CTET SUCCESS

Child Development & Pedagogy (CDP)

The CDP category focuses on child development and teaching methodology. It is one of the most important subjects for CTET, STET, and other teacher exams. This section includes theory, MCQs, and practice sets. All content is prepared according to the latest exam syllabus.

मनोविज्ञान का परिचय Introduction of Psychology ctet success eductet

मनोविज्ञान का परिचय Introduction of Psychology #ctet2024

मनोविज्ञान का परिचय    Psychology को शताब्दियों पूर्व ” दर्शन शास्त्र ” कि एक शाखा केरूप मे माना जाता था । मनोविज्ञान को स्वतंत्र विषय बनाने के लिए इसे परिभाषित करना शुरू किया। PSYCHOLOGY शब्द कि उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दो PSYHE+LOGOS से मिलकर हुई हैं, PSYCHE का अर्थ होता है ” आत्मा का” तथा LOGOS का अर्थ होता हैं “अध्ययन करना ” इस शाब्दिक अर्थ के आधार पर सर्वप्रथम प्लेटो, अरस्तु और डेकार्ट के द्वारा मनोविज्ञान को ” आत्मा का विज्ञान ” माना गया । आत्मा शब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अंत मे यह परिभाषा अमान्य हो गई । 17वीं शताब्दी मे इटली के मनोवैज्ञानिक पॉम्पोनोजी ने मनोविज्ञान को ” मन या मस्तिष्क का विज्ञान ” माना । बाद मे यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।19वीं शताब्दी में विलियम वुन्ट, विलियम जेम्स, वाइव्स और जेम्स सली आदि के द्वारा Psychology को ” चेतना का विज्ञान ” माना गया था, अपूर्ण अर्थ होने के कारण यह परिभाषा भी अमान्य हो गई । 20वीं शताब्दी में Psychology को ” व्यवहार का विज्ञान ” माना हैं और आज तक यह परिभाषा प्रचलित हैं ।  व्यवहार का विज्ञान मानने वाले प्रमुख मनोवैज्ञानिक हैं – वाटसन, इसके अलावा वुडवर्थ , स्किनर , थॉर्नडॉइक और मैक्डुगल आदि मनोवैज्ञानिकों ने भी मनोविज्ञान को ” व्यवहार का विज्ञान ” माना है विलियम वुन्ट ने जर्मनी के ” लिपजिग ” स्थान पर 1879 ई. में प्रथम ” मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला ” स्थापित की, इसलिए विलियम वुन्ट को ” प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक ” माना जाता हैं विलियम मैक्डुगल ने अपनी पुस्तक ” आउट लाइन साइकोलॉजी ” के पृष्ट संख्या 16 पर ” चेतना शब्द ” की भरसक निन्दा की हैं । Psychology व्यवहार का शुध्द विज्ञान हैं “- वाटसन । “तुम मुझे कोई भी बालक दे दो में उसे वैसा बनाउँगा जैसा मैं उसे बनाना चाहता हूँ ” – वाटसन । ” मनोविज्ञान ने सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया ,फिर मन का त्याग किया ,फिर चेतना का त्याग किया और आज Psychologyव्यवहार के विधि के स्वरूप को स्वीकार करता हैं ” – वुड़वर्थ । Psychology और बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र  मनोविज्ञान (Psychology) मानव मस्तिष्क और व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन है। यह व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक, और शारीरिक प्रक्रियाओं को समझने में मदद करता है। बाल विकास और शिक्षाशास्त्र (Child Development and Pedagogy, CDP) में मनोविज्ञान का महत्व अत्यधिक है क्योंकि बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास को समझने से उनके बेहतर शैक्षिक अनुभव और शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है। बाल विकास और शिक्षाशास्त्र (CDP) का मनोविज्ञान में महत्व बालकों के विकास में मानसिक प्रक्रियाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बाल विकास एक समग्र प्रक्रिया है जिसमें बच्चे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, और भावनात्मक दृष्टिकोण से विकसित होते हैं। मनोविज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि बच्चे कैसे सीखते हैं, उनके व्यवहार में क्या बदलाव होते हैं, और उनके मानसिक विकास के विभिन्न पहलू क्या हैं। विकासात्मक  (Developmental Psychology): विकासात्मक मनोविज्ञान बच्चों के विकास के विभिन्न चरणों पर केंद्रित है। इसमें शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक विकास की समझ शामिल है। विकासात्मक मनोविज्ञान के सिद्धांतों से यह ज्ञात होता है कि बच्चों का मानसिक विकास किस प्रकार से होता है और किस उम्र में वे कौन-सी क्षमताएँ विकसित करते हैं। उदाहरण स्वरूप, एक बच्चा अपनी पहली बात 1-2 साल की उम्र में कह सकता है, और 4-5 साल की उम्र तक वह आत्मनिर्भरता की भावना विकसित करने लगता है। संज्ञानात्मक  (Cognitive Psychology): संज्ञानात्मक मनोविज्ञान का उद्देश्य यह समझना है कि बच्चे किस प्रकार सोचते हैं, समझते हैं और याद करते हैं। यह हमें यह जानने में मदद करता है कि बच्चों के मस्तिष्क में जानकारी का प्रसंस्करण कैसे होता है। उदाहरण के लिए, एक बच्चा जब कुछ नया सीखता है तो वह उसे अपने पिछले अनुभवों से जोड़कर समझता है। यह प्रक्रिया बच्चों की समझ और उनके निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। भावनात्मक और सामाजिक विकास (Emotional and Social Development): बच्चों का भावनात्मक और सामाजिक विकास उनके जीवन के शुरुआती वर्षों में बहुत महत्वपूर्ण होता है। मनोविज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि बच्चे अपने आस-पास के वातावरण, परिवार, और मित्रों के साथ कैसे संबंध स्थापित करते हैं। बच्चों में सहानुभूति, आत्म-सम्मान, और सामाजिक कौशलों का विकास कैसे होता है, यह समझने के लिए Psychology आवश्यक है। यह बच्चों को भावनाओं को पहचानने, प्रबंधित करने और दूसरों के साथ सहायक और सम्मानजनक तरीके से संवाद करने में मदद करता है। शिक्षा (Psychology in Education): बच्चों की शैक्षिक क्षमता को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। शिक्षक बच्चों की व्यक्तिगत जरूरतों और मानसिक अवस्था के अनुसार पाठ्यक्रम को ढाल सकते हैं। यह बच्चों की अलग-अलग क्षमताओं और सीखने के तरीके के आधार पर शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया को सरल बनाता है। शिक्षक को यह समझना होता है कि एक ही पाठ्यक्रम को बच्चे अलग-अलग तरीकों से ग्रहण करते हैं और उनकी सीखने की गति भी भिन्न हो सकती है। सकारात्मक (Positive Psychology):  बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करता है। इसमें बच्चों को खुश रहने, अपने जीवन में उद्देश्य समझने और अपनी क्षमताओं पर विश्वास करने के लिए प्रेरित किया जाता है। स्कूलों में यह प्रक्रिया बच्चों के मानसिक तनाव को कम करने में मदद करती है और बच्चों में आत्मसम्मान को बढ़ावा देती है। सीखने के सिद्धांत (Learning Theories): Psychology के सिद्धांतों से बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, बिहेवियरिज्म (Behaviorism), कनेक्शनिज्म (Connectionism), और कंस्ट्रक्टिविज्म (Constructivism) जैसे सिद्धांत बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। बिहेवियरिज्म: इसमें यह माना जाता है कि बच्चों का व्यवहार बाहरी वातावरण से प्रभावित होता है। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों के सकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा देना है। कंस्ट्रक्टिविज्म: इस सिद्धांत के अनुसार, बच्चों को ज्ञान सक्रिय रूप से स्वयं बनाना चाहिए। शिक्षक उन्हें दिशा देते हैं, लेकिन बच्चे स्वयं समझ विकसित करते हैं। शिक्षाशास्त्र और मनोविज्ञान के बीच संबंध शिक्षाशास्त्र का उद्देश्य बच्चों की शिक्षा और विकास के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करना है। बाल विकास और Psychology के सिद्धांतों को समझकर शिक्षकों को बच्चों की जरूरतों को पहचानने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा किसी शैक्षिक गतिविधि में रुचि नहीं ले रहा है, तो शिक्षक को

