CTET SUCCESS

Child Development & Pedagogy (CDP)

The CDP category focuses on child development and teaching methodology. It is one of the most important subjects for CTET, STET, and other teacher exams. This section includes theory, MCQs, and practice sets. All content is prepared according to the latest exam syllabus.

Cognition & Emotion संज्ञान और संवेग #ctet #ctetsuccess #eductet #cdp #pedagogy

 संज्ञान Cognition संज्ञान का अर्थ समझ या ज्ञान होता है। शैक्षणिक प्रक्रियाओं में अधिगम का मुख्य केन्द्र संज्ञानात्मक क्षेत्र होता है। इस क्षेत्र में अधिगम उन मानसिक क्रियाओं से जुड़ी होती है जिनमें पर्यावरण से सूचना प्राप्त की जाती है। इस प्रकार इस क्षेत्र में अनेक क्रियाएँ होती हैं जो सूचना प्राप्ति से प्रारम्भ होकर शिक्षार्थी के मस्तिष्क तक चलती रहती हैं। ये सूचनाएँ सुनने या देखने के रूप में होती हैं। संज्ञान में मुख्यतः ज्ञान, समग्रता, अनुप्रयोग विश्लेषण तथा मूल्यांकन पक्ष सम्मिलित होते हैं।  बालक एक समस्या – समाधान और वैज्ञानिक अन्वेषण  बालों में संज्ञानात्मक विकास Cognitive Development in Children  संज्ञानात्मक विकास का तात्पर्य बच्चों के सीखने और सूचनाएँ एकत्रित करने के तरीके से है। इसमें अवधान में वृद्धि प्रत्यक्षीकरण, भाषा, चिन्तन, स्मरण शक्ति और तर्क शामिल हैं। पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत के अनुसार हमारे विचार और तर्क अनुकूलन के भाग हैं। संज्ञानात्मक विकास एक निश्चित अवस्थाओं के क्रम में होता है। पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाओं का वर्णन किया है संवेदी-गतिक अवस्था (जन्म से 2 वर्ष) पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2 से 7 वर्ष)  प्रत्यक्ष संक्रियात्मक अवस्था (7 से 11 वर्ष) औपचारिक-संक्रियात्मक अवस्था (11 + वर्ष) प्रारम्भिक बाल्यकाल (2 से 6 वर्ष) में संज्ञानात्मक विकास Cognitive Development in Infancy (2 to 6 Years)  इस काल में बच्चे, शब्द जैसे प्रतीकों, विभिन्न वस्तुओं, परिस्थितियों और घटनाओं को दर्शाने वाली प्रतिमाओं के प्रयोग में अधिक प्रवीण हो जाते हैं। स्कूल जाने तक बच्चों की शब्दावली पर्याप्त अच्छी हो जाती है। वास्तव में बच्चे विभिन्न सन्दर्भों में अन्य भाषाएँ सीखने में अधिक ग्रहणशील हो जाते हैं। अनेक बार वे द्विभाषी या बहुभाषी के रूप में विकसित होते हैं। वे एक भाषी बच्चों की अपेक्षा भाषा की अच्छी समझ वाले होते हैं।  प्रारम्भिक बाल्यकाल में स्थायी अवधान में वृद्धि हो जाती है। एक 3 वर्ष का बच्चा चित्रांकनी से रंग भरने, खिलौने से खेलने या 15-20 मिनट तक टेलीविजन देखने की जिद कर सकता है। इसके विपरीत एक 6 वर्ष का बच्चा किसी रोचक कार्य पर एक घण्टे से अधिक कार्य करता देखा जा सकता है।  बच्चे अपने संविधान में अधिक चयनात्मक हो जाते हैं। परिणामस्वरूप उनके प्रत्यक्षात्मक कौशल भी उन्नत होते हैं। चिन्तन और अधिक तर्कपूर्ण हो जाता है और याद रखने की क्षमता और जानकारी की प्रक्रिया भी उन्नत होती है। वातावरण से अन्तःक्रिया द्वारा बच्चा सामाजिक व्यवहार के सही नियम सीखता है जो उसे विद्यालय जाने के लिए तैयार करते हैं। प्रारम्भिक बाल्यकाल, 2 से 6 वर्ष में बच्चा पूर्व क्रियात्मक अवस्था द्वारा प्रगति करता है।  पूर्व-क्रियात्मक अवस्था की 2 उप-अवस्थाएँ होती हैं :-  प्रतीकात्मक क्रिया (2 से 4 वर्ष) अन्तःप्रज्ञा विचार (4 से 7 वर्ष) प्रतीकात्मक क्रिया, उप-अवस्था में, बच्चे वस्तुओं का मानसिक प्रतिबिम्ब बना लेते हैं और उसे बाद में उपयोग करने के लिए सम्भाल कर रख लेते हैं। उदाहरण के लिए, बच्चा एक छोटे कुत्ते की आकृति बनाए या उससे खेलने का नाटक करे, जोकि वहाँ उपस्थित ही नहीं है। बालक उन लोगों के विषय में बात कर सकते हैं जो यात्रा कर रहे हैं या जो कहीं अन्य स्थान पर रहते हों। वे उन स्थानों का भी रेखाचित्र बना सकते हैं, जो उन्होंने देखे हैं, साथ ही साथ अपनी कल्पना से नये दृश्य और जीव भी बना सकते हैं। बच्चे अपनी वस्तुओं के मानसिक प्रतिबिम्ब का भी खेल में भूमिका निभाने के लिए उपयोग कर सकते हैं। बालक कैसे चिंतन करते हैं   बालक कैसे सोचते है और सीखते है ? लिंक पर क्लीक कर CTET  के इस महत्वपूर्ण टॉपिक को समझे और किसी  शिक्षण परीक्षा में प्रश्नो के आसानी से जवाब दे।    मध्य बाल्यकाल में संज्ञानात्मक विकास Cognitive Development in Childhood  मध्य बाल्यकाल में बच्चे उत्सुकता से भरे होते हैं और बाहरी वस्तुओं को ढूँढने में उनकी रुचि होती है। स्मरण और सम्प्रत्यय ज्ञान में हुई वृद्धि तर्कपूर्ण चिन्तन को तात्कालिक स्थिति के अतिरिक्त सहज बनाती है। बच्चे इस अवस्था में संवेदी क्रियाओं में भी व्यस्त हो जाते हैं जैसे- संगीत, कला और नृत्य एवं रुचियों की अभिवृत्ति को रुचियों का भी विकास इस अवस्था में हो जाता है। पियाजे के सिद्धांत में, मध्य बाल्यकाल में इन्द्रयगोचर सक्रियात्मक अवस्था की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-  तार्किक नियमों को समझना। स्थानिक तर्क में सधार। तार्किक चिंतन, यथार्थ और इन्द्रियगोचर स्थितियों तक सीमित।  मध्य बाल्यकाल में भाषा विकास कई तरीकों से प्रगति करता है। नये शब्द सीखने से अधिक, बच्चे जिन शब्दों को जानते हैं, उनकी अधिक प्रौढ़ परिभाषा सीख लेते हैं। वे शब्दों के मध्य सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं। समानार्थी और विपरीतार्थी शब्दों को और उपसर्ग एवं प्रत्यय जोड़ने पर शब्दों के अर्थ कैसे बदल जाते हैं, को भी समझ लेते हैं। संवेग Emotion संवेग’ अंग्रेजी भाषा के शब्द इमोशन का हिन्दी रूपान्तरण है। इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘इमोवेयर’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है ‘उत्तेजित होना। इस प्रकार संवेग’ को व्यक्ति की ‘उत्तेजित दशा’ कहते हैं। इस प्रकार संवेग शरीर को उत्तेजित करने वाली एक प्रक्रिया है। मनुष्य अपनी रोजाना की जिन्दगी में सुख, दुःख, भय, क्रोध, प्रेम, ईर्ष्या, घृणा आदि का अनुभव करता है। वह ऐसा व्यवहार किसी उत्तेजनावश करता है। यह अवस्था संवेग कहलाती है। वुडवर्थ के अनुसार “संवेग, व्यक्ति की उत्तेजित दशा है।”  ड्रेवर के अनुसार “संवेग, प्राणी की एक जटिल दशा है, जिसमें शारीरिक परिवर्तन प्रबल भावना के कारण उत्तेजित दशा और एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करने की प्रवृत्ति निहित रहती है”। जे.एस.रॉस के अनुसार “संवेग, चेतना की वह अवस्था है, जिसमें रागात्मक तत्व की प्रधानता रहती है।” जरशील्ड के अनुसार “किसी भी प्रकार के आवेश आने, भड़क उठने तथा उत्तेजित हो जाने की अवस्था को संवेग कहते हैं।” सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे समाज के निर्माण लैंगिक मुद्दे और परेशानियों को समझने क लिए लिंक  माध्यम से अध्ययन कीजिये। इस टॉपिक से प्रायः 3 से 6  प्रश्न पूछे जाते है।  संवेग के प्रकार Types of Emotion संवेगों का सम्बन्ध मूल प्रवृत्तियों से होता है। चौदह मूल प्रवृत्तियों के चौदह ही संवेग के हैं, जो इस प्रकार है :-  भय वात्सल्य घृणा कामुकता करुणा व दुःख आत्महीनता आत्माभिमान अधिकार भावना भूख आमोद कृतिभाव आश्चर्य एकाकीपन  संवेगों की प्रकृति Nature of Emotions हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने अच्छे और बुरे अनुभवों के प्रति दृढ़ भावनाओं

