिलती

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Government ( सरकार ) | केंद्र सरकार और राज्य सरकार |

  सरकार का अर्थ :-  सरकार राज्य का एक महत्वपूर्ण अंग होता है। भारत मे संघीय सरकार है । यहां दो स्तरों पर सरकार का गठन किया गया है – केंद्र और राज्य । सरकार राज्य का एक महत्वपूर्ण अंग होता है। प्रत्येक सरकार के तीन अंग होते हैं – व्यवस्थापिका (विधायिका), कार्यपालिका व न्यायपालिका। कार्यपालिका का काम संविधान और कानून के अनुसार देश का शासन चलाना है । व्यवस्थापिका देश के लिए कानून बनाती है। न्यायपालिका कानून के खिलाफ काम करने पर सजा देती है।  सरकार के विभिन्न स्तर :-  भारत मे सरकार के तीन स्तर है – केंद्रीय स्तर, राज्य स्तर और स्थानीय स्तर।   1. केंद्रीय ( राष्ट्रीय ) स्तर केन्द्रीय स्तर का सम्बन्ध पूरे देश से होता है। सम्पूर्ण देश का संचालन केन्द्र सरकार के द्वारा होता है।  2. राज्य स्तर  राज्य स्तर का सम्बन्ध देश के या संघ के विभिन्न इकाइयों से हैं, जैसे-उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब इत्यादि।  3. स्थानीय स्तर स्थानीय स्तर का सम्बन्ध देश के सबसे निचले स्तर से अर्थात् पंचायत व नगर पालिका से है। पंचायत ग्रामीण स्तर के लिए व नगर पालिका शहरी क्षेत्र के लिए है। सरकार के कार्य :-  भारत के सन्दर्भ में सरकार के सभी स्तरों पर विभिन्न कार्य एवं शक्तियाँ हैं।  केन्द्रीय स्तर की सरकार के कार्य-संविधान के द्वारा संघ सूची में उल्लेखित हैं – सम्पूर्ण देश के लिए कानून का निर्माण करना, इसका परिचालन, सम्पूर्ण देश के नागरिकों के लोक कल्याण को बढ़ावा देना, राष्ट्र की सुरक्षा व रक्षा करना व दूसरे देश के साथ सम्बन्धों को विकसित करना।  राज्य स्तर की सरकार के कार्य संविधान के तहत राज्य सूची में उल्लेखित हैं-राज्य, क्षेत्र विशेष के लिए अर्थात् अपने राज्य के लिए कानून बनाना व उनका परिचालन कराना, राज्य के नागरिकों के लोक कल्याण को बढ़ावा देना, राज्य के विकास कार्य को करना, कृषि, स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराना। स्थानीय स्तर की सरकार के कार्य व शक्तियों का प्रावधान संविधान के तहत भाग-9 व 9(क) तथा अनुसूची 11वीं व 12वीं में किया गया है। इसका स्थानीय स्तर पर नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं प्रदान करना है। जैसे-शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य इत्यादि। Project-method-of-teaching   सरकार के विभिन्न प्रकार व रूप . सरकार के अनेक प्रकार व रूप होते हैं-राजतंत्र, निरंकुशतंत्र, कुलीनतंत्र, लोकतंत्र, इत्यादि। लोकतंत्र लोकतंत्र वर्तमान में सर्वश्रेष्ठ शासन व्यवस्था है। लोकतंत्र लोगों या जनता का शासन होता है।लोकतंत्र में लोगों के द्वारा ही सरकार को निर्णय लेने, कानून का पालन करवाने की बाह्य शक्ति प्रदान की जाती है। लोकतंत्र में सरकार को यह शक्ति जनता चुनाव या निर्वाचन के माध्यम से देती है। लोकतंत्र में सरकार किसी भी प्रकार के निर्णय व कार्यों के लिए जनता के प्रति ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होती हैं।  राजतंत्र राजतंत्र में राजा या रानी के पास किसी भी प्रकार के निर्णय लेने व सरकार चलाने की शक्ति होती है। राजतंत्र के तहत राजा के पास सलाहकारों का एक छोटा-सा समूह होता है जिससे वह विभिन्न मुद्दों पर चर्चा कर सकता है परन्तु निर्णय लेने की अंतिम शक्ति राजा के पास ही होती है। राजतंत्र के विपरीत एक निरंकुश सरकार या निरंकुश राजतंत्र सरकार भी होती है जिसमें राजा या रानी की इच्छा ही कानून होता है। इसमें जनता पर निरंकुश तरीके से शासन किया जाता है।  