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भाषा और विचार Language and Thought ctet success eductet

भाषा और विचार Language and Thought #ctet2024

            भाषा और विचार भाषा और विचार : भाषा व्यक्ति के विचार को व्यक्त करने का एक माध्यम है। यह हमें विचारों का आदान-प्रदान करने में मदद करती है। भाषा के माध्यम से हम अपने विचार किसी के सामने रख सकते हैं। भाषा के माध्यम से विचारों को प्रकट करने में स्पष्टता आ जाती है। भाषा के द्वारा हम अपने भावों को अभिव्यक्त करते है। यह हमें स्वयं अर्जित करनी पड़ती है।  विश्वकोष के अनुसार, “भाषा ध्वनि प्रतीकों या संकेतों की ऐसी मान्य व्यवस्था है जिसके द्वारा एक समूह के लोग आपस में विचार-विनिमय करते हैं। “ भाषा और विचार की विशेषताएँ भाषा अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। भाषा का विचारों से गहरा संबंध है। भाषा स्वयं के द्वारा अर्जित की जाती है। भाषा का अर्जन लगातार अनुकरण के द्वारा होता है। भाषा में समाज द्वारा स्वीकृत ध्वनि संकेतों का प्रयोग किया जाता है। भाषा समाज, संस्कृति तथा सभ्यता से जुड़ी होती है। भाषा जो आस-पास बोली जाती है उसे आसानी से अर्जित कर लिया जाता है। भाषा की अपनी एक संरचना होती है। भाषा मे विभिन्नता और अनेकरूपता होती है। प्रत्येक भाषा की अपनी सीमा और संरचना होती है।  भाषा संश्लेषशात्मकता से विश्लेषणात्मक की तरफ ले जाती है।                    भाषा विकास का क्रम  Sequence of Language Development      बालक में भाषा विकास को दो चरणों में बाँटा गया है    1. प्राक् भाषा विकास अवस्था (Pre speech development)    2. उत्तरकालीन भाषा विकास अवस्था (later speech development)      1. प्राक् भाषा अवस्था (Pre-speech Development)   (i) क्रंदन (Crying): बालक जन्म लेते ही रोने, चिल्लाने की चेष्टा करता है। बालक रोता है तो रोने से उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।   (ii) बलबलाना (Babbling): बालक रोने के अलावा दूसरे महीने से कुछ अस्पष्ट ध्वनियाँ भी पैदा करता है जिनमें स्वर ध्वनियों का प्रयोग करता है, तीन चार माह बाद वह व्यंजन ध्वनि कोई-कोई बोलना शुरू करता है; जैसे बा, पा, मा, आदि। परंतु ये पूरी तरह स्पष्ट नहीं होते। 7-8 महीने में वह छोटे शब्द बोलने लगता है।   (iii) हाव-भाव (Gestures): हाव-भाव का प्रदर्शन बालक भाषा के पूरक के रूप में करता है। ऐसा वह इसलिए करता है कि शब्दों को वो बोल नहीं पाता है।   (iv) सांवेगिक अभिव्यक्तिः बालक संवेग को हँसकर, बाँह फैलाकर प्रदर्शित करता है वहीं दुःखद संवेग को रोकर तथा चिढ़कर अभिव्यक्त करता है।   2. उत्तरकालीन भाषा विकास की अवस्था (Later Speech Development ) :    इस अवस्था में क्रियात्मक पहलू और मानसिक पहलू का विकास होता है। अर्थपूर्ण शब्द भाषा का निकालना क्रियात्मक पहलू है तथा उन शब्दों को सही अर्थ – में समझना मानसिक पहलू है। इसमें पाँच चरण हैं   (i) दूसरों की भाषा समझनाः इसमें बालक को दूसरे की भाषा समझना होता है। दूसरे की भाषा समझने के लिए यह आवश्यक है कि शिशु परिवार के सदस्यों द्वारा बोले जाने वाले वाक्यों तथा शब्दों का अर्थ समझे तभी वह शब्दों को सही-सही प्रयोग कर पाएगा।   (ii) शब्दावली का निर्माण करनाः शब्दावली निर्माण में बालक वैसे शब्दों को पहले सीखता है जो उसकी आवश्यकता की पूर्ति करे। दो वर्ष के बालक का औसतन शब्द कोश 200-300 शब्द होता है।   (iii) शब्दों का वाक्य में प्रयोग: शब्दों को मिलाकर बालक वाक्य छोटे-छोटे बनाने लगता है; जैसे-माँ, दूध दो। भूख लगी है आदि। वाक्य प्रयोग में धीरे-धीरे प्रवीणता भी आती है। लेकिन कई बार यह भी देखा जाता है कि 20-24 महीने का बालक कुछ बड़े वाक्य का भी प्रयोग कर देते हैं; जैसे- “आपका दिमाग खराब हो गया है क्या।” इतने लंबे वाक्य कोई प्रयोग करता है तो यह अपवादिक स्थिति है तथा वातावरण का प्रभाव माना जाता है।   (iv) उच्चारणः बालक को न सिर्फ शब्द का प्रयोग करना चाहिए बल्कि उसके सही-सही उच्चारण भी सीखना होता है। उच्चारण वह अनुकरण द्वारा सीखता है। उच्चारण बालक के अधिगम की प्रक्रिया पर निर्भर करता है।   (v) भाषा विकास का स्वामित्वः इस अवस्था में व्यक्ति भाषा को लिखना, पढ़ना, बोलना अच्छे से जानने लगता है। भाषा पर भी अच्छा नियंत्रण हो जाता है। भाषा पर पूरा नियंत्रण हो ऐसा सबके लिए संभव नहीं है, परंतु आवश्यकतानुरूप इसको वो जान लेता है।     भाषा सीखने के साधन   भाषा सीखने के निम्न प्रमुख साधन हैं:-    1. अनुकरण (Imitation): बालक परिवार के सदस्यों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा को सर्वप्रथम सीखता है। बालक के सामने जैसे बोलते हैं वह अनुकरण के माध्यम से उसे सीखता है।   2. खेल (Play): खेल के माध्यम से बालक टेढ़ी-मेढ़ी लकीर खींचना, खेल सामग्री को देखकर अक्षर बनाना ऐसे खेलों में प्रयोग भाषा के अक्षरों को लिखना, पढ़ना, बोलना सीखता है, जैसे -वृत्त बनाना, Apple देख ‘A’ बनाना आदि।   3. कहानी सुनकरः बालकों को कहानी सुनना बहुत अच्छा लगता है। कहानी में काल्पनिक बाते तो होती है, परंतु वो नैतिकता, पशु के ऊपर, खेल से संबंधित या छोटे बच्चों पर हो तो उसमें प्रयुक्त भाषा के शब्दों को जल्दी सीख लेता है।   4. प्रश्नोत्तरः बालक अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए अकसर प्रश्न पूछते हैं, इन प्रश्नों के उत्तर पाकर वह वस्तु का अर्थ समझते हैं तथा नये शब्दों को ग्रहण भी करते हैं उपरोक्त साधन भाषा सीखने में बालक को सहायता प्रदान करते है।     भाषा विकास के सिद्धान्त   भाषा विकास के निम्न प्रमुख सिद्धांत हैं :-     1. वागेंद्रियों की परिपक्वताः भाषा का विकास वागेंद्रियों की परिपक्वता पर निर्भर करता है। वागेंद्रियों, जैसे-जिह्वा, होठ, दाँत, गला, तालु, नाक आदि। जब तक इन अंगों में परिपक्वता नहीं होगी तब तक भाषा पर नियंत्रण संभव नहीं है। इन अंगों के विकास के साथ वातावरण का उचित होना भाषा विकास के लिए आवश्यक है।   2. अनुबंधन का सिद्धांतः भाषा विकास में साहचर्य का बहुत महत्त्व है। यह उद्दीपक-अनुक्रिया (S-R) के बीच स्थापित होता है। स्किनर का मानना है। कि व्यवहार कार्यों की तरह भाषा का भी विकास होता है। उद्दीपक-अनुक्रिया के बीच अनुबंधन स्थापित होता है जो विकास भाषा के विकास में मददगार साबित होते हैं।   3. बैंडूरा का सिद्धांत: बैंडूरा अपने सामाजिक सीखने के सिद्धांत में अनुकरण पर बल