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बालक एक समस्या – समाधान और वैज्ञानिक अन्वेषण | Child As a Problem Solver and Scientific Investigator #ctet #ctetsuccess #eductet #uptet #cdp #pedagogy

बालक एक समस्या – समाधान और वैज्ञानिक अन्वेषण  समस्या समाधान का अर्थ साधारण शब्दों में कहें तो किसी भी समस्या का समाधान चाहे समस्या छोटी हो या बड़ी जब भी सामने आती है तब उसके समाधान हेतु कुछ निश्चित सोपानों या कदमों का अनुसरण किया जाता है। बालक जब एक बार किसी समस्या का समाधान कर लेता है तब वह भविष्य में उन्हीं सोपानों का प्रयोग करता है जिससे उसने समस्या का समाधान निकाला था। समस्या समाधान के लिए चिंतन करना जरूरी है।  बालक का मानसिक विकास मानसिक विकास से तात्पर्य मानसिक क्षमताओं के विकास से है। मानसिक क्षमता के अंतर्गत चिंतन करने की क्षमता, तर्क करने की क्षमता, याद रखने की क्षमता, सही अर्थ देने की क्षमता आदि सम्मिलित है। जब बालक इन मानसिक क्षमताओं के आधार पर मानसिक कार्य संपन्न करने लगता है तब यह माना जाता है कि बालक का मानसिक विकास सही दिशा में हो रहा है। मानसिक विकास की प्रक्रिया जन्म से पूर्ण परिपक्वता आने तक चलती है।  बालक एक समस्या-समाधान के रूप में बालक बचपन से लेकर बड़े होने तक अनेक ऐसी समस्याओं का सामना करता है जिनका उसे स्वयं समाधान ढूंढना पड़ता है। बालक अपनी समस्या का हल ढूंढने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।  बच्चों को इस स्तर के योग्य बनाने के लिए आवश्यक है कि उसका व्यक्तिगत विकास किया जाए जिससे कि वह सभी प्रकार की परिस्थितियों का सही ढंग से सामना कर सके।  Gender Issues in Social Construction | सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे बालक का एक अच्छा समस्या समाधान कैसे बनाया जाए बालक के सामने छोटी-छोटी समस्या रखनी चाहिए ताकि आत्मविश्वास बढ़े। बालकों को छोटी-छोटी समस्या के समाधान करने पर पुरस्कृत करते रहना चाहिए।  बालकों में चिंतन व तर्क का विकास प्रायोगिक रूप से करना चाहिए।  बालकों में भाषा, कौशल आदि का विकास किया जाना चाहिए। बालकों को बार-बार अभ्यास कराकर अपनी कमियों को दूर करना सीखना चाहिए। बालक में प्रत्यय निर्माण पर बल देना चाहिए। बालकों को स्वावलंबी बनने के लिए प्रोत्साहित तथा आत्मविश्वास का गुण जाग्रत करना चाहिए। बच्चे में आत्म पहचान का गुण विकसित करके अपनी कमियों को स्वीकार करना तथा दूर करना सिखाकर बच्चे को स्वावलम्बी बनाने के लिए प्रोत्साहित करके बच्चे में भाषा का विकास करके बच्चे को बार-बार प्रयास करके  समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि जब भी कोई समस्या सामने आती है तब उस वक्त सिर्फ वही एक समस्या हमारे पास नहीं होती है बल्कि कई और समस्याएं भी होती हैं। लेकिन आवश्यकतानुरूप प्राथमिकता के अनुसार समस्या समाधान करने हेतु समस्या का चयन किया जाता है। तत्पश्चात् उस समस्या से संबंधित जानकारी एकत्रित की जाती है। जानकारी, के अनुसार संभावित समाधान पर विचार किया जाता है। चिंतन-मनन के द्वारा जो समाधान सामने आता है, उसका मूल्यांकन व परीक्षण किया जाता है फिर जो निष्कर्ष आते हैं उन पर निर्णय लिया जाता है। एक जैसी समस्या के समाधान में अक्सर पूर्व से मिलते-जुलते समाधान का प्रयोग किया जाता है।  बालक चिंतन कैसे करते है? किसी भी शिक्षण पात्रता परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण TOPIC समस्या समाधान की क्षमता बालक के तार्किक योग्यता पर निर्भर करती है, क्योंकि समस्या आने पर उसके समाधान के लिए क्रमबद्धता के साथ प्रयास करना तार्किक क्षमता को स्पष्ट करता है वहीं समस्या आने पर कई बालक समाधान का प्रयास न कर चिंता में बेवजह डूब जाते हैं, परेशान होते हैं तथा गलत कदम उठा लेते हैं। बालक के माता-पिता व शिक्षक को चाहिए कि बालकों को मानसिक रूप से मजबूत और उनमें तार्किक क्षमता का भी विकास करें जिससे वो समस्या समाधान कर सकें। समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि निम्नलिखित है :- समस्या का चयन समस्या से संबंधित जानकारी  संभावित समाधानों का निर्माण 4. संभावित समाधानों का मूल्यांकन संभावित समाधानों का परीक्षण निष्कर्षों का निर्णय समाधान का उपयोग/प्रयोग CTET Concept of Development and Growth | विकास की अवधारणा और वृद्धि  बालक, एक वैज्ञानिक अन्वेषक के रूप में निरीक्षण:-  बालक सबसे पहले विषय-वस्तु की परिस्थितियों का निरीक्षण करता है।  तुलना:-  विषय-वस्तु और परिस्थितियों में तुलना करता है। प्रयोगः- तुलना के आधार पर विचारों का प्रयोग करता है।  प्रदर्शन:-  फिर उस प्राप्त प्रयोग का प्रदर्शन या निरीक्षण करते हैं। सामान्यीकरण:-  परिणाम आने पर सिद्धांत निर्मित होते हैं, जो सामान्यीकरण को बताते हैं। प्रमाणीकरण:-  पुनः प्रयोग करके समस्या का सामान्यीकरण करना।