कुलीन तन्त्र कुलीनतंत्र सरकार एक ऐसी सरकार होती है जिसमें कुछ व्यक्ति मिलकर शासन करते है। सम्पूर्ण सत्ता या शासन का अधिकार कुछ व्यक्तियों के हाथ में रहता है। आधिनायकव अधिनायकत्व सरकार ऐसी सरकार होती है जो प्रजा के ऊपर निरंकुशता पूर्वक शासन करती है। इस प्रकार की शासन प्रणाली में लोगों को किसी प्रकार की स्वतंत्रता व अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं, जैसे-फासीवादी व नाजीवादी सरकार। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र सरकार को प्रतिनिधि लोकतंत्र कहते हैं। प्रतिनिधि लोकतंत्र में जनता प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लेती है। वे अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन करती हैं। स्थानीय सरकार व प्रशासन स्थानीय सरकार का अर्थ भारत में स्थानीय सरकार का जनक भारत के वायसराय लार्ड रिपन (1880-1884) को माना जाता है। भारत में पंचायती राज का जनक बलवन्त राय मेहता को माना जाता है। स्थानीय सरकार किसी भी देश में लोकतंत्र की प्रारम्भिक सीढ़ी होती है अत: लोकतंत्र का प्रथम स्तर है। स्थानीय सरकार का तात्पर्य है कि ऐसी सरकार जिसमें स्थानीय स्तर पर जनता द्वारा शासन प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी होती है। स्थानीय सरकार का विकास  प्राचीन .काल में भारत में सरकार का  स्वरुप स्थानीय स्तर पर ही निर्धारित होता था। भारत में दक्षिण भारत में चोल साम्राज्य की स्थानीय प्रशासन सबसे आदर्श व्यवस्था समझी गई है।चोल साम्राज्य के तहत स्थानीय सरकार को केन्द्रीय साम्राज्य से पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त की। स्थानीय सरकार के प्रतिनिधियों के लिए एक स्पष्ट संहिता बनाई गई थी जिसमें उनकी योग्यता, कार्य प्रणाली व स्वरूप का एक आदर्श रूप में प्रस्तुत किया गया था। भारत में मध्यकाल में स्थानीय सरकार के विकास में रूकावट आई। स्थानीय प्रशासन पर धर्म व उसकी कार्यप्रणाली का प्रभाव पड़ा। आधुनिक युग में ब्रिटिश साम्राज्य के तहत स्थानीय सरकार में विकास प्रक्रिया की शुरूआत हुई थी। विशेषकर लार्ड रिपन के काल में। लार्ड रिपन ने स्थानीय सरकार की स्वायत्तता व उसके कार्य क्षेत्र के विस्तार को समर्थन दिया इसलिए लार्ड रिपन को स्थानीय सरकार का जनक माना जाता है। ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत  ग्राम सभा एक पंचायत के क्षेत्र में रहने वाले सभी वयस्कों की सभा होती है। कोई भी व्यक्ति जिसकी उम्र 18 वर्ष या उससे ज्यादा हो, जिसे वोट देने का अधिकार प्राप्त हो और जिसका नाम गाँव के मतदाता सूची में उल्लेखित है ऐसे ग्राम समूह को ही ग्राम सभा कहा जाता है। एक गाँव की एक ग्राम सभा हो सकती है और एक गाँव की दो ग्राम सभा भी हो सकती हैं। एक या एक से अधिक गाँव को मिलाकर एक ग्राम सभा भी हो सकती है।  एक ग्राम पंचायत कई वार्डों (छोटे क्षेत्रों) में बंटी हुई होती है। प्रत्येक वार्ड अपना एक प्रतिनिधि चुनता है, जो वार्ड पंच के नाम से जाना जाता है। ग्राम पंचायत का एक सचिव होता है जो ग्राम सभा का भी सचिव होता है। यह सरकारी कर्मचारी होता है। सचिव का काम