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लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त

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लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त     लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त              Lawrence Kohlberg Theory of                        Moral Development        परिचय :-    लॉरेन्स कोहलबर्ग (1927-1987) एक अमेरिकन मनोवैज्ञानिक थे। जीन पियाजे के नैतिक मुद्दों के सिद्धान्त से प्रभावित होकर ही उन्होंने ‘नैतिक न्याय’ को अपने अध्ययन क्षेत्र के रूप में चुना। उन्होंने 10 से 16 वर्ष तक के बालकों से लिए साक्षात्कार से प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण करके पियाजे के सिद्धान्त को विस्तारित, परिवर्तित तथा परिष्कृत किया। उन्होंने पाया कि बालक का विकास कुछ निश्चित अवस्थाओं में होता है, जो अवस्थाएँ सार्वभौमिक होती हैं।   कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के तीन स्तर बताए तथा प्रत्येक स्तर की दो-दो अवस्थाएं बताई हैं। कोहलबर्ग का मानना था कि नैतिक विकास में इन अवस्थाओं का क्रम निश्चित होता है। कोह्लबर्ग ने प्रत्येक स्तर में ‘आत्मन (Self) तथा ‘प्रत्याशाओं’ (Expectation) के संबंध की अभिव्यक्ति की है।       1. प्राक् रूढ़िगत नैतिकता का स्तर या पूर्व परंपरागत स्तर (Pre Conventional Level):    इस स्तर में ऐसे नियमों का पालन किया जाता है जिनका निर्माण अन्य द्वारा किया जाता है। मानक दूसरे लोग ही तय करते है। सही या गलत का कोई विचार नहीं होता ऐसे नियम का पालन पुरस्कार पाने या दंड से बचने के लिए किया जाता है।   अवस्था   (i) दंड एवं आज्ञाकारिता उन्मुखता (Punishment and obedience orientation) :    इस अवस्था में बच्चों में दंड से दूर रहने की प्रवृत्ति पायी जाती है। बच्चे अपने से बड़े या माता- -पिता के आज्ञा का पालन करते है दंड से बचने हेतु ।   (ii)साधनात्मक सापेक्षवादी उन्मुखता (Instrumental relavitist orientation) :    बच्चों में पुरस्कार पाने की अभिप्रेरणा प्रबल होती है, बालक सहभागिता या प्यार तात्कालिक पुरस्कार पाने के लिए छलयोजित व्यवहार भी करते हैं। यहाँ विनिमय या अदला-बदली का भाव देखा जाता है।         2. परंपरागत स्तर या रूढ़िगत नैतिकता का स्तर (Conventional level):    बालक दूसरे के नैतिक मानकों को अपने में आंतरीकृत करते हैं। उन मानकों के सही/ गलत का निर्णय करते हैं तथा उस पर अपनी सहमति बनाते हैं तथा अपनी आवश्यकता के साथ-साथ दूसरे की आवश्यकता का भी ध्यान रखते हैं।   अवस्था   (i) परस्पर एकरूप अभिमुखता   परंपरा को धारण करना समाज के नियम के अनुरूप व्यवहार करना समाज के नियम के अनुरूप नैतिकता होनी चाहिए समाज से अनुमोदन बच्चे पाना चाहते हैं तथा स्वयं को उत्तम लड़का, अच्छी लड़की कहलाना पसंद करते हैं।     (ii) अधिकार संरक्षण अभिमुखताः इसमें सामाजिक नियमों से आगे बढ़कर कानूनी नियम भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अब यह उम्मीद की जाती है कि सामाजिक तथा कानूनी नियम के अनुरूप नैतिकता होनी चाहिए।     (iii) आचरण स्वतः पूर्ण रूप से नियंत्रित होते हैं। अपने मूल्य को किशोर नैतिक सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में सुनिश्चित करते हैं। नैतिक विकास का यह स्तर नैतिकता का सबसे उच्च स्तर होत है। इसलिए, वास्तविक नैतिकता भी कहते हैं।   अवस्था   (i) सामाजिक अनुबंध उन्मुखता (Social contract orientation):  बालक उन वैयक्तिक अधिकार तथा नियम को महत्त्व देते हैं, जो लोकतांत्रिक रूप से मान्य होता है। बहुसंख्यक लोगों के कल्याण के हित को महत्त्व दिया जाता है।   (ii) सार्वभौमिक नीतिपरक उन्मुखता (Universal ethical principle orientation):  इस अवस्था में सार्वभौमिक नैतिक नियम को महत्त्व दिया जाता है। किशोर स्वयं ही नैतिक नियम को महत्त्व देते तथा अपनी निंदा से बचने का प्रयास करते हैं।     कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत का शिक्षा में महत्त्व   शिक्षक को बालक के व्यवहार को समझने में तथा अवस्था के ज्ञान से शिक्षक को इस बात की जानकारी होती है कि कुछ ऐसे व्यवहार है जो समय के साथ परिवर्तित होंगे उन्हें दंड देने की आवश्यकता नहीं है।   शिक्षक बालक में अनुशासन स्थापित करने, कदाचार मुक्त परीक्षा कराने, समाज या राष्ट्र के प्रति -अनुशासित रखने में मदद कर सकते हैं।         Important Topics 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻   लेव व्यगोत्स्की   जीन पियाजे   कर्ट लेविन   पॉवलव Pavlovs   थार्नडाइक का सिद्धान्त   मैस्लो का सिद्धांत     #CTET #CTET2022 #eductet #ctetsuccess CTET News CDP Important