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बालक कैसे चिंतन करते हैं | How Do Children Think #ctet #ctetsuccess #eductet #cdp #pedagogy #uptet #supertet

                    बालक कैसे चिंतन करते हैं? How Do Children Think? चिंतन एक मानसिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में प्रतिमाओं, प्रतीकों, संप्रत्यय नियमों एवं अन्य इकाइयों का मानसिक जोड़-तोड़ होता है। इस प्रक्रिया में प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, अधिगम, ध्यान (अवधान) आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। बालक के सामने जब कोई समस्या आती है तब वह उसका समाधान ढूँढ़ता है और समाधान चिंतन से प्राप्त करता है। बालक में चिंतन की प्रक्रिया Process of Thinking in Children   बालक समस्या के सामने आने पर उसके समाधान हेतु प्रयास करने लगता है। समस्या के समाधान के लिए सकारात्मक दिशा में कार्य करता है (चिंतन)। यही चिंतन प्रक्रिया की शुरुआत है जो बालक तर्क, रुचि, जिज्ञासा, प्रत्यक्षीकरण, कल्पना संप्रत्यय, अनुभव के आधार पर या इनमें से किसी आधार पर समस्या के समाधान हेतु सोचता है। सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे 👈👈 Important for all Teaching Exam.  बालकों में चिंतन योग्यता को कैसे बढ़ाया जाए ? How to Enhance Thinking Ability in Children  रुचि के विकास पर ध्यान देना चाहिए। उत्तरदायित्व की भावना को समझाना चाहिए। बालकों को प्रेरित किया जाए कि वह लक्ष्य को पा सकते हैं तथा समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। बालकों में आत्म-विश्वास को बढ़ाना चाहिए तथा उनमें धनात्मक मनोवृत्ति का विकास करना चाहिए। समस्या का अभ्यास कराना चाहिए और इसे अभ्यास करते समय आयु का ध्यान रखा जाना चाहिए।  तर्क, वाद-विवाद, संगोष्ठी, समूह परिचर्चा में उनकी भागीदारी करानी चाहिए। विकास की अवधारणा और वृद्धि 👈👈 Important for all Teaching Exam.  बालक कैसे अधिगम करता है?  How Do Children Learn?  बालक परिवार, आस-पड़ोस, साथी समूह, स्कूल, शिक्षक, अपने अनुभव आदि के माध्यम से अधिगम करता है। बालक अधिगम सामान्य: या तो अभ्यास द्वारा करता है या अनुभव के माध्यम से करता है। बालक कुछ क्रियाओं को या ज्ञान को अभ्यास के द्वारा अधिगम करता है तथा कुछ को अनुभव के द्वारा करता है। भले ही बालक व अधिगम विषय-वस्तु के बीच माध्यम कुछ भी हो। बालक के अधिगम का तरीका भी सबका अलग-अलग होता है। जिन बालकों की IQ का स्तर अधिक होता है वह समझकर सीखना पसंद करते हैं वहीं कम I.Q. वाले बालक उसे रटकर सीखना पसंद करते हैं। बालक प्रयास व त्रुटि द्वारा भी सीखते हैं। प्रयास व त्रुटि का सिद्धांत थॉर्नडाइक द्वारा दिया गया जिसमें तत्परता, अभ्यास तथा प्रभाव का नियम शामिल है। बालक में अन्वेषण सीखना भी होते देखा जाता है। बालक द्वारा प्रेक्षण, विवेचना तथा करके देखना आदि विधि का अधिगम हेतु उपयोग करते हैं।  अधिगम | विकास के साथ अधिगम का सम्बन्ध 👈👈 Important for all Teaching Exam.  बालक विद्यालयी उपलब्धि में क्यों और कैसे असफल होते हैं? बालक स्कूल में क्यों असफल होते हैं या यूँ कहें कि क्यों फेल होते हैं तो कुछ कारण प्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं, जो निम्न हैं- अभ्यास में कमी: बालक यदि अर्जित ज्ञान का अभ्यास नहीं करेगा तो स्मृति से बहुत सारी बातें विलोपित होने लगती हैं वहीं अगर अभ्यास किया जाता रहा है, तो स्मृति में चिन्ह बने रहते हैं।  उचित प्रेरणा व मार्गदर्शन का अभावः बालक यदि लक्ष्य के प्रति प्रेरित नहीं होते हैं तो निश्चित ही फिर लक्ष्य प्राप्ति में कठिनाई होती है। इतना ही नहीं उचित प्रेरणा के साथ सही मार्गदर्शन भी प्रदान किया जाना चाहिए जिस पर चलकर लक्ष्य तक पहुँचा जा सके। बौद्धिक क्षमता बालक में यदि बौद्धिक क्षमता की कमी हो तो वो सीधे सरल प्रश्नों के जवाब तो आसानी से रटकर दे पाता है, लेकिन तार्किक प्रश्न या थोड़े घुमावदार प्रश्न, जिसे कठिन प्रश्न भी कहते हैं, का जवाब देना उसके लिए कठिन हो जाता है। मनोवृत्ति व आत्मविश्वास किसी भी लक्ष्य को पाने या सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मविश्वास तथा सकारात्मक मनोवृत्ति का होना जरूरी है। इसकी कमी से सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है।  निष्पादनः बालक कितना सीखता है इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि वह सीखे गए ज्ञान का सही इस्तेमाल व प्रदर्शन उचित अवसर पर कर पाता है कि नहीं। बालक का स्वास्थ्यः बालक शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होगा तभी सफलता की दर अधिक होगी अन्यथा वह अपनी पूरी योग्यता स्मृति का सही इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। 