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भारत के प्रमुख बांध एवं नदी परियोजनाएँ

🌺🌸 भारत के प्रमुख बांध एवं नदी परियोजनाएँ 🌸🌺 Join Now👉 t.me/EduCtet1 🍫1. इडुक्की परियोजना (Idukki Dam) – पेरियार नदी (Periyar River) – केरल (Kerala) 🍫2. उकाई परियोजना (Ukai Project) – ताप्ती नदी (Tapi river) – गुुजरात (Gujarat) 🍫3. काकड़ापारा परियोजना (Kakrapar project) – ताप्ती नदी (Tapi river) – गुुजरात (Gujarat) t.me/EduCtet1 🍫4. कोलडैम परियोजना (Koldam project) – सतलुज नदी – (Sutlej River) – हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) 🍫5. गंगासागर परियोजना (Ganga Sagar project) – चम्बल नदी (Chambal River) – मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) 🍫6. जवाहर सागर परियोजना (Jawahar Sagar Project) – चम्बल नदी (Chambal River) – राजस्थान (Rajasthan) 🍫7. जायकवाड़ी परियोजना (Jayakwadi project ) – गोदावरी नदी (Godavari river) – महाराष्ट्र (Maharashtra) 🍫8. टिहरी बाँध परियोजना (Tehri Dam Project) – भागीरथी नदी (Bhagirathi River) – उत्तराखण्ड (Uttarakhand) 🍫9. तिलैया परियोजना (Tilaiya Project) – बराकर नदी (Barakar River) – झारखंड (Jharkhand) 🍫10. तुलबुल परियोजना (Tulbul Project) – झेलम नदी (Jhelum River) – जम्मू और कश्मीर (Jammu and Kashmir) 🍫11. दुर्गापुर बैराज परियोजना (Durgapur Barrage Project) – दामोदर नदी (Damodar River) – पश्चिम बंगाल (West Bengal) t.me/EduCtet1 🍫12. दुलहस्ती परियोजना (Dul Hasti Project ) – चिनाब नदी (Chenab River) – जम्मू और कश्मीर (Jammu and Kashmir) 🍫13. नागपुर शक्ति गृह परियोजना (Nagpur Power Station Project) – कोराडी नदी (Koradi River) – महाराष्ट्र (Maharashtra) 🍫14. नागार्जुनसागर परियोजना (Nagarjuna Sagar Project) – कृष्णा नदी (Krishna River) – आन्ध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) 🍫15. नाथपा झाकरी परियोजना (Nathpa Jhakri project) – सतलज नदी (Sutlej River) – हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) t.me/EduCtet1 🍫16. पंचेत बांध (Panchet Dam) – दामोदर नदी (Damodar River) – झारखंड (Jharkhand) 🍫17. पोचम्पाद परियोजना (Pochampad project) – महानदी (Mahanadi) – कर्नाटक (Karnataka) 🍫18. फरक्का परियोजना (Farakka project) – गंगा नदी (Ganges River ) – पश्चिम बंगाल (West Bengal) 🍫19. बाणसागर परियोजना (Bansagar project) – सोन नदी (Son River) – मध्य प्रदेश (Madya Pradesh) 🍫20. भाखड़ा नांगल परियोजना (Bhakra Nangal Project) – सतलज नदी (Sutlej River) – हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) t.me/EduCtet1 🍫21. भीमा परियोजना (Bhima Project) – पवना नदी (Pavana River) – तेलंगाना (Telangana) 🍫22. माताटीला परियोजना (Matatila project ) – बेतवा नदी (Betwa River) – उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) t.me/EduCtet1 🍫23. रंजीत सागर बांध परियोजना (Ranjit Sagar Dam Project ) – रावी नदी (Ravi River) – जम्मू और कश्मीर (Jammu and Kashmir) 🍫24. राणा प्रताप सागर परियोजना (Rana Pratap Sagar Project ) – चम्बल नदी (Chambal River) – राजस्थान (Rajasthan) t.me/EduCtet1 🍫25. सतलज परियोजना (Sutlej Project) – चिनाब नदी (Chenab River) – जम्मू और कश्मीर (Jammu and Kashmir) 🍫26. सरदार सरोवर परियोजना (Sardar Sarovar Project) – नर्मदा नदी (Narmada River) – गुुजरात (Gujarat)  t.me/EduCtet1 🍫27. हिडकल परियोजना (Hidkal project) – घाटप्रभा परियोजना (Ghataprabha River) – कर्नाटक (Karnataka)

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