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Lev Vygotsky

Lev Vygotsky Social and Cultural theory लेव वाइगोत्सकी सामाजिक सांस्कृतिक सिद्धान्त #ctet #ctet2024 #uptet #htet #stet #teaching #CDP #pedagogy

                  Lev Vygotsky  :लेव सिमकोविच वाइगोत्सकी (लेव वाइगोत्सकी)     Lev Semyonovich Vygotsky लेव वाइगोत्सकी   परिचय:-  लेव सिमकोविच वाइगोत्सकी (1896-1934) सोवियत रूस के एक मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने बालकों के सामाजिक विकास से सम्बन्धित एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उनके द्वारा प्रतिपादित इस संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त को सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है।   वायगोत्सकी का सामाजिक – सांस्कृतिक सिद्धांत Social and cultural theory of Lev Vygotsky   वायगोत्सकी ने अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में समाज व संस्कृति पर अत्यधिक बल डाला है। यही कारण है कि उनके सिद्धांत को ‘सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत’ भी कहा जाता है। वायगोत्सकी सामाजिक कारक व भाषा को महत्त्वपूर्ण मानते हैं तथा शिक्षक व वयस्क की भूमिका को भी स्वीकारते हैं। इनका मानना है कि ‘सहयोगात्मक अधिगम’ (collaborative learning) अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।   वायगोत्सकी ने कहा कि संज्ञानात्मक विकास एक अंतर्वैयक्तिक (Interpersonal) सामाजिक परिस्थिति में संपन्न होता है जिसमें बालकों को अपने वास्तविक विकास के स्तर अर्थात् जहाँ वे बिना किसी मदद के स्वयं कोई कार्य कर सकते हैं, से अलग उनके संभाव्य विकास के स्तर (अर्थात् जहाँ वे किसी की सहायता प्राप्त कर कोई कार्य कर सकते हैं) की ओर ले जाने का प्रयास किया जाता है। इन दोनों के बीच के अंतर को वायगोत्सकी ने समीपस्थ विकास का क्षेत्र (Zone of Proximal Development or ZPD) कहा है।   वायगोत्सकी का मानना था कि भाषा व चिंतन दोनों का विकास अलग-अलग होता है, बाद में कार्य करने के लिए दोनों मिल भी सकते हैं लेकिन संभावना कम है, परंतु बिना भाषा के चिंतन नहीं किया जा सकता है। इन्होंने ही भाषा की अवस्था बतायी, जो निम्नवत है   1. सहज अवस्था (Native Stage):  इस अवस्था में बालक कोई भी शब्द धीरे-धीरे आराम और आसानी से सीख लेता है। इसमें कोई चिंतन नहीं करता कि वह क्यों कर रहा है। इस अवस्था में अधिगम कराने के लिए चित्र का प्रयोग किया जाता है।   2. अहं केंद्रित अवस्था (Ego Centric Stage):  इस अवस्था में वह अपने आप को महत्त्वपूर्ण समझता है और अपनी बातों को दुहराते रहता है।   3. आंतरिक भाषण ( Inner Speech):  आत्म नियमन के लिए भाषा का उपयोग किया जाता है। बालक मन-मन में पढ़ने लगता है तथा सोचने लगता है।   Important Topics  👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻 जीन प्याजे का सिद्धांत Jean Piaget Theory   स्किनर का सिद्धांत Skinner Theory    कर्ट लेविन का सिद्धांत Kurt Lewins Theory   थार्नडाइक नियम / सिद्धांत Thorndikes Law  👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻     वायगोत्सकी ने चिंतन के लिए निम्न अवस्थाएं बताई हैं :-    1. एक सी वस्तुओं को इकट्ठा करना (Collection of same things) :-   एक जैसी वस्तुओं को इकट्ठा करता है और अन्य से भिन्नता स्थापित करने का ज्ञान प्राप्त करता है।   2. सृजनात्मक रूप से चिंतन (Thinking as a creativity):-  अपनी तरफ से भी कुछ चीजें जोड़ता है-प्रत्यक्षीकरण (perception)।   3. संप्रत्यात्मक चिंतन (Conceptual thinking):  इसमें सप्रत्यय को समझकर वह उत्तर देता है। इसके लिए भाषा जरूरी है।         वाइगोत्सकी के सिद्धान्त में खेल की भूमिका       Role of Play in Vygotsky’s Theory   वायगोत्सकी खेल को महत्त्वपूर्ण मानते हुए कहते हैं कि यह बालक के संज्ञानात्मक, संवेगात्मक तथा सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है, क्योंकि खेल व्यवहार को संगठित करता है तथा आत्म-नियंत्रण के विकास में सहायक सिद्ध होता है।   वाइगोत्सकी के अनुसार “खेल बच्चों के लिए निकट विकास क्षेत्र का भी निर्माण करते हैं। खेल में बच्चा हमेशा अपनी आयु से अधिक और अपने दैनिक व्यवहार के स्तर से ऊपर उठकर बर्ताव करता है। खेल के भीतर विकास की सारी प्रवृत्तियाँ सारभूत रूप से मौजूद रहती हैं। खेल और विकास के सम्बन्ध की तुलना शिक्षा और विकास के सम्बन्ध से की जा सकती है। खेल बालक के विकास का मुख्य स्रोत हैं और निकट विकास क्षेत्र की भी रचना करता है।   खेल की केवल विषय-वस्तु ही निकट विकास क्षेत्र को परिभाषित नहीं करती है। खेलने के लिए बच्चा जिस मानसिक प्रक्रिया में संलग्नित होता है वह निकट विकास क्षेत्र की रचना करती है। बच्चा निकट विकास क्षेत्र के उच्चतर स्तर पर काम कर सके इसके लिए कल्पित स्थितियों से प्राप्त भूमिकाएँ, नियम तथा प्रेरणा सहायक सिद्ध होते हैं। यदि हम खेल और खेल के बाहर की स्थितियों में बच्चे के व्यवहारों की तुलना करेंगे तो हमें निकट विकास क्षेत्र के उच्चतर तथा निम्नतर स्तर दिखाई देंगे।    खेल के माध्यम से बच्चा अपने व्यवहार को नियन्त्रित कर सकता है। यदि बच्चे को खेल का अनुभव नहीं मिलता तो उसके संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा सामाजिक विकास को हानि पहुँचती है। अतः उपरोक्त आधार पर हम कह सकते है कि खेल बच्चों के लिए निकट विकास क्षेत्र का निर्माण करने में सहायक होता है।   CTET News

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प्याजे का नैतिक विकास का सिद्धांत