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Gender Issues in Social Construction | सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे #ctet #ctetsuccess #eductet #cdp #pedagogy #ctet2022

 सामाजिक निर्माण लैंगिक मुद्दे (Gender Issues in Social Construction)  सामाजिक रचना के रूप में लिंग की भूमिका  समाज की रचना में स्त्री व पुरुष दोनों की भूमिका है। किसी एकमात्र से समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। प्राचीन काल में कभी स्त्री को बहुत महत्त्व दिया जाता था, परंतु समय के बदलाव ने पैतृक समाज को जन्म दिया। स्त्री हो या पुरुष दोनों में शारीरिक भिन्नताएँ तो हैं, परंतु श्रेष्ठता की कल्पना महज एक भ्रम है। सामाजिक निर्माण में लैंगिक मुद्दे में हम समाज के रचना में रचना में इस भूमिका को समझेंगे।  आज बदली परिस्थितियों में महिलाएँ भी हर क्षेत्र में अपना नाम कर रही हैं तथा कई क्षेत्रों में पुरुषों से काफी आगे भी निकल चुकी है। चूँकि समाज के दोनों आवश्यक अंग हैं ऐसे में किसी भी प्रकार की श्रेष्ठता की बात करना गलत होगा और साथ ही समाज को स्त्री व पुरुष में बाँटना गलत होगा। कभी धर्म, कभी जाति, कभी नस्ल आखिर हम लोग कब तक बँटते रहेंगे? एक उत्कृष समाज के निर्माण में लोगो को लैंगिक मुद्दे  छोड़ना ही होगा। Learning | अधिगम Important Topic for All Teaching Exams 👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻 पूर्वाग्रह  पूर्वाग्रह बिना किसी तथ्य के या  तर्क के आधार पर किसी के प्रति धारणा बना लेना। इसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं होता है। यह एक तरह की मनोवृति ही है जो व्यक्ति को किसी समूह या उसके सदस्य के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल ढंग से सोचने, प्रत्यक्षण करने अनुभव करने तथा कोई क्रिया करने के लिए पहले से तत्पर बना देती है। उदाहरण-‘लड़कियां गणित में अधिक अफसल होती हैं। या ‘लड़कियाँ अच्छा गाना गाती हैं लड़कों की अपेक्षा’। इसमें दोनों उदाहरण पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं। पूर्वाग्रह का संबंध पक्षपात से है। यह जाति, धर्म, लिंग, समाज, क्षेत्र आदि पर आधारित हो सकता है। शिक्षक को या विद्द्यालय प्रबंधन को किसी भी पक्षपात पूर्ण व्यवहार तथा पूर्वाग्रह से बचना चाहिए साथ ही बच्चो को भी इनसे बचाना चाहिए।  Very Important For CTET and TET ( Concept of Development and Growth)  click here 👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻👆🏻 पूर्वाग्रह विवेकहीन होते हैं। पूर्वाग्रह अर्जित होते हैं। पूर्वाग्रह पूर्ण रूप से किसी समूह द्वारा संचालित होते हैं। पूर्वाग्रह का संबंध वास्तविकता से नहीं होते हैं। पूर्वाग्रह दृढ़ तथा स्थिर प्रवृत्ति के होते हैं। पूर्वाग्रह संवेगात्मकता से प्रभावित होते हैं। मनोवृति  या  अभिवृति अभिवृति  मनोवृत्ति का संबंध किसी विषय, धारणा या विचार से होता है।  मनोवृत्ति संज्ञानात्मक, भावात्मक, व्यवहारात्मक संगठन का एक संगठित तंत्र है।  मनोवृत्ति सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों होती है।  मनोवृत्ति में इन तीनों संघटकों की कुछ खास-खास विशेषताएँ होती हैं।  मनोवृत्ति सीखी जाती है। मनोवृत्ति अपेक्षाकृत स्थायी होती है (परिवर्तन संभव है)।  इसमें परिवर्तन संगत और असंगत दोनों रूपों में होते हैं।  मनोवृत्ति में प्रेरणात्मक गुण होते हैं इसलिए विशिष्ट दिशा में निर्देशित होती है।  मनोवृति  और  पूर्वाग्रह  में अंतर CTET SUCCESS मनोवृत्ति में परिवर्तन अपेक्षाकृत आसान है जबकि पूर्वाग्रह में परिवर्तन आसान नहीं है।  मनोवृत्ति के निर्माण में मूलभूत बातें छिपी होती है जबकि पूर्वाग्रह में ऐसा नहीं होता है।  मनोवृत्ति व्यक्तिगत होती है तथा पूर्वाग्रह सामाजिक या समूह निहित होती है।  मनोवृत्ति सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में पायी जाती है जबकि पूर्वाग्रह अधिकांश नकारात्मक भावों को रखता है।