Piaget theory of Moral Development प्याजे का नैतिक विकास का सिद्धांत #ctet2024

    Piaget theory of Moral Development प्याजे का नैतिक विकास का सिद्धांत   जीन पियाजे ने 1932 में एक किताब लिखी “The Moral Judgement of the Child” पियाजे का मानना था कि बच्चों के नैतिक निर्णय के विकास में एक निश्चित क्रम एवं तार्किक पैटर्न होता है जो बौद्धिक विकास से संबंधित होता है। Piagets Theory of Cognitive Development संज्ञानात्मक विकास  यहां पढ़ें संज्ञानात्मक विकास👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻   पियाजे के अनुसार–  ‘“नैतिक विकास न्याय के परिपक्व तथा स्वःस्फूर्त प्रत्ययों की प्राप्ति है जिसे बालक अपने को वातावरण के साथ अंतःक्रिया करते हैं, उन्हें परिवर्तित व परिमार्जित करते हैं। “ Piaget : नैतिक विकास की अवस्था 1. प्रतिमान हीनता (Anomy) यह अवस्था जन्म से 5 वर्ष तक होती है। इस अवस्था मे बालक सामाजिक बंधन, कानून, प्रतिबंध से अनभिज्ञ होते हैं। बालक के व्यवहार का मुख्य आधार सुख-दुख का भाव होता है। 2. परायत्त – सत्ता (Heteronomy) यह अवस्था 5 वर्ष से 8 वर्ष की अवस्था होती है । बालक को उसके उचित आचरण करने का प्रशिक्षण दिया जाता है और नैतिक विकास को पुरस्कार तथा दंड से प्रभावित किया जाता है। नैतिक विकास बाह्य सत्ता द्वारा नियंत्रित होता है। 3. परायत्तता – पारस्परिकता (Hetrocity Reciprocity):-  इस अवस्था मे बालको की उम्र 9 वर्ष से 13 वर्ष होती है। इस समय बालक अपने समान आयु वर्ग व वयस्कों के साथ सहयोग पर बल तथा उनके विचारों से प्रभावित होते है। बालक स्वयं यह समझने लगता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं? लेकिन इसका वो आधार दूसरे की भावना को बनाता है; जैसे-मेरे इस व्यवहार से उनको दुःख न पहुँच जाए। 4. स्वायत्तता किशोरावस्था (Autonomy Adolescence) :-  इस अवस्था मे बालको की उम्र 13 वर्ष से 18 वर्ष होती है। किशोर में पूर्ण रूप से सोचने-समझने की क्षमता विकसित हो चुकी होती है। वे अपने व्यवहार के लिए स्वयं उत्तरदायी होते हैं। किशोर स्वयं के लिए वयस्कों सा सम्मान चाहते हैं। पियाज ने नैतिक विकास की अवस्था को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण विकास काल में नैतिकता के तीन स्तर बताए हैं :-  1. नैतिक यर्थाथता (Moral Realism) :- बालक बाध्यता स्वरूप, नैतिक मानकों को स्वीकार करता है तथा उनको आचरण में लाता है परंतु स्वयं की इच्छा से नहीं बल्कि दबाव स्वरूप इन नैतिक प्रतिमान को स्वीकार करता है। नैतिक यथार्थता के दो मूल स्रोत बताए गए हैं- बालकों की बौद्धिक संरचना, वातावरण से प्राप्त अनुभव। 2. नैतिक समानता (Moral Equality) :-  बालक परस्पर सहमति के आधार पर नियमों को बनाते है। बालक सहयोगात्मक खेल अधिक पसंद करते हैं। 3. नैतिक सापेक्षिता (Moral Relativism) :-  बिना किसी बाहरी दबाव के न्याय के आदर्श का अनुसरण किया जाता है लेकिन इसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी होता है। किशोर स्वयं के नियम बनाना शुरू कर देते हैं। Most important Topics for #CTET #CDP 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻   Pavlovs-classical-conditioning-theory Thorndikes-law-of-learning-part-1 Exigency-hierarchy-theory  Motivation-and-learning  Gender-issues-in-social-construction Trending News  CTET                  

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Piaget Theory of Cognitive Development पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त ctet success eductet

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         पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त Piaget’s Theory of Cognitive Development    जीन पियाजे ने बालकों के संज्ञानात्मक विकास की व्याख्या अपने सिद्धान्त को चार मुख्य अवस्थाओं में बाँटकर की है। इन्ही अवस्थाओं से गुजरकर बालक का संज्ञानात्मक विकास होता है। ये अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं|       पियाजे संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ:-      1. ज्ञानात्मक क्रियात्मक या संवेदी पेशीय अवस्था (Sensory-motor stage)   यह अवस्था जन्म से दो साल तक होती है। इस अवस्था में शिशु अपनी आँखों, कानों, हाथों और अन्य संवेदी प्रेरक उपकरणों के माध्यम से सोचता है। इस अवस्था में शिशुओं का संज्ञानात्मक विकास 6 उप-अवस्थाओं से होकर गुजरता है।   (i) प्रवर्तक क्रियाओं की अवस्था :-  पहली उप-अवस्था जन्म से 30 दिन तक होती है। इसे प्रतिवर्त्त क्रिया अवस्था भी कहते हैं क्योंकि इस अवस्था में बालक मात्र प्रतिवर्त्त क्रियाएं करता है; जैसे किसी चीज को चूसना आदि।   (ii) मुख्य वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था :-  दूसरी उप-अवस्था 1 माह से लेकर 4 माह तक की अवधि की होती है। इस अवस्था को प्रमुख वृत्तीय प्रतिक्रिया की अवस्था कहते हैं। प्रमुख इसलिए कहते है कि उनके शरीर की प्रमुख प्रतिवर्त्त क्रियाएँ है और वृत्तीय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उन्हें दोहराया जाता है।   (iii) गौण वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था :-  तीसरी उप- अवस्था 4 माह से लेकर 8 माह तक की अवधि की होती है। इस अवस्था में शिशु वस्तुओं को छूने तथा उन्हें इधर-उधर उलट-पलट करता है।   (iv) गौण स्कीमैटा से समन्वय की अवस्था :-  चौथी उप-अवस्था 8 माह से 12 माह तक इस अवस्था में शिशु वयस्कों का अनुकरण करना प्रारंभ कर देते है; जैसे नाना कैसे हँसते है, बड़े पापा कैसे करते हैं, आदि।   (v) तीसरी वृत्तीय प्रतिक्रियाओ की अवस्था :-  पाँचवीं उप-अवस्था 12 माह से 18 माह तक की होती है। इसमें प्रयत्न व त्रुटि. के आधार पर सीखना शुरू कर देता है जानने की प्रबलता बढ़ जाती है।   (vi) मानसिक संयोग द्वारा नवीन साधनों की खोज की अवस्था :- छठी उप-अवस्था 18 माह से 24 माह की अवधि होती है। इस अवस्था में बालक चिंतन करना प्रारंभ कर देता है। (यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि वह बिना भाषा के ज्ञान के चिंतन करता है) बालक में वस्तु स्थायित्व का गुण विकसित हो जाता है अर्थात् वस्तु को उसके सामने से हटा देने पर भी वो यह जानता है कि वस्तु का वजूद है जबकि वह प्रारंभ में यह समझता था कि वस्तु यदि सामने से हट गयी तो वजूद उसका खत्म हो गया। यही कारण है कि इस अवस्था में बालक के सामने से खिलौने हटाने पर वह उसके पाने की जिद करता रहता है।      Jean Piaget Concept (संप्रत्यय)   यहां से पढ़े प्रथम भाग👆🏻👆🏻👆🏻 part 1 read here        2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था ( Preoperational Stage )     संज्ञानात्मक विकास की इस अवस्था की अवधि 2 से 7 वर्ष के मध्य की होती है। बालक के विकास की इस अवधि को प्राय: प्रारम्भिक बाल्यावस्था के नाम से भी जाना जाता है। इस अवस्था में बालकों की मानसिक प्रतीक निर्माण प्रक्रियाओं में असाधारण परिवर्तन होता है। पियाजे ने इस अवस्था को मुख्य दो भागों में बाँटा है, जो निम्न हैं     (i) पूर्व वैचारिक अवस्था ( Pre Conceptual Period ) :-    इस अवस्था की अवधि 2 से 4 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बालक वस्तुओं, शब्द चिन्हों आदि के विषय में अपना मानसिक चिन्तन विकसित करने लगता है। इस अवस्था में बालक में आत्मकेंद्रित का भाव आ जाता है। स्वयं को महत्त्वपूर्ण समझता है उसे यह लगता है कि सूर्य, चंद्रमा आदि उसके पीछे चलते है। बालक में संकेत, भाषा, शब्द तेजी से विकसित होते हैं। इस अवस्था में बालक द्वारा किए जाने वाले कार्य (लाक्षणिक) मुख्यत: अनुकरण तथा खेल के माध्यम से किए जाते हैं।      (ii) अन्तदर्शी अवस्था ( Intuitive Period ) :-    इस अवस्था की अवधि 4 से 7 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बालक का चिन्तन एवं तर्कणा पहले से अधिक परिपक्व हो जाती हैं। परिणामस्वरूप वह साधारण मानसिक क्रियाओं जैसे जोड़, घटाव गुणा व भाग आदि में सम्मिलित तो हो जाता है परन्तु इन मानसिक क्रियाओं के पीछे छिपे नियमों को समझ नहीं पाता है अर्थात् बालक यह तो बता देता है कि 3 × 3 = 9, लेकिन बालक यह बताने में असमर्थ होता है कि 9 + 3 = 3 होगा।       ____ यहां से पढ़े 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻   स्किनर Skinner (important)    Thorndikes-law-of-learning     3. मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था ( Concrete Operational       Stage ) :-    इस अवस्था की अवधि 7 से 11 वर्ष के मध्य की होती है। संज्ञानात्मक विकास की इस अवस्था में बालक का चिन्तन एवं तर्कणा पहली अवस्था (पूर्व संक्रियात्मक अवस्था) की तुलना में अधिक क्रमबद्ध तथा तर्कसंगत हो जाता है, साथ ही उसके चिन्तन में पलटावी गुण भी आ जाता है। इस अवस्था में बालक में संरक्षण, सम्बन्ध तथा वर्गीकरण संप्रत्यय का गुण भी विकसित हो जाता है। परिणामस्वरूप बालक वस्तुओं के गुणों के आधार पर उन्हें विभिन्न वर्गों या उपवर्गों में विभाजित करने लगता है। अतः उपरोक्त आधार पर हम कह सकते हैं कि इस अवस्था में बालक की विचार प्रक्रिया छोटे बच्चों के बजाय बड़ों से अधिक मिलने लगती है।     4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था ( Formal       Operational Stage ) :-    इस अवस्था की अवधि 11 से 15 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बालक में अमूर्त तथा वैज्ञानिक ढंग से सोचने की क्षमता विकसित हो जाती है अर्थात् उनका चिन्तन अधिक लचीला तथा प्रभावी हो जाता है, साथ ही चिन्तन में क्रमबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। जहाँ मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था में बालक वास्तविक संसार के साथ संक्रियाएँ करता है, वहीं औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था में वह संक्रियाओं के साथ ही संक्रिया कर आन्तरिक चिन्तन के माध्यम से व्यापक रूप से तार्किक नियम गढ़ने में समर्थ हो जाता है। इस अवस्था पर शिक्षा के स्तर का भी प्रभाव पड़ता है। जिन बालकों में शिक्षा स्तर की काफी नीचा होता है उनमें औपचारिक संक्रियात्मक चिंतन भी काफी कम होता है जिनमें ज्यादा होगा उनमें चिंतन भी ज्यादा होगा।

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Jean Piaget Concept जीन पियाजे का प्रमुख संप्रत्यय #CTET ctet success eductet