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Learning | अधिगम | विकास के साथ अधिगम का सम्बन्ध #ctet #ctetsuccess #cdp #pedagogy #ctet2022 #kvs #uptet

  अधिगम (Learning) अधिगम का अर्थ होता है “सीखना”। अधिगम एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवन भर चलती रहती है जिसके द्वारा हम कुछ ज्ञान प्राप्त करते रहते है या इससे हमारे व्यवहार में परिवर्तन होता है। जन्म के बाद से ही बालक सीखना शुरू कर देता है जो मृत्यु तक चलती रहती है। अधिगम व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहायता करता है जिससे जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता मिलती है। अधिगम के बाद व्यक्ति स्वयं और दुनिया को समझने के योग्य हो जाता है। अधिगम के विषय मे विद्वानों द्वारा दिये गए कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएं निम्न प्रकार से है :-  गेट्स के अनुसार :- “अनुभव द्वारा व्यवहार में रूपांतर लाना ही अधिगम है। ई० ए० पील :- “अधिगम व्यक्ति में एक परिवर्तन है, जो उसके वातावरण के परिवर्तनों के अनुसरण में होता है।”  क्रो एवं क्रो के अनुसार ” सीखना आदतों, ज्ञान एवं अभिवृत्तियों का अर्जन है। इसमें कार्यो को करने के नवीन तरीके सम्मिलित है और इसकी शुरुआत व्यक्ति द्वारा किसी भी बाधा को दूर करने अथवा नवीन परिस्थितियों में अपने समायोजन को लेकर होती है। इसके माध्यम से व्यवहार में उत्तरोत्तर परिवर्तन होता रहता है। यह व्यक्ति को अपने अभिप्राय अथवा लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ बनाती है। इस प्रकार विद्वानों के परिभाषाओ के माध्यम से हम समझ सकते है कि “यदि किसी विषय वस्तु के ज्ञान के आधार पर कुछ परिवर्तन करने एवं उत्पादन करने में सक्षम हो गया हो तो उसके सीखने की प्रक्रिया को अधिगम कहा जायेगा ।”  विकास का अधिगम से संबंध   सीखना जीवन भर चलने वाली एक प्रक्रिया है, इसका किसी विशेष आयु वर्ग से जोड़ कर नही देखा जा सकता है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि अधिगम और विकास एक-दूसरे से अन्तःसम्बन्धित है। विकास अधिगम को प्रभावित करता है और अधिगम भी विकास को प्रभावित करता है। विकास और अधिगम एक समान गति से आगे नही बढ़ता है। शारीरिक विकास, विशेषकर छोटे बच्चो में मानसिक और संज्ञानात्मक विकास में मददगार है। मानसिक और भाषायी विकास,सामाजिक विकास एवं अधिगम को को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। अर्थ निकलना, अमूर्त सोच (Abstract Thought) की क्षमता विकसित करना विवेचना व कार्य, अधिगम की सर्वांधिक महत्वपूर्ण पहलू है। भावनाएं, दृष्टिकोण और आदर्श , संज्ञानात्मक विकास के अभिन्न हिस्से है तथा भाषायी विकास , मानसिक चित्रण, अवधारणाओं व तार्किकता से इनका गहरा संबंध है। बच्चे एक दूसरे से व्यक्तिगत स्तर पर विभिन्न तरीको से सीखते है। वे अनुभव के माध्यम से , स्वयं करके या बना कर, प्रयोग करने से , पढ़ने से, सुनने, पूछने इत्यादि जरियो से अभिव्यक्त करने से सीखते है। अपने विकास के रास्ते मे बच्चो को इस प्रकार का अवसर मिलने चाहिये। बालको में प्राकृतिक और सामाजिक दुनिया के प्रक्रिया का भी विकास होता है। इसमें दुसरो के साथ अपने रिश्तों के विभिन्न सिद्धान्त भी शामिल है। जिसमे आधार पर उन्हें ये मालूम चलता है कि चीझे जैसी है वैसी क्यों है? साथ ही उन्हें मालूम चलता है कि कारण और कारक के बीच क्या संबंध है और कार्य व निर्णय लेने के क्या आधार है।

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Concept of Development and Growth | विकास की अवधारणा और वृद्धि