Jean Piaget Concept जीन पियाजे का प्रमुख संप्रत्यय #CTET2024

                Jean Piaget Concept  जीन पियाजे का प्रमुख संप्रत्यय  Jean Piaget परिचय जीन पियाजे (Jean Piaget) एक स्विस मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने बालक के मानसिक विकास के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जन्म 9 अगस्त 1896 को हुआ था और वे 16 सितंबर 1980 को निधन हो गए। पियाजे के सिद्धांतों ने शिक्षा, मनोविज्ञान और विकासात्मक अध्ययन के क्षेत्र में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। ये स्विस मनोवैज्ञानिक थे। मूल रूप से पियाजे जीव वैज्ञानिक थे। जब ये अल्फ्रेड बिने के प्रयोगशाला में बुद्धि परीक्षणों पर साथ कार्य कर रहे थे तभी संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत को भौतिक विकास का सिद्धांत भी कहते हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त की व्याख्या करने से पहले इससे सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय की व्याख्या करना उचित है। मानसिक विकास के क्षेत्र में गहरा प्रभाव पड़ा है और उनके सिद्धांतों का पालन आज भी शिक्षा, मनोविज्ञान और बच्चों के विकास के अध्ययन में किया जाता है। उनकी कृतियाँ जैसे “The Child’s Conception of the World” और “The Origins of Intelligence in Children” महत्वपूर्ण पाठ्यक्रमों का हिस्सा बन गई हैं।     प्रमुख संप्रत्यय   1. अनुकूलनः अनुकूलन की प्रवृत्ति बालक में जन्मजात होती है। अनुकूलन का अर्थ है-वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना। यह दो तरीके से होता है   (i) आत्मसातीकरण (Assimilation)   (ii) समायोजन ( Accommodation)     (i) आत्मसातीकरण:  जब कोई बालक नई परिस्थिति में होता है तब वह पूर्व स्थापित प्रतिरूप (Pattern) के आधार पर व्यवहार करता है और यदि यह प्रतिरूप (pattern) सफल हो जाता है तो वह इसमें कोई परिवर्तन नहीं लाएगा। यही आत्मसातीकरण है। साधारण शब्दों में कहें तो पूर्व की परिस्थिति में प्रयोग किए गए व्यवहार को नवीन परिस्थिति में प्रयोग करने पर सामंजस्य स्थापित हो जाता है तो उस व्यवहार में कोई परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती है।     (ii) समायोजनः  नवीन परिस्थिति में पूर्व किए गए व्यवहार का प्रयोग कर यदि सामंजस्य स्थापित नहीं होता है तब पूर्व किए गए व्यवहार के प्रतिरूप में बदलाव या परिवर्तन बालक करता है इसे ही समायोजन कहते हैं।   Skinners-operant-conditioning-theory   Kurt-lewins-regional-theory-of-learning     2. साम्यधारण (Equilibration):  जब बालक न तो आत्मसातीकरण द्वारा या समायोजन द्वारा सामंजस्य या अनुकूलन स्थापित कर पाता है तब वह आत्मसातीकरण व समायोजन के बीच संतुलन स्थापित करता है इसी प्रक्रियां को साम्यधारण कहते हैं।     3. संरक्षण (Conservation):  यह ऐसी प्रक्रिया है 1. जिसके द्वारा बालक में एक तरफ वातावरण के परिवर्तन तथा स्थिरता में अंतर करने की क्षमता और दूसरी तरफ वस्तु के रंग-रूप में परिवर्तन तथा उसके तत्व में परिवर्तन के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित होती है।     4. संज्ञानात्मक संरचना (Cognitive structure):  जीन पियाजे ने मानसिक योग्यताओं के सेट (set) को संज्ञानात्मक संरचना की संज्ञा दी है। भिन्न-भिन्न उम्र में बालकों की संज्ञानात्मक संरचना में भिन्नता होती है। उदाहरण संज्ञानात्मक संरचना के आधार पर ही एक 10 वर्ष के बालक व 4 वर्ष के बालक के व्यवहार में अंतर समझा जाता है।     5. मानसिक संक्रिया (Mental Operation):  जब बालक के सामने कोई समस्या आती है और वह उसके समाधान हेतु चिंतन करने लगता है, तो वह मानसिक संक्रिया करते समझा 7 जाता है।     6. स्कीम्स (Schemes ):  व्यवहार के संगठित पैटर्न जिसे बार-बार दोहराया जाता है स्कीम्स कहा जाता है, जैसे- बालक स्कूल जाते वक्त ड्रेस पहनता है या जूता पहनता है। वह उसी तरह पहनता है, चाहे उसका ध्यान उस वक्त वहाँ पर न हो क्योंकि व्यवहार इतना संगठित रूप में हो चुका है कि वह उसी तरह कार्य को संपादित करता है।     7. स्कीमा (Schema):  ऐसी मानसिक संरचना जिनका सामान्यीकरण संभव हो।     8. विकेंद्रण (Decentering):  यह यथार्थ चिंतन से संबंधित है। बालक किसी समस्या के समाधान के संबंध में किस सीमा तक वास्तविक रूप में सोच विचार करता है। इस संप्रत्यय का विपरीत आत्मकेंद्रण (ego centric) है। प्रारंभ में बालक आत्मकेंद्रण ढंग से सोचता है और बाद में उम्र बढ़ने पर विकेंद्री ढंग से सोचने लगता है।     9. पारस्परिक क्रिया:  पियाजे के अनुसार बच्चों में वास्तविकता को समझने तथा उसकी खोज करने की क्षमता न केवल बालकों की परिपक्वता और न ही केवल उनके शिक्षण पर निर्भर करती है बल्कि दोनों की पारस्परिक क्रिया पर आधारित है।       सिद्धांत  यहां से पढ़े और पसंद आये तो शेयर भी करे 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻   1. संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत   2. Jean Piaget Moral Development Theory नैतिक विकास का सिद्धांत    CTET UPDATES   Trending News  

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स्किनर का क्रिया-प्रसूत का सिद्धान्त Skinner’s Operant Conditioning Theory ctet success eductet

स्किनर का क्रिया-प्रसूत का सिद्धान्त Skinner’s Operant Conditioning Theory CDP #CTET2024

          स्किनर का क्रिया-प्रसूत का सिद्धान्त    स्किनर द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त साधानात्मक अनुबन्धन पर आधारित है। साधानात्मक अनुबन्धन में प्रयोज्य के सीखने के व्यवहार का अध्ययन सक्रिय रूप से किया जाता है। इसी आधार पर उनके इस सिद्धान्त को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। जैसे :-      कार्यात्मक अनुबन्धन का सिद्धान्त नैतिक अनुबन्धन का सिद्धान्त • सक्रिय अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धान्त क्रिया-प्रसूत अनुबन्धन का सिद्धान्त स्किनर के अनुसार, कुछ अनुक्रिया (व्यवहार) स्वाभिक रूप से प्राणी द्वारा किए जाते हैं। उन्होंने अपने सिद्धान्त की व्याख्या दो प्रकार की अनुक्रियाओं के माध्यम से की है जिनका विवरण निम्नवत् है:-   (i) प्रतिवादी अनुक्रिया (ii) क्रिया-प्रसूत अनुक्रिया प्रतिवादी अनुक्रिया:-  यह अनुक्रिया एक स्पष्ट उद्दीपन द्वारा उत्पन्न होती है जिसका स्वरूप अनैच्छिक होता है। जैसे कुत्ते के द्वारा भोजन देखकर लार का स्राव होना ।  क्रिया-प्रसूत अनुक्रिया:-  यह अनुक्रिया एक अस्पष्ट उद्दीपन द्वारा उत्पन्न होती है जिसका स्वरूप ऐच्छिक होता है। जैसे बात चीत करना, टहलना आदि । Some important Topics of CDP Pavlovs-classical-conditioning-theory   Thorndikes-law-of-learning-part-1   Gender-issues-in-social-construction स्किनर Skinner’s Operant Conditioning Theory This hypothesis propounded by Skinner depends on the restrictive agreement. The learning conduct of the student is effectively concentrated on in relevant contracting. On this premise his hypothesis is called by various names. like :- Hypothesis of Functional Contract Theory of Moral Contracting • Standard of Active Adapted Response • Hypothesis of verbal contractility According to Skinner, certain reactions (ways of behaving) are performed normally by the creature. He has made sense of his hypothesis through two sorts of responses, whose subtleties are as per the following:-  (I) respondent reaction (ii) obstetric reaction   Respondent Response:- This reaction is created by an unequivocal upgrade which is compulsory in nature. Like discharge of spit in the wake of seeing food by canine. Activity attentive reaction:- This reaction is produced by a vague boost whose nature is deliberate. Like talking, strolling and so on. Important Topics  👇👇👇👇👇👇👇👇   Thorndikes-law-of-learning    Socialization-process समाजीकरण की प्रक्रिया    Evaluation-of-learning | मूल्यांकन   individual-difference | व्यक्तिक विभिन्नता     CTET LATEST UPDATE  Trending News  CTET Notes            

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कर्ट लेविन का सीखने का क्षेत्रीय सिद्धान्त Kurt Lewin’s Regional Theory of Learning ctet success eductet

कर्ट लेविन का सीखने का क्षेत्रीय सिद्धान्त Kurt Lewin’s Regional Theory of Learning CTET2024

          कर्ट लेविन का सीखने का क्षेत्रीय सिद्धान्त  कर्ट लेविन द्वारा प्रतिपादित सीखने का क्षेत्रीय सिद्धान्त गेस्टाल्ट सिद्धान्त के ही समान है परन्तु यह सिद्धान्त इससे थोड़ा-सा भिन्न है क्योंकि यह अनुभव के स्थान पर व्यवहार को अधिक महत्त्व देता है तथा मानवीय अभिप्रेरण पर भी बल देता है। कर्ट लेविन ने अपने मत का आधार वातावरण में व्यक्ति की स्थिति को बताया। लेविन ने जीवन-स्थल के आधार पर व्यक्ति के अनुभवों की व्याख्या की है। उसके अनुसार जीवन-स्थल वह वातावरण है जिसमें व्यक्ति रहता है और उससे प्रभावित होता है। किसी व्यक्ति का यह जीवन-स्थल मनोवैज्ञानिक शक्तियों पर निर्भर करता है। लेविन के अनुसार सीखना कोई अनोखी क्रिया नहीं है। उसने बताया कि सीखने की क्रिया को समझने के लिए हमें केवल यह समझना होता है कि जीवन-स्थल का नव संगठन किस प्रकार होता है तथा मनोवैज्ञानिक संसार की संरचना किस प्रकार होती है? अतः सीखना हमारे अनुभवों या जीवन-स्थल की संरचना में परिवर्तन लाने से होता है। लेविन ने आगे बताया कि वास्तव में, सीखना वातावरण का संगठन है। कर्ट लेविन के क्षेत्रीय सिद्धान्त के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रत्यय निम्न है:- क्षेत्र :- लेविन के अनुसार क्षेत्र का तात्पर्य मानव के उस सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिक जगत से है जिसमें वह रहता है तथा किसी समय विशेष में भ्रमण करता है। जीवन विस्तार :-  जीवन-विस्तार का आशय उस वातावरण से है जिसमे मनुष्य है और उस वातावरण का प्रभाव व्यक्ति पर निरन्तर पड़ता रहता है। वातावरण से तात्पर्य प्राकृतिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक वातावरण है जिसमें व्यक्ति लगातार संघर्ष करता रहता है और उससे प्रभावित होता रहता है।  बाह्य आवरण :-  बाह्य आवरण से आशय व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक वातावरण के बाहर चारों ओर रहता है। यह प्राणी से सम्बन्धित वातावरण के उन पक्षों से निर्मित होता है, जिसका प्रत्यक्षीकरण व्यक्ति स्वयं नहीं कर पाता किन्तु उस व्यक्ति का अध्ययन करने वाले लोग उसका प्रत्यक्षीकरण कर सकते हैं।  तलरूप:-  लेविन ने तलरूप का प्रत्यय रेखागणित से लिया है जिसमें अन्दर बाहर तथा सीमा के प्रत्ययों की विवेचना की जाती है।  अवरोध:- कर्ट लेविन ने इसे वातावरण का एक गत्यात्मक पहलू बताया है जो व्यक्ति के लक्ष्य या उद्देश्य तक पहुँचने के मार्ग में आ खड़ा होता है तथा उसके आगे बढ़ने की गति को अवरुद्ध कर देता है।   Some important Topics of CDP Pavlovs-classical-conditioning-theory   Thorndikes-law-of-learning-part-1   Gender-issues-in-social-construction                  Kurt Lewin’s Regional                Theory of Learning      The regional theory of learning propounded by Kurt Lewin is similar to the Gestalt theory, but this theory is slightly different from it because it gives more importance to behavior rather than experience and also emphasizes on human motivation. Kurt Levin based his opinion on the position of the individual in the environment. Levine has explained the experiences of the individual on the basis of place of life. According to him the place of life is the environment in which a person lives and is affected by it. This place of life of a person depends on the psychological forces. According to Levine, learning is not a unique activity. He said that in order to understand the process of learning, we only have to understand how the new organization of the living space takes place and how the psychological world is structured. Thus learning takes place by bringing about changes in the structure of our experiences or living space. Levine further pointed out that in fact, learning is the organization of the environment. कर्ट लेविन : Some of the important concepts of Kurt Lewin’s Regional :- Regional theory are as follows. According to Lewin, the field refers to the whole psychological world of man in which he lives and travels at a particular time. Life Extension:-  Life-extension refers to the environment in which human beings are and the extent of that environment. The effect keeps on falling on the person. Environment means natural, social and psychological environment In which a person constantly struggles and keeps getting affected by it.  Outer cover :- Outer cover refers to the surroundings outside the psychological environment of the individual. It is formed from those aspects of the environment related to the animal, which the person himself is not able to perceive, but the people who study that person can perceive him. Topography:-  Levin has taken the concept of plane form from geometry, in which the concepts of inside, outside and limit are considered. Obstacles :- Kurt Levin has described it as a dynamic aspect of the environment that stands in the way of a person reaching his goal or objective and impedes his progress   Dalton-method-importent-for-ctet Important CTET Topic  CTET LATEST UPDATES                      

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ऊसूबेल के सीखने का सिद्धान्त | Ausubels's Theory of Learning ctet success eductet

ऊसूबेल के सीखने का सिद्धान्त | Ausubels’s Theory of Learning #ctet2024

                 ऊसूबेल के सीखने का सिद्धान्त    डेविड ऊसूबेल ने संज्ञान द्वारा सीखने पर आधारित इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया था। इसको संज्ञानात्मक सिद्धान्त इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस सिद्धान्त का मूल उद्देश्य सीखते समय व्यक्ति में क्या होता है, का वर्णन करना है। इस सिद्धान्त में मूल रूप से यह बताने की कोशिश की गई है कि सीखने की प्रक्रिया में जब नई विषय-वस्तु को शिक्षार्थी अपने पूर्व ज्ञान के साथ जोड़ते हैं तो उस नई विषय-वस्तु का क्या होता है? इस सिद्धान्त में शिक्षार्थी के पूर्व ज्ञान के भण्डार को ‘संज्ञानात्मक संरचना’ कहा गया है और जब शिक्षार्थी इस संज्ञानात्मक संरचना में नई विषय-वस्तु से सीखी गई अनुभूतियों को सार्थक ढंग से जोड़ता है या सम्बन्धित करता है, तो उसे उसका आत्मसात्करण होता है।   ऊसूबेल ने अपने सीखने के सिद्धान्त में सीखने के निम्नांकित चार प्रकार का वर्णन किया है:- रटकर सीखना विषय-वस्तु को बिना समझे हू-ब-हू सीखना ।  अर्थपूर्ण सीखना विषय-वस्तु को समझ कर आत्मसात करना। अभिग्रहण सीखना विषय-वस्तु का हू-ब-हू तथा समझकर सीखना। अन्वेषण सीखना विषय-वस्तु में से नये विचार की खोज कर उसे सीखना।   Very important topics  Pavlovs-classical-conditioning-theory Thorndikes-law-of-learning-part-1 Exigency-hierarchy-theory  Motivation-and-learning  Gender-issues-in-social-construction  CTET Latest news  CTET Notes  Tranding News        Ausubels’s Theory of Learning     This theory based on learning by cognition was propounded by David Usubel. It is called cognitive theory because the basic purpose of this theory is to describe what happens in a person while learning. This theory basically tries to explain that in the process of learning, when learners add a new subject matter with their previous knowledge, what happens to that new content? In this theory, the store of prior knowledge of the learner is called ‘cognitive structure’ and when the learner meaningfully connects or relates the learned experiences with the new subject matter in this cognitive structure, then it is assimilated.     Usubel has described the following four types of learning in his Theory of Learning.   Learning by rote learning without understanding the subject matter.    Meaningful learning To understand and assimilate the subject matter.   Learning to Reception Learning through and understanding of the subject matter.    Learning to Explore by discovering and learning new ideas out of the conten          

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