 बाल मनोविज्ञान को अध्ययन करने के लिए विकाश , वृद्धि और परिपक्वता के अर्थ को समझना और इसके अंतर को जानना बहुत जरूरी है ।     विकास की अवधारणा   विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जो निरंतर चलती है , इसमे गुणात्मक एवं परिणात्मक परिवर्तन दोनो ही     सम्मिलित रहते है। गुणात्मक परिवर्तन  बच्चो के उम्र बढ़ने पर संवेगात्मक (emotional) परिवर्तन, भाषा सीखने की क्षमता में परिवर्तन इत्यादि। परिणात्मक परिवर्तन    शरीर का कद बढ़ना, वजन बढ़ना, बनावट आदि में परिवर्तन। विकास के अभिलक्षण (characteristic)  विकास की प्रक्रिया गर्भधारण से मृत्य तक चलती है।  विकास बहुआयामी (Multi Dimension) और प्रासंगिक (relevant) होती है।  विकास की गति व्यक्तिगत अंतर से प्रभावित होती है।  विकास की प्रक्रिया सिर से पैर की तरफ बढ़ती है , जबकि मानसिक क्षेत्र में ये मूर्त से अमूर्त की ओर   होती है।  विकास सामान्य अनुक्रिया से विशिष्ट अनुक्रिया की ओर होती है।  शारीरिक और मानसिक विकास आपस मे धनात्मक रूप से सहसंबंधी होते है।  वृद्धि (Growth)  बालको के शारीरिक संरचना के विकास जिसमे लंबाई, भार, मोटाई तथा अन्य अंगों का विकास आता है उसे “वृद्धि” कहते है। इसकी प्रक्रिया आंतरिक एवं बाह्य दोनों रूप से होती है। वृद्धि एक निश्चित आयु तक होती है। वृद्धि पर अनुवांशिकता (Hereditary) का सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ते है।   विकास की अवस्थाएं  विकास की अवस्था के संबंध में अलग अलग मनोवैज्ञानिकों की अलग अलग मत है। रॉस व फॉयड ने पांच अवस्थाएं बताई है , जबकि कॉलसेनिक दस तथा पियाजे ने चार और ब्रूनर ने तीन अवस्थाएं बताई है। भारत मे सामान्यतः विकास के अवस्था को इस प्रकार विभाजित किया गया है  i) पूर्व प्रसूतिकाल :-  यह अवस्था गर्भधारण से लेकर जन्म तक होती है। (ii) शैशवास्था :-      यह अवस्था जन्म से लेकर 2 वर्षो तक होती है। (iii) बाल्यावस्था :-   प्रारंभिक बाल्यावस्था (early childhood) 2 से 6 साल होती है। * उत्तर बाल्यावस्था (Later Childhood) :- 6 वर्ष से 12 वर्ष तक होती है। (iv) किशोरावस्था :- 12 वर्ष से 18 वर्ष तक (v) युवावस्था :- 18 वर्ष से 30 वर्ष (vi) प्रौढावस्था :- 30 से 60 वर्ष तक (vii) वृद्धावस्था :- 60 वर्ष से मृत्य तक। शिक्षा मनोविज्ञान व बाल मनोविज्ञान में सभी अवस्थाओं का अध्ययन महत्वपूर्ण नही है। इसके प्रमुख अवस्थाएं है :- शैशवावस्था , बाल्यावस्था और किशोरावस्था है।।  शैशवावस्था :- जन्म से 2 वर्ष की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है , जिसमे शिशु का शारीरिक और मानसिक विकास तेज़ी से होता है। इस अवस्था मे बालक पूर्ण रूप से माता-पिता पर आश्रित होते है। इस समय बच्चा पुनरावृति, प्रयास व त्रुटिपूर्ण व्यवहार, वस्तु की प्रधानता, छोटे-छोटे शब्दो का प्रयोग आदि करते है।  बाल्यावस्था (Childhood):- बाल्यावस्था के दो चरण है – प्रारंभिक बाल्यावस्था और उत्तर बाल्यावस्था । (i) प्रारंभिक बाल्यावस्था :- यह अवस्था 2 से 6 वर्ष तक की मानी जाती है। इस समय बच्चे बच्चे ज्यादा जिद्दी, विरोधात्मक, आज्ञा न मानने वाले होते है। बालको में जिज्ञासा ज्यादा होती है और वो खिलौनो से खेलना पसंद करते है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह काल भाषा सीखने की सबसे उत्तम अवस्था होती है। (ii) उत्तर बाल्यावस्था :- यह अवस्था 6 से 12 वर्षो तक माना जाता है। इस अवस्था मे बच्चे स्कूल जाना प्रारम्भ कर देते है। बच्चो में नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक, तर्कशील का वयापक विस्तार का विकास होता है। बालक सरारत करते है, समूह में रहना पसंद करते है। इस समय घूमने की प्रवृति का विकास होता है, बच्चो को अनुशासन और नियमो के महत्व समझ आने लगती है। इस समय बालक स्वयं से संबंधित बातें अधिक करते है। (iv) किशोरावस्था (youth / adolescence) :- 12 से 18 वर्ष की आयु को किशोरावस्था कहा जाता है, जिसमे बच्चो के महत्वपूर्ण शारीरिक, सामाजिक, संवेगात्मक, संज्ञानात्मक विकास होते है। इस अवस्था मे मित्र बनाने की प्रवृति तीव्र होती है और सामाजिक संबंधों में वृद्धि होती है। साथ ही साथ बच्चो में ऊंची आकांक्षाएं, कल्पनाएं, नाइ आदते, व्यवहार में भटकाव, नशा या अपराध की तरफ झुकाव आदि देखने को मिलता है। इसलिए इन्हें इस अवस्था मे शिक्षकों, मित्रो एवं अभिभावकों के मार्गदर्शन एवं सलाह जी जरूरत पड़ती है। 4. विकास के आयाम (Dimension of Development) :- मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययन के दृष्टिकोण से विकास को निम्नलिखित भागो में बंटा गया है :- (i) शारीरिक विकास :- शिशु का शारीरिक विकास गर्भावस्था से ही प्रारंभ हो जाता है। शरीर के बाहरी परिवर्तन तो स्पष्ट रूप से दिखते है लेकिन साथ ही साथ इनका विकास शरीर के अंदर भी होता रहता है। आकर एवं भार, मांसपेशियाँ एवं हड्डियां, मस्तिष्क और पाचन तंत्र समय के साथ साथ विकसित होता रहता है। बालको के परिवेश एवं उनके देखभाल के भी उनके शारीरिक विकास पर असर होता है। अगर बच्चो को पर्याप्त आहार न मिले तो उनके शारीरिक विकास के सामान्य गति में रुकावट आ सकती है। बालको के वृद्धि एवं विकास के बारे में शिक्षकों को पर्याप्त जानकारी इसलिए भी रखना अनिवार्य है ताकि बच्चो के रुचि , इच्छाएं, दृष्टिकोण एवं एक तरह से उनका पूर्ण व्यवहार शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर ही निर्भर करता है। बच्चो के शारीरिक वृद्धि एवं विकास के सामान्य ढांचे से परिचित होकर अध्यापक यह जान सकते है कि एक विशेष आयु स्तर पर बच्चो से क्या उम्मीद की जा सकती है।। (ii) मानसिक या संज्ञात्मक विकास (Mental or Cognitive Development) :- मानसिक विकास का मुख्य साधन ज्ञानेन्द्रियो की क्षमता एवं गुणवत्ता का विकास होता है। इसके अंतर्गत भाषा , स्मृति, तर्क, चिंतन, कल्पना, निर्णय जैसी योग्यताओं को शामिल किया जाता है। जन्म के समय बालक में इस प्रकार की योग्यताओ की कमी रहती है। धीरे धीरे आयु बढ़ने के साथ साथ मानसिक विकास की गति बढ़ती रहती है। संज्ञानात्मक विकास के बारे में शिक्षकों को पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए ताकि वो इसके अभाव में बालको से संबंधित समस्याओं का समाधान कर सके। यदि कोई बालक मानसिक रूप से कमजोर है, तो इसके कारण का पता कर उनके समस्याओं का समाधान कर सके। विभिन्न अवस्थाओं और आयु-स्तर के बच्चो में मानसिक वृद्धि और विकास को ध्यान में रख उपयुक्त पाठ्यक्रम तैयार कर सके। (iii) भाषायी विकास :- भाषा के विकास को भावनात्मक विकास माना जाता है। भाषा के माध्यम से बालक अपने मन के भावों, विचारों को एक-दूसरों के सामने रखता है और दूसरों के भावनाओ एवं विचारों को समझता है। भाषाई ज्ञान के अंतर्गत

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विविधतता | Diversity | ctet ctet2022 ctet success CDP pedagogy

  विविधता का सामान्य अर्थ :- विविधता का सामान्य अर्थ है कि भौगोलिक रूप से, सांस्कृतिक रूप से, भाषा व वेशभूषा, धर्म इत्यादि के आधार पर विभिन्न स्वरूप में एक समाज व एक देश विशेष पर रहना। साम्प्रदायिकता का सामान्य अर्थ :-  साम्प्रदायिकता का अर्थ है कि जब किसी समाज में विभिन्न वर्गों व सम्प्रदाय विशेष के बीच किसी विशेष समस्या व घटनाओं के परिणाम स्वरूप आपसी द्वेष या भेदभाव के विरोध में होने वाली सामाजिक घटना। सामान्यतः साम्प्रदायिकता को नकारात्मक रूप में ही समझा जाता है।    * पूर्वाग्रह का सामान्य अर्थ है :- पूर्वाग्रह का सामान्य अर्थ है जब हम किसी समाज का, धर्म व कार्य के बारे में पहले से ही कोई राय या अवधारणा बना लेते हैं और इस अवधारणा को मस्तिष्क में बिठा लेते हैं तो वह पूर्वाग्रह का रूप धारण कर लेता है। रूढ़िवादिता का सामान्य अर्थ :- रूढ़िवादिता का सामान्य अर्थ है कि जो व्यक्ति समाज के किसी वर्ग या परिघटना के प्रति सभी लोग एक ही छाँव में बाँध देते हैं या उनके बारे में एक धारणा पक्की या स्थायी बना लेते हैं तो उसे रूढ़िबद्ध धारणा कहते हैं। असमानता का सामान्य अर्थ :-  असमानता का सामान्य अर्थ है किसी समाज व देश विदेश में व्यक्ति द्वारा सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक स्तर पर किया जाने वाला विषमता युक्त व्यवहार। अस्पृश्यता या छुआछूत :- अस्पृश्यता का मतलब है समाज में जाति या वर्ग व धर्म के आधार पर किया जाने वाला भेद-भाव पूर्ण व्यवहार। भारत में विविधता के विभिन्न पहलू :- भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर ‘विविधता में एकता का स्वरूप है                    जो इस प्रकार है :-    भाषा :- भाषा ही संस्कृति को विविधता प्रदान करती है। प्रारम्भ से ही भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती रही है। भाषा के विकास ने ही विभिन्न धर्मग्रन्थों, महाकाव्य, नाटक तथा साहित्य की रचनाओं में योगदान दिया। ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ जैसे महाकाव्यों का निर्माण भाषा के विकास के साथ ही हुआ, विभिन्न क्षेत्रों के निवासियों की अलग-अलग ম के कारण साहित्य भाषाएँ विकसित हुईं। इन भाषाओं का जो विकास हुआ, उसने भी भारतीय राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विभिन्न साहित्यिक रचनाओं ने भी भारत की एकता’ का ही पाठ पढ़ाया।               भारत के संविधान में 8वीं अनुसूची में प्रारम्भ में केवल 14 भाषाओं का प्रावधान था परन्तु वर्तमान में 22 भाषाएँ उल्लेखित हैं। भारत में कुछ भाषाएँ हैं जिन्हें शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है-संस्कृत, तेलगू, तमिल, कन्नड़ व मलयालम ।    कला व नृत्य :- भारत विभिन्न कला व नृत्य शैली की विविधता वाला देश है। भारत के प्रत्येक भौगोलिक भाग व राज्य समाज व वर्ग की राष्ट्रीय कला व नृत्य के साथ-साथ लोक-कलाएँ व नृत्य प्रचलित है।  भारत में कुछ नृत्य ऐसे हैं जिन्हें शास्त्रीय नृत्य का दर्जा दिया गया है। जैसे: कथक, भरतनाट्यम. कुचिपुड़ी, कथकली, मणिपुरी और ओडिसी।                                                                                                                                                                          क्षेत्र  :- भारत में न केवल धर्म और भाषा की विविधता है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग भी यहाँ निवास कर रहे हैं। भारत में राष्ट्रीयता की भावना भी विद्यमान है एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र के लोगों से अपने को भिन्न मानते हैं। उन्हें अपने क्षेत्र और प्रान्त के लिए अत्यधिक स्नेह है परन्तु, यह भावना प्रबल है कि विभिन्न क्षेत्रों में रहते हुए भी हम भारत के नागरिक हैं। भारत का विकास ही सभी क्षेत्र के लोगों का मूल उद्देश्य है।                                      विविधता में एकता :- स्पष्ट है कि भारत विविधताओं का देश है। साथ ही ‘विविधता में एकता’ भारत राष्ट्र की अपनी विशेषता है। हम धर्मनिरपेक्ष राज्य के नागरिक है भारत में विविधता शुरु से है पर, हम लोग 5 मिलजुलकर रहते आए हैं। हिन्दू और मुसलमान मुगल-शासकों के समय में भी साथ-साथ रहते थे। पर्व-त्यौहार के अवसर पर भी वे साथ रहे हैं होली, दीपावली, और दशहरा आदि पर्यो में मुसलमान भी साथ देते हैं। ईद के मौके पर हिन्दू भी मुसलमान साथियों को मुबारकबाद देते है। सिखों के गुरुद्वारे में हिन्दू भी जाते हैं और हिन्दू मन्दिरों में सिख भी पूजा करने जाते हैं अलग-अलग होते हुए भी हम न भारतवासी एक है।  जवाहर लाल नेहरू ने ही अपनी किताब ‘भारत एक खोज’ में ‘अनेकता में एकता’ का विचार दिया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ भी भारतीय एकता की एक अभिव्यक्ति है। विश्व/संसार में आठ मुख्य धर्म है-ईसाई, स्कूल, यहूदी, हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख व पारसी आदि। भारत में इन सभी आठ धर्मों के अनुयायी है, जिसमें छः अल्पसंख्यक धर्म हैं-इस्लाम, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई वो पारसी। भारत में 1600 से ज्यादा भाषाएँ व बोलियाँ बोली जाती है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर 18911956 को भारत के संविधान का जनक व दलितों के सबसे बड़े नेता के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म ‘महार जाति’ में हुआ था। 1947 के बाद देश की आजादी के उपरान्त संविधान में भारतीय नागरिकों को 7 मौलिक अधिकार प्रदान किए गए परन्तु वर्तमान में 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं-समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार व संवैधानिक उपचारों का अधिकार।       भारत में विविधता व एकता के समक्ष अनेक चुनौतियां व समस्याएँ :- 1. जातिवाद 2. क्षेत्रियातावाद 3. भाषावाद 4. साम्प्रदायिकता 5. नक्सलवाद/आतंकवाद 6. क्षेत्रीय असमानता 7. भ्रष्टाचार 8. भाई-भतीजावाद 9. अशिक्षा/निरक्षरता 10. गरीबी 11. बेरोजगारी

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नई शिक्षा नीति को मंजूरी | HRD अब शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा |NEP 2020

कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसलों की जानकारी केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी। उन्होंने बताया कि 34 साल बाद भारत की नई शिक्षा नीति आई है। स्कूल-कॉलेज की व्यवस्था में बड़े बदलाव किए गए हैं।  कैबिनट ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नई शिक्षा नीति 2020 को मंजूरी दे दी है। जिससे स्कूल और उच्च शिक्षा स्तरों पर बड़े पैमाने पर सुधार हुए है। यह 21वी सदी की पहली शिक्षा नीति है जो शिक्षा की 34 वर्ष पुरानी राष्ट्रीय नीति (NPE, 1986) की जगह लेती है।  स्कूल और कॉलेज दोनों की शिक्षा को 21वी सदी के जरूरतों के अनुकूल और समग्र , लचीला, बहु-विषयक बना कर एक जीवंत ज्ञान और वैश्विक ज्ञान महाशक्ति में बदलना है। इसका उद्देश्य है प्रत्येक छात्र की अद्वितीय क्षमताओं को सामने लाना है।  NEP 2020, के तहत लगभग 2 कड़ोड स्कूली बच्चो को वापस मुख्य धारा में लाया जाएगा। NCP 2020 सभी स्तरों पर स्कूल सार्वभौमिक पहुँच को सुनिश्चित करता है।  सरकार ने बताया कि मौजूदा शिक्षा नीति के तहत फिजिक्स ऑनर्स के साथ केमिस्ट्री, मैथ्स लिया जा सकता है। इसके साथ फैशन डिजाइनिंग नहीं ली जा सकती थी। लेकिन नई नीति में मेजर और माइनर की व्यवस्था होगी। जो मेजर प्रोग्राम हैं उसके अलावा माइनर प्रोग्राम भी लिए जा सकते हैं। इसके दो फायदे होंगे।   HRD मंत्रालय अब शिक्षा मंत्रालय हो जाएगा   मानव संसाधन मंत्रालय को फिर से शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा। पहले इस मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय ही था। साल 1985 में इसे बदलकर मानव संसाधन मंत्रालय नाम दिया गया था।  स्कूली शिक्षा में 10+2 प्रारूप अब खत्म  नई शिक्षा नीति के तहत स्कूली शिक्षा में 10+2 फॉर्मेट को खत्म कर दिया गया है। इसे 10+2 से 5+3+3+4 फॉर्मेट में ढाला गया है। इसका मतलब है कि अब स्कूल के पहले पांच साल में प्री-प्राइमरी स्कूल के तीन साल और कक्षा 1 और कक्षा 2 सहित फाउंडेशन स्टेज शामिल होंगे। फिर अगले तीन साल को कक्षा 3 से 5 की तैयारी के चरण में विभाजित किया जाएगा। इसके बाद में तीन साल मध्य चरण (कक्षा 6 से 8) और माध्यमिक अवस्था के चार वर्ष (कक्षा 9 से 12) होंगे।

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CTET | Child pedagogy | वैयक्तिक विभिन्नता | INDIVIDUAL DIFFERENCES | CTET2020 | STET | KVS | NVS | UPTET |

                        वैयक्तिक विभिन्नता :-            INDIVIDUAL DIFFERENCES Answer :- (c) प्राकृतिक के साथ ।। Answer:- (C) आश्चर्य  Answer :- (D) उपरोक्त सभी Answer :- (C) विकास की दर

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Project Method of Teaching | CTET 2020 | STET | UPTET | TGT | परियोजना विधि |

Q. Who invented Project method of                 teaching ?      शिक्षण की परियोजना विधि का अविष्कार      किसने किया?        A. H.E. Armstrong        B. W.H. Kilpatrick        C. B.F. Skinner        D. Dr. Montessori Ans :- B} W.H. Kilpatrick Detail of Project Method of Teaching शिक्षण का प्रोजेक्ट विधि  अमेरिका के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री जॉन ड्यूवी , किलपैट्रिक, स्टीवेन्सन आदि लोगो के सम्मिलित प्रयास का फल प्रोजेक्ट विधि है। इस विधि को विकसित करने का श्रेय किलपैट्रिक को जाता है ।  इस विधि के अनुसार ज्ञान प्राप्तनकरने के लिए स्वाभाविक वातावरण बहुत अधिक उचित होता है। इस विधि में पढ़ाने के लिए पहले किसी समस्या का चुनाव किया जाता है। ये समस्या प्रायः छात्रों द्वारा उठाई जाती है , फिर उस समस्या के समाधान हेतु उन्ही के द्वारा योजना बनाई जाती है। इस योजना को स्वाभाविक वातावरण में पूर्ण किया जाता है। Definition परिभाषा योजना या प्रोजेक्ट एक ऐसा कार्य है जिसमे स्वाभाविक वातावरण में समस्या का समाधान किया जाता है। समस्या के समाधान में तर्कों पे आधारित ज्ञान को अपने व्यवहार में परिवर्तन कर प्रयोजनपूर्ण कार्य किया जाता है ।  ◆   स्टीवेन्सन ने कहा :-  योजना एक समस्या मूलक कार्य है, जिसे प्राकृतिक स्थिति में पूरा किया जाता है । ◆    किलपैट्रिक के अनुसार :-  प्रयोजन एक उद्देश्यपूर्ण कार्य है जिसे सामाजिक वातावण में पूर्ण तन्मयता के साथ किया जाता है।  ◆     बेलार्ड ने कहा :-  प्रोजेक्ट यथार्थ जीवन एक अंश है जिसे स्कूलों में आयात कर लिया जाता है ।

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